राजनीति के प्रचलित आख्यान को चुनौती

Published at :30 Dec 2013 5:17 AM (IST)
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राजनीति के प्रचलित आख्यान को चुनौती

।। चंदन श्रीवास्तव।। (एसोसिएट फेलो सीएसडीएस) बदलाव सर चढ़ कर बोलने लगे और बनी-बनायी धारणाएं धड़ाम होने लगें, तब जाकर राजनीति की नयी भाषा-परिभाषा गढ़ने की फिक्र करना कितना घातक साबित होता है, यह कोई भाजपा और कांग्रेस से सीखे. देश में राजनीति की तीसरी धारा की जमीन लगातार बढ़ती जा रही थी, लेकिन दोनों […]

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।। चंदन श्रीवास्तव।।

(एसोसिएट फेलो सीएसडीएस)

बदलाव सर चढ़ कर बोलने लगे और बनी-बनायी धारणाएं धड़ाम होने लगें, तब जाकर राजनीति की नयी भाषा-परिभाषा गढ़ने की फिक्र करना कितना घातक साबित होता है, यह कोई भाजपा और कांग्रेस से सीखे. देश में राजनीति की तीसरी धारा की जमीन लगातार बढ़ती जा रही थी, लेकिन दोनों पार्टियां अपने पुराने यकीन पर अडिग थीं कि देश में दल तो दो ही हैं और अन्य दल के नाम पर जो कुछ है वह यूपीए या एनडीए नाम की शेरवानी में रूमाल की तरह रखने और निकालने के लिए है. और अब, जबकि दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने राजनीति की सड़क और संसद दोनों ठिकानों पर अपनी झाड़ू फेर कर नये सिरे से सत्ता को गांधीटोपी पहनाने का करिश्मा कर दिखाया है, तो दोनों पार्टियां अपनी फटी हुई जेबों को टटोल कर मन मसोसते सोच रही हैं- हाय देश! हाय! जनादेश! तुम हमारी पकड़ से कहां गये!

आम आदमी पार्टी के अभ्युदय के ऐन पहले तक कांग्रेस और भाजपा दोनों का विश्वास था कि लोकतांत्रिक राजनीति का ककहरा हर बार शासन की उसी मनोहरपोथी से निकलने वाला है, जिसे इंदिरा गांधी को जवाहरलाल नेहरू थमा गये थे. इंदिरा गांधी के वक्त तक राजनीति में राग एकता-अखंडता का बजता था. उन्हें लगता था कि 60 करोड़ की आबादीवाले भारत की आकांक्षाओं की पतंग बीस-सूत्री कार्यक्रम की डोर में लपेटकर राजनीति के आसमान में उड़ायी जा सकती है. उन दिनों अर्थशास्त्र की सरकारी किताबों में भारत को खेतिहरों का देश कहा जाता था और कवि-कंठों में भारतमाता ग्रामवासिनी कहलाती थीं. खेतिहरों के देश को वैज्ञानिक चेतना से लैस करने की जरूरत के मद्देनजर कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद का एक ठेठ देसी संस्करण तैयार किया था. इस संस्करण पर सर्वधर्म समभाव और सामाजिक न्याय का कलफ चढ़ा था और भाजपा इसी कलफ को अपना खास गेरुआ रंग देने के लिए इसे बहुसंख्यकों की कीमत पर अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण की तरकीब कह कर प्रचारित करती थी. कांग्रेस अगर अपने को देश के वंचित तबकों का हिमायती बताने के लिए देश की विविधता और विशालता वाले पक्ष पर जोर देती थी, तो भाजपा देश की एकता-अखंडता की दुहाई देते हुए अपनी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की तुरही पर ‘हिन्दू घटा- देश बंटा’ के नारे सुनाया करती थी. दोनों में एका इस बात पर था कि देश की लोकतांत्रिक राजनीति में केंद्र को मजबूत होना चाहिए और राज्यों को खस्ताहाल, वर्ना क्षेत्रीयता-प्रांतीयता की विभाजनी राजनीति देश को तोड़ देगी.

साल अपने आखिरी मुकाम पर पहुंच रहा है, और देश का राजनीतिक आसमान आम आदमी पार्टी के रूप में एक नये सूरज के उगने की तैयारियों के बीच चुनावी गंगा में डूबकी लगाने को तैयार है, तो दोनों दल (भाजपा और कांग्रेस) अगले साल के लिए चुनावी मुकाबले के मुद्दे पुरानी टेक पर ही बना रहे हैं. यह टेक वही है ‘केंद्र मजबूत बने राज्य कमजोर रहें’. धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद के आख्यान को पुराना मान कर दोनों पार्टियों ने किनारे कर दिया है और उदारीकरण के रग-रेशों से विकास का एक महाआख्यान तैयार किया है. लोक-कल्याणकारी राज्य का मुखौटा तो कांग्रेस और भाजपा दोनों ही लगाये रखना चाहती है ताकि लोगों में विश्वास बना रहे कि राजसत्ता उनके जीवन और जीविका से जुड़ी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है. लेकिन, इस मुखौटे के पीछे की मंशा एकदम से बदल चुकी है. दोनों पार्टियां इस एक बात पर सहमत हैं कि देश का विकास (आर्थिक वृद्धि) तेजी से होना चाहिए और विकास का चेहरा ‘मानवीय’ होना चाहिए. विकास के मानवीय चेहरे की बात के पीछे मुराद यह जताने की होती है कि विकास के लिए विदेशी पूंजी और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन (जल, जंगल, जमीन) एक अनिवार्यता है, लेकिन इस अनिवार्यता पर अमल इस तरह होना चाहिए कि भारत एक तरफ आर्थिक महाशक्ति (राष्ट्रवाद का नया प्रत्यय) जान पड़े, तो दूसरी तरफ दुखी-दरिद्र जनता का हिमायती राज्य.

लोक-कल्याणकारी योजनाओं को हकदारी आधारित विविध अधिनियमों (सूचना का अधिकार, भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, मनरेगा, आदि) के जरिये चलाना और इन योजनाओं के निर्माण और क्रियान्वयन में पंचायती राज-व्यवस्था के माध्यम से जनता को भागीदार दिखाना- इसी सोच की उपज है. याद रहे, फिलहाल भारत में विकास की कोई भी गतिधारा बगैर पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के नहीं चलती. भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाते जाना है और लोगों की बुनियादी जरूरतों को लालकार्ड आधारित कार्यक्रमों के जरिये चलाये रखना है. विकास के महाआख्यान के ये दो छोर हैं. पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के मुद्दे इन दो छोरों को एक में समेटते हुए निकले थे. मिसाल के लिए रमन सिंह, शिवराज सिंह, शीला दीक्षित और अशोक गहलोत अपने-अपने राज्यों में समान रूप से जनता के सामने अपने सुशासनी रिकॉर्ड को बेहतर बताते हुए विकास के लोक-कल्याणकारी पक्ष पर जोर दे रहे थे. इन राज्यों में नरेंद्र मोदी घूम-घूम कर अगर लोगों को यह याद दिला रहे थे कि केंद्र में भाजपा सर्वाधिक तेज गति से विकासधारा बनाये रख सकती है और कांग्रेस इस मोरचे पर फेल साबित हुई है, तो राहुल गांधी यह कहते हुए नजर आ रहे थे कि राज्यों को विकास के लिए पैसा ‘हमने’ दिया है.

अचरज नहीं कि लोकसभा के चुनावों के मुद्दे- ‘देश की तेज आर्थिक-वृद्धि’ और ‘मानवीय चेहरेवाला’ विकास’ के इन दो छोरों से निकलेंगे. वोट मांगते हुए एनडीए द्वारा याद दिलाया जायेगा कि यूपीए तेज गति से विकास कर पाने में नाकाम हुआ है और भ्रष्टाचार उसकी विकास-योजनाओं का उप-उत्पाद व महंगाई लचर शासन की उपज है, तो यूपीए द्वारा उसके शासनकाल में घरेलू मोरचे पर भारत के ‘अतुल्य’ और बाहरी मोरचे पर निवेश न्यौत सकने लायक भारी ‘साख वाला देश’ साबित होने की बात याद दिलायी जायेगी. राज्य-आधारित पार्टियों के मुद्दे भी इसी मुहावरे से फूटेंगे. अंतर बस इतना होगा कि राज्य-आधारित पार्टियां अपने प्रादेशिक शासन के रिकार्ड को केंद्र की तुलना में बेहतर साबित करते हुए चुनावी मुद्दे गढ़ेंगी. जनता भ्रष्टाचार और महंगाई को मुख्य मुद्दा मान कर वोट देने जायेगी और तीसरे धारे की राजनीति को मजबूत बनाये रखने की तरफदार आम आदमी पार्टी इन दोनों पार्टियों से पूछेगी कि विकास के आपके महाआख्यान में गांव को गणराज्य, शहरी मोहल्लों को अपना खुदमुख्तार और नागरिक को अपना भाग्य-विधाता बनाने की कोई तरकीब है क्या? देश के संसाधनों पर सीधे ‘जनता का हक’ 2014 की चुनावी जंग में राजनीति का नया मुहावरा होगा.

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