यह धुआं धुआं सा क्यों है मेरे भाई?

Updated at : 02 Dec 2015 12:46 AM (IST)
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यह धुआं धुआं सा क्यों है मेरे भाई?

पड़ोसी बहुत सफाई पसंद हैं. सफाई की और कूड़ा फूंक दिया घर के सामने ही. बहुत समझाया कि प्रदूषण का ख्याल रखो. सफाई कर्मी रखो. मगर कभी कान पर जूं न रेंगी. मनमानी करेंगे शान से. बंदा ठहरा अस्थमा का मरीज. अन्य नाना प्रकार की व्याधियों से भी पीड़ित. खुद को घर में कैद कर […]

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पड़ोसी बहुत सफाई पसंद हैं. सफाई की और कूड़ा फूंक दिया घर के सामने ही. बहुत समझाया कि प्रदूषण का ख्याल रखो. सफाई कर्मी रखो. मगर कभी कान पर जूं न रेंगी. मनमानी करेंगे शान से. बंदा ठहरा अस्थमा का मरीज. अन्य नाना प्रकार की व्याधियों से भी पीड़ित. खुद को घर में कैद कर रखा है. यह सब सिगरेट की देन है. तीस साल बाद होश तब आया, जब सिगरेट ने उसे पीना शुरू किया. शुक्र है सीधी-साधी पत्नी ने समय रहते आतंकीस्वरूप धर लिया, वरना तसवीर बन कर टंगा होता दीवार पर.

बहरहाल, बंदे की पत्नी पड़ोसी के कूड़ा जलाओ अभियान के विरुद्ध जब-तब मोर्चा लेती रहती है. लेकिन सब बेअसर. उलटा मोहल्ला भर टैक्स-फ्री मनोरंजन का लुत्फ उठाता है. थक-हार कर बंदा सुबह अपने खिड़की-दरवाजे बंद रखता है.

दीवाली आनेवाली है. पड़ोसी ने सुबह-सुबह साल भर का जमा कूड़ा निकाला. आदतन फूंक दिया, वहीं अपने घर के ही सामने. इसका नतीजा- भयंकर बदबूदार और रसायनी धुआं ही धुआं फैल गया और घुस गया आसपास के दर्जन भर घरों में.

बंदे का घर भी नहीं बचा. बंद खिड़की-दरवाजों की महीन दरारों के रास्ते घरों में धुआं फैलता गया. उसे अस्थमा का अटैक पड़ गया. उसको बेतरह खांसी और सांस लेने में दिक्कत होने लगी.

आतंक की पर्याय पत्नी को मानो टेलर मेड पिच मिल गयी. पड़ोसी को चुनिंदा असंसदीय शब्दों के बाणों से बेतरह बींध दिया. आस-पास के सताये लोग भी हौसला-अफजाई को आ जुटे.

बंदे की तबियत खराब की खबर से पड़ोसी बैकफुट पर दिखा. किसी भी बाण का जवाब नहीं दे पाया. पुलिस में रपट होने की बात सुनी तो कांप गया. हे भगवान! लड़की छेड़ने के इल्जाम में बरसों पहले हुई पिटाई याद आ गयी. पूरे पांच हजार देकर छूटा था.

इधर बंदे की तबियत नियंत्रण से बाहर हो गयी. डॉक्टर की लिखी हुई दवाएं भी बेअसर. पत्नी ने झगड़े पर क्रमशः लगाया. आजू-बाजू वालों की मदद से अस्पताल लेकर भागी. बंदे को आक्सीजन लगायी गयी. तमाम जरूरी इंजेक्शन भी ठुके.

इस दौरान शर्मिंदा पड़ोसी अपनी गाड़ी व परिवार सहित बंदे की खिदमत में जुटा रहा. कान पकड़ कर बार-बार माफी मांगी- भाभी जी, हमका माफी दे दो. आइंदा ऐसी भूल नहीं होगी. बस कोर्ट-कचेहरी न करो. सरकारी मुलाजिम हूं. नौकरी चली जायेगी.

तभी बंदे को होश आया. अभी आंखों के सामने धुंधलका है. उसने पूछा- यहां धुआं-धुआं सा क्यों है मेरे भाई?

पड़ोसी ने बंदे का हाथ थामा- नहीं दोस्त, धुआं अब छंट गया है.

पड़ोसी वादा कर रहा है कि इस बार दीवाली पर वह पटाखे नहीं छोड़ेगा. दूसरों से कहेगा कि घर के सामने कूड़ा जलाना वीरता नहीं है. धुएं से किसी सांस रोगी की जिंदगी खतरे में पड़ सकती है. बंदे को पुरानी हिंदी फिल्में याद आ रही हैं. खलनायक हृदय परिवर्तन पर कहता था- मेरी आंखें खुल गयीं हैं…

वीर विनोद छाबड़ा

स्वतंत्र टिप्पणीकार

chhabravirvinod@gmail.com

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