अहम होंगे इन चुनावों के सबक
Updated at : 25 May 2016 12:37 AM (IST)
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पवन के वर्मा पूर्व प्रशासक एवं राज्यसभा सदस्य पांच राज्यों की विधानसभा के लिए हुए चुनावों के परिणाम आ चुके हैं. टीवी पर 24X7 चलनेवाले समाचार चैनलों द्वारा दी जा रही खबरों की आंधी में बड़ी बातें तो सामने आ जाती हैं, पर सुर्खियों के पीछे छिपे निहितार्थों के विश्लेषण के लिए तो तूफान के […]
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पवन के वर्मा
पूर्व प्रशासक एवं राज्यसभा सदस्य
पांच राज्यों की विधानसभा के लिए हुए चुनावों के परिणाम आ चुके हैं. टीवी पर 24X7 चलनेवाले समाचार चैनलों द्वारा दी जा रही खबरों की आंधी में बड़ी बातें तो सामने आ जाती हैं, पर सुर्खियों के पीछे छिपे निहितार्थों के विश्लेषण के लिए तो तूफान के बाद के शांति ही बेहतर होती है.
असम में भाजपा ने सुंदर जीत दर्ज की, मगर पूरे तीन कार्यकालों के कांग्रेस शासन के विरुद्ध उठी सत्ता विरोधी लहर को देखते हुए इसकी ही उम्मीद भी थी. इसके अलावा संभवतः चुनावी अखाड़े में कांग्रेस के अकेले उतारने पर मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का जोर भी पार्टी के लिए भारी पड़ा. यह भी एक सबक है कि चुनावी मुश्किलों से सामना होने पर सही समय पर फैसला लेना अहम होता है.
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सही मायनों में विजेता बन कर निकलीं. उन्होंने सारे विपरीत अनुमानों को झुठलाते हुए 2011 में जीतीं 184 सीटों से आगे बढ़ कर 211 सीटें निकालने में कामयाब रहीं. निहितार्थ यह रहा कि वाम दलों को पीछे छोड़ते हुए कांग्रेस प्रमुख विपक्षी पार्टी बनने में सफल हुई और अपने धुआंधार अभियान के बावजूद भाजपा कोई वास्तविक फायदा हासिल नहीं कर सकी. परिणाम आने के बाद ममता ने कहा कि वह वैचारिक आधार पर भाजपा के विरुद्ध हैं. भविष्य की रणनीति के तहत उन्होंने एक संघीय मोर्चे के संकेत दिये, जिसमें कांग्रेस एक भागीदार तो हो सकती है, पर सीपीएम नहीं.
तमिलनाडु में सत्ता बारी-बारी से अन्नाद्रमुक और द्रमुक के बीच झूलती रही है. इस बार अन्नाद्रमुक के लिए मुकाबला हारने की बारी थी, मगर जयललिता को इसका श्रेय जाता है कि वह इस ढर्रे को तोड़ने में सफल रहीं. गौरतलब है कि दोनों ही दलों को मिले मतों का प्रतिशत लगभग बराबर है.
केरल से आये नतीजे अनुमानों के अनुरूप ही थे. वहां भी कांग्रेसनीत मोर्चे और वामपंथी मोर्चे में एक के बाद दूसरा सत्तासीन होता रहा है. इस बार वामदलों की बारी थी और वह कामयाब भी रहे. इस पर बहुत बातें हो रही हैं कि वहां भाजपा संसदीय चुनावों के दौरान हासिल अपने 10 प्रतिशत मत इस बार भी बरकरार रखने में सफल रही, किंतु उसने वहां जितनी ताकत लगायी, उसे देखते हुए यह उपलब्धि शायद ही जश्न की वजह बन सकती है. मत प्रतिशत को सीटों की अर्थपूर्ण संख्या में तब्दील करने में इसे अभी एक अरसा लगेगा.
मुझे ऐसा लगता है कि इन चुनावों से चार अहम अर्थ निकल आये हैं. पहला तो यह कि भारतीय चुनावी परिदृश्य में ममता, जयललिता या नीतीश कुमार सरीखे क्षेत्रीय नेता अब एक अहम वास्तविकता बन उभरे हैं और कांग्रेस और भाजपा दोनों को अपने चुनावी समीकरणों में इस तथ्य पर गौर करना पड़ेगा, वरना उनमें से कोई भी अगला संसदीय समर जीतने की आशा नहीं कर सकता. दूसरा, जहां तक भाजपा का सवाल है, असम में अपने प्रदर्शन के लिए वह तारीफ की हकदार है, पर इसके अतिरिक्त खुशी मनाने के लिए शायद ही कुछ और बचा है.
पश्चिम बंगाल और केरल में इसे हासिल सीटों की संख्या नगण्य है, जबकि तमिलनाडु और पुडुचेरी में इसका खाता भी नहीं खुला. अलबत्ता, इस एक तथ्य पर यह संतोष कर सकती है कि कांग्रेस भी कोई अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी. पर कांग्रेस जहां पश्चिम बंगाल, केरल और द्रमुक के साथ तमिलनाडु में मुख्य विपक्षी दल बन उभरी, वहीं पुडुचेरी में तो वह सत्तासीन होने में भी सफल रही.
तीसरा, हालांकि विधानसभा चुनावों के नतीजों से मतदाताओं की सोच के संकेत तो मिलते हैं, मगर राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य के लिए प्रायः ज्यादा कुछ स्पष्ट नहीं हो पाता. इन चुनावों में स्थानीय मुद्दे ज्यादा हावी होते हैं और किसी खास राज्य के मतदान ढर्रे की भूमिका भी अहम होती है.
मसलन, केरल और तमिलनाडु के दो दलों अथवा मोर्चों के बीच सत्ता का झूलना अगले वर्ष पंजाब अथवा उत्तर प्रदेश के चुनावों पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता. मगर कांग्रेस के लिए यह जरूरी है कि वह अपने प्राप्त परिणामों पर मंथन करे और भाजपा असम के आनंद से बाहर निकल यह सोचे कि केंद्र में पूर्ण बहुमत हासिल होने के बावजूद भी पूरे राष्ट्र के संदर्भ में वह कोई विशेष असर क्यों नहीं छोड़ पा रही है.
तथ्य यह है कि इस वर्ष के इन चुनावों के साथ ही उत्तर प्रदेश के अहम संघर्ष समेत अगले वर्ष होनेवाले चुनाव 2019 के फाइनल मुकाबले के पहले सेमीफाइनल सरीखे हैं. यह तो साफ है ही कि भाजपा 2014 की तरह अपने ही बूते बहुमत नहीं जुटा सकती. यही कांग्रेस के लिए भी सच है. दोनों को एक दूसरे को पराजित कर पाने के लिए सहयोगी दलों की आवश्यकता होगी. सो, अगले तीन वर्ष निस्संदेह काफी राजनीतिक उथल-पुथल के वर्ष रहेंगे.
(अनुवाद : विजय नंदन)
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