कभी-कभी कोई समाचार पढ़कर हम कुछ समय के लिए चुप हो जाते हैं. शब्द हमारे सामने होते हैं, लेकिन उन्हें पढ़ने के बाद मन में कोई आवाज नहीं बचती. या यूं कहें कि वह निकलती ही नहीं है. उस सुबह, यानी एक सितंबर को जिस एक समाचार ने मुझे पूरी तरह विचलित कर दिया, भीतर से झकझोर दिया, वह दिल्ली की ओर जा रही एक बस में 16 वर्षीय, कक्षा 11 की छात्रा के साथ कथित दुष्कर्म का समाचार था. जिस उम्र में एक लड़की को अपने सपनों, कॉलेज, करियर और भविष्य के बारे में सोचना चाहिए, उसी उम्र में उसे एक ऐसी भयावह घटना से गुजरना पड़ा, जिसका प्रभाव संभवत: उसके जीवन के बहुत लंबे हिस्से तक, या कहें कि लगभग पूरे जीवन उसके साथ रहेगा. पुलिस ने चालक और परिचालक को गिरफ्तार किया है और बस को फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया है.इस मामले में कानून अपना काम करेगा, आरोप सिद्ध होंगे या नहीं, यह न्यायिक प्रक्रिया तय करेगी. लेकिन मेरे मन में इससे भी बड़ा प्रश्न है- क्या किसी लड़की के साथ अपराध हो जाने के बाद हमारी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है? मैं आपको चौदह वर्ष पहले हुए निर्भया कांड की याद नहीं दिलाऊंगी. क्या ही होता है याद करके, पढ़कर, सोचकर, समझकर, मन को समझाकर. बस एक बेचैनी और डर मन में बैठ जाता है कि मैं अभी जिस जगह हूं, उसके अगले पल- बाहर, रोड पर, ऑटो में, कैब में, मेट्रो में, मोहल्ले के गली में, कहीं भी-कभी भी- क्या होगा? मैं लिखते-लिखते भी अचानक से अपनी सांसों को तेज-तेज चलते महसूस करने लगी थी, यह सोचकर कि लगभग पचास किलोमीटर तक उस अभागी लड़की के साथ कंडक्टर और ड्राइवर ने क्या-क्या किया होगा? क्यों बारिश हुई और 'सब अच्छे होते हैं', 'जैसे मैं सबकी मदद करती हूं, वैसे सब करते हैं'- सोलह बरस की वह मासूम लड़की इस तरह के स्कूली ज्ञान और घर का ज्ञान लेकर बारिश आने पर आती बस में बैठ गयी? वह कौन-सी मनोदशा होगी जिसमें घटिया हरकत के लिए उन वहशियों के कदम उस मासूम बच्ची की ओर बढ़ गये होंगे. वह डर जो उस बस के ड्राइवर और कंडक्टर में होना चाहिए, कि 'ऐसी हरकत पर उसकी खाल खींच ली जायेगी', वह डर उस समय उन दोनों राक्षसों की वहशी नजरों से उस बच्ची में उतर रहा था. सोचिए जरा, जब इसे सोचकर मैं इतनी परेशान हो रही हूं, तो उस अकेली लड़की पर उस समय क्या बीती होगी? किसी अपराध के बाद गिरफ्तारी जरूरी है, मुकदमा जरूरी है, सजा जरूरी है. लेकिन उससे पहले जरूरी है कि हम उस सामाजिक मानसिकता को समझें, जिसमें महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा जन्म लेती है. समस्या केवल अपराधी की मानसिकता में नहीं है, कहीं न कहीं यह हमारी सामूहिक चुप्पी, उदासीनता और कई बार सामाजिक स्वीकृति में भी छिपी हुई है. यौन हिंसा पर प्रकाशित हालिया विश्लेषण और उपलब्ध आंकड़े इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, बड़ी संख्या में महिलाएं करीबी संबंधों में हिंसा का सामना करती हैं. लगभग हर तीन में से एक महिला का ऐसा अनुभव होना केवल एक आंकड़ा नहीं है. मेरे लिए यह उस समाज की तस्वीर है, जिसमें घर, जो सुरक्षा का सबसे पहला स्थान होना चाहिए, कई महिलाओं के लिए भय का स्थान बन जाता है. सबसे पीड़ादायक बात यह है कि हिंसा झेलने वाली महिलाओं में से बहुत कम संस्थागत मदद तक पहुंच पाती हैं. जब सहायता लेने वाली महिलाओं का अनुपात बेहद कम हो, तो मुझे लगता है कि हमें यह पूछने की जरूरत है कि आखिर वे बाकी महिलाएं चुप क्यों रहती हैं? क्या उन्हें पुलिस पर भरोसा नहीं? क्या उन्हें परिवार का डर है? क्या समाज उन्हें ही दोषी ठहरायेगा? या उन्हें लगता है कि शिकायत करने के बाद उनकी जिंदगी और कठिन हो जायेगी? शायद इन सभी प्रश्नों का उत्तर कहीं न कहीं ‘हां’ में छिपा है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के 2023 के आंकड़ों की मानें, तो भारत में हजारों दुष्कर्म के मामले दर्ज हुए. पुलिस स्तर पर चार्जशीट की रेट लगभग 80 प्रतिशत रही, पर कोर्ट कनविक्शन रेट लगभग 23 प्रतिशत के आसपास ही रही. ये तो उन मामलों की बात है जो दर्ज हुए हैं. कई तो दर्ज ही नहीं होते- रिश्तेदार वाले, संस्था वाले और कुछ बाहुबल वाले. दिल्ली एनसीआर की बस में हुई कथित घटना ने एक और बात सोचने पर मजबूर किया है- हम सार्वजनिक परिवहन को कितना सुरक्षित मानते हैं? एक बस, एक सड़क, एक स्टेशन या एक सुनसान जगह किसी लड़की के लिए भय का पर्याय क्यों बन जाये? सार्वजनिक स्थान वास्तव में तभी सार्वजनिक हैं, जब वहां हर व्यक्ति बिना भय के मौजूद हो सके. इसलिए मेरे लिए यह सिर्फ दुष्कर्म की खबर नहीं है. यह हमारे समाज की परीक्षा है. मैं चाहती हूं कि हम आंकड़ों के पीछे छिपे व्यक्तियों को देखें. वर्ष 2023 में दर्ज 40,393 के आंकड़े के पीछे हजारों जिंदगियां हैं. सोलह वर्ष की उस बच्ची के पीछे एक परिवार है, उसके सपने हैं, उसकी पढ़ाई है और उसका भविष्य है. और शायद हमें आज पहली बार नहीं, बल्कि हर बार स्वयं से यह पूछना चाहिए- क्या हम अपनी बेटियों को सुरक्षित भविष्य दे रहे हैं, या केवल उन्हें असुरक्षित दुनिया में सुरक्षित रहने के तरीके सिखा रहे हैं? (ये लेखिका के निजी विचार हैं.)