जो भी हो, मुकदमा तो जीत गये न!

Published at :28 Dec 2013 4:39 AM (IST)
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जो भी हो, मुकदमा तो जीत गये न!

।। सत्य प्रकाश चौधरी।।(प्रभात खबर, रांची) बहुत समय पहले की बात है. एक गांव में एक ठाकुर साहब थे. घर में बीवी थी न बच्चे, पर हर छह महीने-साल भर पर उनके यहां से पूरे गांव में मिठाई बंटती थी. लोग मिठाई लेते, पर यह नहीं पूछते थे कि किस बात की मिठाई है. लोग […]

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।। सत्य प्रकाश चौधरी।।
(प्रभात खबर, रांची)

बहुत समय पहले की बात है. एक गांव में एक ठाकुर साहब थे. घर में बीवी थी न बच्चे, पर हर छह महीने-साल भर पर उनके यहां से पूरे गांव में मिठाई बंटती थी. लोग मिठाई लेते, पर यह नहीं पूछते थे कि किस बात की मिठाई है. लोग खुद-ब-खुद जान जाते थे कि ठाकुर साहब ने कोई मुकदमा जीता होगा. दरअसल, ठाकुर साहब शौकीन आदमी थे.

शौक भी ऐसे-वैसे नहीं, घर बिकवा देनेवाले. शराब और शबाब तो अपनी जगह थे ही, इनसे ज्यादा बढ़ कर उन्हें शौक था मुकदमा लड़ने का और जीतने का. उन पर जब कोई मुकदमा दायर होता, तो बोलते- जैसे दस चल रहे हैं, वैसे एक और सही. सुबह तेल मालिश, नहान-खान-पान के बाद बुलेट पर सवार होते और कंधे पर दुनाली लटका कर कचहरी की ओर निकल पड़ते. कचहरी में वकीलों के दावं-पेच और पैंतरे उन्हें ‘बाई जी’ की अदाओं से बढ़ कर लगते. अदालती दलीलों और बहसों के आगे दादरा और ठुमरी के बोल फीके लगते.

और, मुकदमा जीतने में जिस चरम आनंद की अनुभूति होती, वह अनुभूति उन्हें बड़े-बड़े वैद्य और हकीम मर्दानगी बढ़ानेवाली तरह-तरह की दवाएं खिला कर भी नहीं दिला पाते थे. वह इश्क और जंग के अलावा मुकदमा जीतने के लिए भी सब कुछ जायज मानते थे. अगर किसी लड़की पर उनका दिल आ जाये, तो वह उसका और उसके मां-बाप, भाई-बहन वगैरह का इस कदर पीछा करते और कराते कि लड़की अपने आप उनका बनना कबूल कर लेती. जहां तक बात जंग की है, तो उन्होंने न जाने कितनों को छह इंच छोटा किया. वह पानीपत जैसे किसी मैदान में भले न लड़े हों, पर उनके आम के बगीचे का नाम ‘कत्ली बगिया’ आज भी है. और, मुकदमे में तो वह सारी हदों को लांघ जाते थे.

वकील, पेशकार से लेकर इजलास तक में उनका चांदी का जूता चलता था और गवाहों पर चमरौधा जूता. गवाह इस पर भी नहीं माना, तो कत्ली बगिया में पड़ा मिलता था. जो भी हो, अंतत: ठाकुर साहब मुकदमा जीतते ही थे. हां, उनकी एक और खासियत थी. हर जीत के बाद बड़े जोर ‘सत्यमेव जयते’ का जयकारा लगाते थे. यह उलटबांसी लगेगी, पर वह बात-बात पर गांधी जी का नाम लेते थे और विनोबा के आंदोलन में उन्होंने कुछ परती जमीन भी दान की थी. यह अलग बात है कि जब दान पानेवालों ने परती तोड़ दी, तो ठाकुर साहब उस जमीन पर फिर से काबिज हो गये थे.. आप ऊब तो नहीं रहे? सोच रहे होंगे कि आजादी के ठीक बाद की यह कहानी अभी क्यों सुना रहा हूं? तो दोस्तो, दंगों के इल्जाम में अभी एक बड़े नेता जब मुकदमा जीते तो उनके पार्टी दफ्तर में पटाखे फूटने लगे, मिठाई बंटने लगी. बस यहीं पर मुङो ठाकुर साहब की कहानी याद आ गयी. लेकिन, एक बात बताना मैं भूल ही गया था, जो ठाकुर साहब कत्ल के तमाम मुकदमों में बरी होते रहे, वह अंत में लफुआगीरी के एक मामले में नप गये थे.

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