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ठोस योजना बने

By संपादकीय
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बिहार और असम में बाढ़ की गंभीर स्थिति ने फिर इस जरूरत को रेखांकित किया है कि बाढ़ प्रबंधन योजना पर पुनर्विचार कर दीर्घकालिक नीति बने. यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जलवायु परिवर्तन और धरती का तापमान बढ़ने की वजह से दुनिया के अनेक हिस्सों में प्राकृतिक आपदाओं की बारंबारता में बढ़ोतरी हो रही है. इसका सबसे अधिक असर दक्षिण एशिया में है. बिहार में इस साल बीते एक जून से 28 जुलाई के बीच 706.4 मिलीमीटर बारिश हुई है, जबकि इस अवधि में सामान्य तौर पर 484.6 मिलीमीटर बरसात होती है यानी इस अंतराल में सामान्य से 46 फीसदी अधिक पानी बरसा है.

कुछ जिलों में तो यह बहुत ज्यादा है. राज्य के 12 जिलों में करीब तीस लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं. असम में भी स्थिति चिंताजनक है, लेकिन दो सप्ताह में प्रभावित जिलों की संख्या 28 से घटकर 21 हो गयी है और प्रभावित लोगों की संख्या 10 दिनों में 40 से घटकर 20 लाख के आसपास है. बिहार में भी राहत और बचाव के प्रयास जोरों पर हैं. आशंका जतायी जा रही है कि अधिक बारिश और नदियों में जलस्तर बढ़ने से देश के कुछ अन्य इलाके भी आगामी दिनों में बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं.

साल-दर-साल विभीषिका झेलने के बावजूद देश में राष्ट्रीय स्तर पर बाढ़ नियंत्रण का कोई नियामक या विभाग नहीं होना बेहद चिंता की बात है. चार दशक से भी पहले 1976 में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग बनाया गया था, जो पहला और आखिरी आयोग था. इसकी स्थापना 1954 के राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम की असफलता की समीक्षा के लिए हुई थी. आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट दी थी, जिसमें 207 सुझाव और चार मुख्य निष्कर्ष दिये गये थे.

इसका मानना था कि वनों के क्षरण, निकासी में बाधा और दोषपूर्ण विकास योजनाओं के कारण बाढ़ की समस्या पैदा होती है क्योंकि बारिश की मात्रा में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है. तटबंध और जलाशय बनाने जैसे बाढ़ रोकने के उपायों पर भी रिपोर्ट में सवाल उठाये गये थे. इसमें केंद्र और राज्य सरकारों को मिल-जुलकर काम करने तथा ठोस रणनीति बनाने का सुझाव भी दिया गया था. यह स्पष्ट है कि इन चार दशकों में इन सुझावों पर ठीक से अमल नहीं हुआ है क्योंकि बाढ़ की चुनौती लगातार बढ़ती ही गयी है और विकास परियोजनाओं की गति भी तेज होती रही है.

अब तो अधिक या बहुत कम बारिश, लू, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्री जलस्तर का बढ़ना, वन व पहाड़ी क्षेत्रों के क्षरण के साथ भूमि का क्षरण आदि जैसी पर्यावरण और पारिस्थितिकी से जुड़ी मुश्किलें भी हमारे सामने हैं. बाढ़ मनुष्यों की जान-माल पर आफत बनती है साथ ही प्रकृति व अन्य जीवों के लिए भी तबाही लाता है. ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों को तुरंत नीतिगत पहल करनी चाहिए, ताकि भविष्य में बाढ़ की बर्बादी से बचा जा सके.

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