बांग्ला संस्कृति का मूल स्वर सहिष्णुता, उदारता और समन्वय का रहा है. उन्नीसवीं सदी में बंगाल की धरती ने नवजागरण का स्वागत किया, जिसके मूल में ईश्वर चंद्र विद्यासागर और स्वामी विवेकानंद के विचार रहे. इस समन्वय की संस्कृति का ही असर रहा कि बंगाल की धरती से न केवल हिंदी पत्रकारिता का उद्भव हुआ, बल्कि उसकी जड़ें मजबूत भी हुईं. पर वह बंगाल अब बदल गया है. बांग्ला संस्कृति समन्वय के सूत्रों को कहीं पीछे छोड़ती नजर आने लगी है. यदि ऐसा नहीं होता तो कोलकाता नगर निगम के उस पोस्टर पर विवाद नहीं होता, जिसमें बांग्ला और हिंदी भाषा के शब्दों का अनूठा और कलात्मक संगम था. बांग्ला संस्कृति के प्रतीक पर्व दुर्गा पूजा के दौर में भाषायी सौंदर्य और कला के अनूठे मेल पर राजनीति ने जब प्रश्न उठाया, तो कोलकाता नगर निगम ने अपना पोस्टर ही वापस ले लिया. जिस पोस्टर पर विवाद हुआ, उसके बारे में जानना जरूरी है कि आखिर क्यों उससे तृणमूल कांग्रेस परेशान हो गयी. दरअसल, दुर्गा पूजा के दौरान 10 से 21 अक्तूबर तक कोलकाता नगर निगम ने देश की पूर्व राजधानी वाले शहर में चलाये जा रहे सफाई अभियान के लिए एक विशेष पोस्टर जारी किया था, जिसमें लिखा था, 'मायेर कोरबो स्वच्छता से स्वागत.'यानी मां दुर्गा का स्वागत स्वच्छता से करेंगे. पोस्टर के अकेले वाक्य में बांग्ला और हिंदी शब्दों का अनूठा मेल पेश किया गया. विज्ञापन की भाषा की जिन्हें समझ है, उन्हें पता है कि बांग्ला और हिंदी के इस अनूठे मेल के जरिये जो संदेश दिया गया, वह कितना प्रभावी रहा. पर तृणमूल कांग्रेस को इस वाक्य के तीन शब्द- ‘स्वच्छता से स्वागत’- बंगाल में हिंदी थोपने का षड्यंत्र नजर आने लगा. वैसे भी राज्य में भाजपा की सरकार है. भाजपा की पहचान हिंदुत्व और हिंदी को लेकर रही है. इसलिए तृणमूल के लिए यह आरोप लगाना और उसे भाजपा के हिंदी वर्चस्ववाद के छद्म नैरेटिव से जोड़ना आसान रहा. पर कोलकाता नगर निगम ने राजनीति से किनारा करना उचित समझा और उसे बदलने में देर नहीं लगायी. पोस्टर के वाक्य को पूरी तरह बांग्ला कर दिया- 'स्वच्छतार साथे, मां के स्वागत जानाई.' बांग्ला के इस वाक्य का भाव वही है, जो पहले का था. अफसोस कि राजनीति के कारण भाषायी मेल का अनूठापन गायब हो गया. दरअसल, भारतीय राष्ट्रीयता के अंतर्गत कई उपराष्ट्रीयताएं भी हैं, जिसे हम क्षेत्रीय अस्मिताओं के नाम से भी जानते हैं. भारतीय राष्ट्रीयता का मूल स्वर हिंदी के जरिये उद्घाटित होता है. जिसे हम हिंदी हार्टलैंड या हृदय प्रदेश कहते हैं, वहां राष्ट्रीयता पर अपवाद स्वरूप ही प्रश्न उठते हैं. पर उपराष्ट्रीयताएं अक्सर हिंदी पर हमले के बहाने राष्ट्रीयता को प्रकारांतर से चुनौती देती रहती हैं. दिलचस्प यह है कि जिस भाषा ने करीब दो सौ वर्ष तक देश को गुलाम बनाये रखा, उसे अपनाने में उपराष्ट्रीयताएं गर्व समझती हैं. तृणमूल कांग्रेस को यह जानना चाहिए कि आर्य समाज के प्रमुख ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' को हिंदी में लिखने के लिए बांग्ला माटी के सपूत केशवचंद्र सेन ने स्वामी दयानंद सरस्वती को प्रेरित किया था.भावी भारत की संपर्क या राष्ट्रभाषा बनने की क्षमता हिंदी में देखने वाले प्राथमिक लोगों में केशवचंद्र सेन भी रहे. कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद बंगाल की माटी के क्रांतिकारी सपूत सुभाष चंद्र बोस ने न केवल हिंदी सीखने के लिए शिक्षक रखा था, बल्कि उन्होंने कोलकाता नगर निगम के अध्यक्ष के नाते पिछली सदी के तीस के दशक में हिंदी को लेकर अर्थपूर्ण भाषण भी दिया था. हिंदी पर प्रश्न कभी-कभी कर्नाटक में भी उठता है और किंचित महाराष्ट्र में भी. पर हिंदी को स्वाधीनता से पहले से ही सबसे बड़ी चुनौती तमिलनाडु में मिलती रही है. हाल ही में तमिलनाडु के करूर और कोयंबटूर के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दी जाने वाली दवाओं के पर्चे के कवर पर तमिल और अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी निर्देश छापे गये थे. जिस पर द्रमुक नेता टीआरबी राजा ने प्रश्न उठाया कि क्या तमिलनाडु में चुपचाप 'तीन भाषा नीति' लागू की जा चुकी है.जब विवाद बढ़ा, तो दोनों सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों ने मरीजों को दिये जाने वाले त्रिभाषी कवर का वितरण तत्काल रोक दिया और उसकी जगह तमिल व अंग्रेजी लिखी पर्चियां जारी कर दीं. तमिलनाडु में हाल ही में राजमार्ग के साइन बोर्ड पर हिंदी लिखे जाने को लेकर भी विवाद खड़ा किया गया. राज्य के तूतीकोरिन जिले के सत्तानकुलम-नाजरेथ राज्य राजमार्ग 93 पर हिंदी में जगहों का नाम लिखा जाना वहां की विपक्षी राजनीति को रास नहीं आया. जब विवाद बढ़ा, तो दो सहायक इंजीनियरों भूमिनाथन और मुथु लक्ष्मी को निलंबित कर दिया गया और साइन बोर्ड से तत्काल हिंदी नामों को मिटा दिया गया.राजनीति के चलते भले ही कोलकाता नगर निगम और तमिलनाडु सरकार झुक गये हों, पर देश की सहज संपर्क भाषा को चुनौती समझने वाले इन राज्यों की राजनीति को समझना होगा कि उनके विरोध के बावजूद हिंदी स्वयं बढ़ रही है. कोलकाता में पोस्टर तैयार करने वाले दिमाग और हाथों को हिंदी के प्रयोग के जरिये भाषायी चमत्कार करना कलात्मक लगता है, तो यह हिंदी की ही जीत है. तमिलनाडु के वे इंजीनियर भी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने लीक पर चलने की बजाय राजमार्ग के पास के शहरों और कस्बों के नामों को देवनागरी में लिखना उचित समझा. उनकी नजर में हिंदी कोई चुनौती नहीं, भारतीय अभिव्यक्ति का विस्तार है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)