हमें किधर ले जायेगी यह डगर!

Updated at : 29 Jan 2016 6:39 AM (IST)
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हमें किधर ले जायेगी यह डगर!

उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली के इर्दगिर्द बसीं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की विशाल काॅलोनियों, 1990 के बाद बने अपार्टमेंट्स और नव-निर्मित बिल्डर्स फ्लैट्स में रहनेवाले ज्यादातर लोग यहां के दफ्तरों-संस्थानों में कार्यरत हैं या आसपास के इलाकों में नौकरी या व्यापार करते हैं. आर्थिक सुधारों के दौर के साथ आबाद हुई इन बस्तियों के निवासियों […]

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उर्मिलेश
वरिष्ठ पत्रकार
दिल्ली के इर्दगिर्द बसीं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की विशाल काॅलोनियों, 1990 के बाद बने अपार्टमेंट्स और नव-निर्मित बिल्डर्स फ्लैट्स में रहनेवाले ज्यादातर लोग यहां के दफ्तरों-संस्थानों में कार्यरत हैं या आसपास के इलाकों में नौकरी या व्यापार करते हैं. आर्थिक सुधारों के दौर के साथ आबाद हुई इन बस्तियों के निवासियों का बड़ा हिस्सा मध्यवर्गीय-निम्न मध्यवर्गीय श्रेणी का है. पहनावे, बोलचाल और खान-पान के स्तर पर यह आधुनिक दिखता समाज है.
पार्कों में सुबह की सैर पर निकलनेवाले अधेड़ और युवा आधुनिक वेश-भूषा में दिखते हैं. पार्कों के सामने गाड़ियों की लंबी कतारें लग जाती हैं. हालांकि, पार्कों और सड़कों की हालत उतनी अच्छी नहीं. सर्दी हो या गर्मी, योग की तरफ युवाओं और अधेड़ लोगों का खास आकर्षण है. युवाओं की बड़ी संख्या कानों में इयरफोन लगा कर सैर करती है. जिन सोसायटियों या काॅलोनियों में वे रहते हैं, उनमें ज्यादातर में एक-एक मंदिर भी हैं.
वहां एक पुजारी भी नियुक्त है. ज्यादातर मंदिरों में लाउडस्पीकर है. जाति-वर्ण के आधार पर बनी महिला कीर्तन-मंडलियां भी हैं. कामकाजी लोग काम पर जाते हैं, तो गृहणियां आमतौर पर कीर्तन मंडलियों की तरफ या खास ढंग की निम्न-मध्यवर्गीय संवेदना जगाते टीवी सीरियलों की तरफ मुखातिब होती हैं. भौतिक संरचनाएं यहां बदली हैं, लेकिन लोग पुरानी मानसिकता के साथ चिपके हुए हैं.
दिल्ली के आसपास बसे वैशाली, वसुंधरा, इंदिरापुरम, नोएडा या गुड़गांव सिर्फ कुछ रिहायशी इलाकों के नाम भर नहीं हैं.
हमारे आर्थिक-सांस्कृतिक विकास की तस्वीर हैं ये. आधुनिक मध्यवर्ग-निम्न मध्यवर्ग की सामाजिकता, उसके जीवन-मूल्य और सभ्यता-संस्कृति के ये प्रतीक-स्थल हैं. इन दिनों यहां के बड़े बिल्डरों और भवन निर्माताओं में काॅलोनियों-अपार्टमेंट्स का नामकरण यूरोपीय-अमेरिकी तर्ज पर करने की होड़ सी मची है. किसी ने अपने अपार्टमेंट्स का नाम ‘प्रिंसटन’ रखा है, तो किसी ने ‘वेलिंग्टन’, किसी ने ‘ग्रीन स्क्वाॅयर’ तो किसी ने ‘पेबेल्स’ या ‘कैलिफोर्निया क्वीन’. अगर आप इन काॅलोनियों के बगल से गुजरें, तो सैकड़ों की संख्या में खड़े कंक्रीट के इन जंगलों के बीच शायद ही आपको किसी नयी सोसायटी या नवनिर्मित अपार्टमेंट्स का नाम हिंदी या किसी भारतीय भाषा में दिखे. मगर इनके अंदर पुरानी सामंती सोच और संस्कार का दलदल पसरा है. इनमें रहनेवाले लोग ज्यादातर ‘सवर्ण हिंदू’ हैं.
बुजुर्गों ने दोपहर के बाद ताश खेलनेवाली जो टीम बनायी है, उसमें आमतौर पर सजातीय लोग होते हैं. अगर कहीं ओबीसी हैं, तो उन्होंने अपनी टीम बना ली है. दलित और अल्पसंख्यक आमतौर पर किसी समूह में नहीं दिखाई देते. बड़े अफसरान-नेताओं को छोड़ दें, तो फ्लैटों में रहनेवाले आम दलित अलग-थलग ही रहते हैं या रखे जाते हैं.
इन आवासीय काॅलोनियों में किराये के घर भी जाति पूछे बगैर नहीं दिये जाते. अगर कोई मुसलिम या दलित किराये के मकान की तलाश कर रहा है, तो उसे इन काॅलोनियों में फ्लैट पाना असंभव सा है. हाल ही में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने एक दिलचस्प स्टोरी छापी कि कैसे दक्षिण दिल्ली की एक पाश काॅलोनी में किराये के मकान में रहनेवाले एक दलित-बुद्धिजीवी दंपत्ति को सवर्ण-हिंदू मालकिन ने उनकी जाति का पता चलते ही महीने के अंदर ही फ्लैट छोड़ने को कह दिया. नवधनाढ्य इलाका होने के चलते एनसीआर में हालात और भी खराब हैं.
अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में भारतीय मध्यवर्ग-निम्न मध्यवर्ग की यह तस्वीर सिर्फ दिल्ली या एनसीआर तक सीमित नहीं है.
दक्षिण और मध्य के कुछेक मेट्रोपोलिटन इलाकों को छोड़ दें, तो कमोबेश यह संपूर्ण शहरी भारत की तस्वीर है. नेहरू-युग में भारतीय मध्यवर्ग का विस्तार और विकास आज जैसा नहीं हुआ था, पर जो कुछ सीमित विकास था, उसकी चेतना आज के मुकाबले कुछ समुन्नत और समावेशी थी. उस पर आजादी की लड़ाई के दौरान उभरी विभिन्न राजनीतिक धाराओं का प्रभाव था, जो बाद के दिनों में जातीय-सांप्रदायिक विद्वेष के उभार के चलते खत्म होता गया.
यह महज संयोग नहीं कि शहरी मध्यवर्ग-निम्न मध्यवर्ग का बड़ा हिस्सा आज के दौर में ‘हिंदुत्ववादी राजनीति’ का सबसे मुखर आधार बन कर उभरा है. अस्सी के दशक तक ‘हिंदुत्ववादी राजनीति’ का मुख्य आधार सिर्फ शहरों-कस्बों के व्यापारियों के बीच ही था. पर बाद के दिनों में यह ‘हिंदू सवर्ण मध्यवर्ग’ में तेजी से फैलता गया. विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में भी इस जहरीले माहौल का असर साफ देखा जा सकता है. इसी दौर में दलित-ओबीसी छात्रों की संख्या भी बढ़ी. पहले उच्च शिक्षा में उनकी पहुंच नगण्य थी.
जैसे-जैसे वे शिक्षित हुए, उनके खिलाफ जातीय-विद्वेष भी बढ़ता गया. जाति-आधारित अन्याय और उत्पीड़न के मामले भी सामने आने लगे. यह सिर्फ हैदराबाद सेंट्रल युनिवर्सिटी तक सीमित नहीं, जहां के रोहित वेमुला ने 17 जनवरी को आत्महत्या की, दिल्ली के एम्स, जेएनयू और डीयू में भी दलित-उत्पीड़ित जाति के छात्रों के साथ भी उत्पीड़न के मामले सामने आते रहे हैं. कुछ संस्थानों में दलित छात्रों की आत्महत्या के मामले दर्ज हो चुके हैं. मुख्यधारा का मीडिया इन्हें आमतौर पर बड़ी खबर नहीं बनाता. लेकिन, ‘दलित मीडिया वाॅच’ सहित अनेक सोशल मीडिया साइटों पर आज ऐसे मामले लगातार उद्घाटित हो रहे हैं.
सवाल उठता है, तेजी से विकसित हो रही हमारी अर्थव्यवस्था हमारे समाज के विकास, सभ्य और समावेशी होने का मंत्र क्यों नहीं दे पा रही है, हम किस तरह का विकास कर रहे हैं और यह हमारे समाज को किधर ले जा रहा है!
लगातार उग्र होते वर्ण-भेद, जातीय उत्पीड़न और सांप्रदायिक विद्वेष के बीच हम कैसा देश बना रहे हैं! कहीं हम उसी तरफ तो नहीं जा रहे हैं, जिसके बारे में भारतीय संविधान की पहली प्रति देश को समर्पित करते हुए डॉ आंबेडकर ने चेताया था, ‘26 जनवरी, 1950 को हम अंतविर्रोधों से भरे नये जीवन में दाखिल होने जा रहे हैं.
राजनीति के स्तर पर तो हमारे समाज में समानता होगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी. राजनीति में ‘एक व्यक्ति-एक वोट-एक हैसियत’ का सिद्धांत लागू रहेगा, लेकिन सामाजिक-आर्थिक जीवन में इस सिद्धांत को नजरंदाज किया जाता रहेगा. हमें अपने समाज के इस अंतविर्रोध को जल्द खत्म करना होगा.
अगर ऐसा नहीं किया गया, तो राजनीतिक लोकतंत्र की हमारी संरचना खतरे में होगी और जो लोग असमानता के शिकार हैं, वे ऐसी संचरना को ध्वस्त करने में जुटेंगे.’ वक्त अभी भी है, बशर्ते हम अपने मौजूदा रास्ते को बदलने पर सहमत हो जायें. समानता, समावेशी विकास और सेक्युलरिज्म के बगैर भारतीय राष्ट्रराज्य के सुंदर भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती.
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