रोज एक परिजन को खोया!

Published at :28 Dec 2013 4:41 AM (IST)
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रोज एक परिजन को खोया!

।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।। (वरिष्ठ साहित्यकार) कोई जाता है तो जाये, खुशी से जाये. मगर किसी के मन के पांकिल खेत में अपना पदचिह्न् क्यों छोड़ जाता है? धनही खेत का वह पंक दिन बीतने के साथ ही सख्त होता जाता है और सख्त होते जाते हैं पैरों के वे निशान, जो चिरयात्री अपने पीछे […]

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।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।।

(वरिष्ठ साहित्यकार)

कोई जाता है तो जाये, खुशी से जाये. मगर किसी के मन के पांकिल खेत में अपना पदचिह्न् क्यों छोड़ जाता है? धनही खेत का वह पंक दिन बीतने के साथ ही सख्त होता जाता है और सख्त होते जाते हैं पैरों के वे निशान, जो चिरयात्री अपने पीछे सहेज जाते हैं. ऐसे में याद आती हैं ठाकुर प्रसाद सिंह की ये पंक्तियां, जो उन्होंने देवघर के प्रवास-काल में लिखी थीं- धानों के खेतों-सी गीली, मन में यह जो राह गयी है. उस पर से लौट गये प्रियतम के, पैरों की छाप नयी है. वे कहते हैं कि पैरों के चिह्नें में निथराया जल अगर दर्द से आंखों में उमड़ता है, तो ‘आंखों में भर आये उस जल को, तुम वंशी से पोंछो.’ लेकिन होता यह है कि आंसू पोछने की वंशी खुद भींग-भींग जाती है. लोग कहते हैं कि समय के साथ हरा घाव भर जाता है, मगर ऐसा कहां होता है? उमाकांत मालवीय सच कहते हैं- टूटे आस्तीन का बटन, या कुर्ते की खुले सिवन, कदम-कदम पर मौके, याद तुम्हें करने के.

इस साल जिन आत्मीयों को मैंने खोया, उनमें कुछ बहुत नामी साहित्यकार थे. मसलन नयी कहानी आंदोलन के कथाकार त्रयी में सबसे विवादास्पद साहित्यकार राजेंद्र यादव. उनसे मेरा एक और रिश्ता था कि मैं ओएनजीसी के मुख्य प्रबंधक के रूप में उनकी ‘हंस’ पत्रिका के लिए ‘अन्नदाता’ भी था और अकसर फोन पर वे मुङो इसी विशेषण से संबोधित करते थे. कोलकाता प्रवास में मैं जिन साहित्यकारों के बहुत निकट रहा, उनमें अरुण प्रकाश अवस्थी और सुशील गुप्ता का इस वर्ष हमें छोड़ जाना हमारे जीवन में बहुत शून्यता भर गया है. अवस्थीजी, डॉ चंद्रदेव सिंह और मेरी एक कवि सम्मेलनी तिकड़ी थी. तीनों कोलकाता के आसपास के कवि सम्मेलनों में एक साथ जाते थे. अवस्थीजी का चेहरा और बाना राजस्थानी राजाओं की तरह पौरुष से भरा था और वाणी में ओज थी. वे सेंट्रल बैंक में अधिकारी थे और हंसी-मजाक में भी लोगों का बड़ा से बड़ा उपकार कर बैठते थे. चंद्रदेव भाई स्कूल में हिंदी प्रवक्ता थे और काशीपुर में एक छोटे-से किराये के कमरे में गुजारा करते थे. मैं उन दिनों लेक गार्डेन के पास एक श्रमिक क्वार्टर में रहता था. अवस्थीजी बड़ा बाजार में एक छोटे-से बासे में रहते थे. जब तीनों कोलकाता से एक साथ निकलते थे, तब दड़बे से निकले कबूतरों की तरह सारा आकाश अपने पंखों में समेट लेते थे. पिछले साल चंद्रदेव भाई चले गये, इस साल अरुणजी भी कोलकाता के बड़ा बाजार इलाके को उदास कर गये. मेरा तो एक बहुत अंतरंग भाई चला गया. सितंबर में ही प्रेमशंकर त्रिपाठी से बात हो रही थी कि अवस्थीजी जीवन भर साहित्य-साधना में रत रहे. उन्हें कोई बड़ा पुरस्कार मिलना चाहिए. मगर सच्चा साहित्यकार कब उसके लिए बैठा रहता है!

सुशील मुझसे कुछ साल छोटी थी, इसलिए हम दोनों में भाई-बहन का एक अनुशासन था, जिसमें हंसी-मजाक भी जम कर होती थी. वह दूरदर्शन के कोलकाता केंद्र में हिंदी की प्रोड्यूसर थी. अकेली लेक गार्डेन के एक फ्लैट में शान से रहती थी. दिन भर रिकॉर्डिग के कामों के बाद जो समय मिलता था, उसमें बंगला से हिंदी में अनुवाद करती थी. एक टीवी प्रोड्यूसर के रूप में उसने जो काम कर दिखाया, वह इतिहास में दर्ज करने लायक है. वह अपने कामों को दिल्ली केंद्र की प्रस्तुति से बेहतर बनाने के लिए पागल की तरह खटती थी. दूरदर्शन जैसा कृतघ्न विभाग न होता, तो वह देश की जानी-मानी प्रोड्यूसर कहलाती. उसने अनुवाद का काम भी जम कर किया. खासकर महाश्वेता देवी और तसलीमा नसरीन के लगभग सभी उपन्यास बंगला से हिंदी में अनुवाद उसने किये. उसकी आवाज मोटी थी और नाम भी पुरुष-वाचक. इसलिए फोन पर अकसर लोगों को भ्रम हो जाता था. मुंह में सिगरेट दबाये, लगभग अधखाये, दिन-रात खटना उसे अच्छा लगता. दिसंबर में वह भी तमाम आधे-अधूरे कार्यो को पूरा किये बिना चली गयी.

काशी में भाई श्रीकृष्ण तिवारी का जाना नवगीत विधा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ का ढह जाना माना जायेगा. वे पिछले कुछ वर्षो से पारिवारिक त्रसदियों से लगातार जूझ रहे थे. मेरे हस्तक्षेप से मृत्यु से पहले उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से दो लाख का ‘हिंदी गौरव’ सम्मान मिला, तो उनका गला भर आया. बोले ‘अब मैं कम-से-कम दो साल तक इस रुपये से काट लूंगा.’ मगर उस सम्मान की राशि मिलने के एक पखवाड़े के बाद ही वे चल बसे. उन्होंने बहुत-से चर्चित गीत रचे, मगर आपातकाल के दौरान लिखा उनका यह गीत चेतनाशील व्यक्तियों में बेहद लोकप्रिय हुआ- भीलों ने बांट लिया वन, राजा को खबर तक नहीं.

गोरखपुर के प्रसिद्ध कवि-समीक्षक परमानंद श्रीवास्तव भी कुछ दिन पहले शहर सूना कर गये. सत्तर के दशक में काशी के साहित्याकाश में जब मैं उभरा था, उदय प्रताप कॉलेज के मंच पर उनकी अध्यक्षता में मैंने जब गीत पढ़ा, तो उन्होंने भावुक होकर गले से लगा लिया. साहित्यकारों के बीच संबंधों की वह गर्माहट अब नहीं रह गयी है, मगर परमानंदजी के आत्मीय स्नेह की वह गर्माहट मैं हमेशा महसूस करता रहा हूं.

मैथिली साहित्य के दो कर्णधार मायानंद मिश्र और जीवकांत का जाना मेरे लिए भी व्यक्तिगत क्षति है. मायानंदजी मैथिली के समर्थ गीतकार, लोकप्रिय उद्घोषक थे और मैथिली आंदोलन के नायक भी थे. सहरसा में रह कर उन्होंने हिंदी और मैथिली में समान रूप से लेखन कर गीत और कथा विधा को परिपुष्ट किया. बिहार के रेडियो श्रोता आज भी पटना केंद्र के मैथिलीभाषी ‘घूटर भाई’ को नहीं भूल पा रहे हैं, जबकि मायाबाबू कई दशक पहले अध्यापक बन गये थे. हिंदी में उनका उपन्यास ‘प्रथमं शैलपुत्री च’ और ‘मंत्रपुत्र’ के अलावा ‘माटी के लोग सोने की नैया’, ‘पुरोहित’ और ‘स्त्रीधन’ विशेष चर्चित हुआ. जीवकांतजी ड्यौढ़ जैसे छोटे-से गांव में शिक्षण-कार्य करते हुए खांटी मैथिली में बरसों लिखते रहे. उनके छह काव्य-संग्रह, चार कथा-संग्रह, चार बालकविता संकलन, पांच उपन्यास और दो खंड आत्मकथा के प्रकाशित हो चुके हैं. उन्हें साहित्य अकादमी के अलावा किरण सम्मान, प्रबोध साहित्य सम्मान और वैदेही सम्मान प्राप्त हुए थे. इन दोनों स्तंभों के गिर जाने से मैथिली ही नहीं, संपूर्ण भारतीय साहित्य की क्षति हुई है, क्योंकि ये अपने लेखन के बल पर पूरे देश में समादृत थे.

देहरादून के ओमप्रकाश वाल्मीकि ने दलित साहित्य में स्पृहणीय स्थान बना लिया था. एक वर्ष से कैंसर से पीड़ित थे. तमाम कोशिशों के बावजूद नहीं बचाया जा सका. इन सबको वर्षात में श्रद्धांजलि देते हुए दो पंक्तियां निवेदित करना चाहता हूं- रोज एक परिजन को खोया, पाकर लंबी उमर आज मैं, जी भर रोया.

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