लापता होते बच्चे और यह बेफिक्री!

Published at :06 Aug 2015 1:13 AM (IST)
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लापता होते बच्चे और यह बेफिक्री!

अरविंद जयतिलक स्वतंत्र टिप्पणीकार यह हैरान करनेवाला है कि सर्वोच्च अदालत द्वारा बार-बार ताकीद किये जाने के बाद भी केंद्र सरकार गुमशुदा बच्चों को लेकर संवेदनशील नहीं है. उल्टे गलत आंकड़ों के जरिये वह अदालत को गुमराह करने की कोशिश कर रही है. इससे नाराज अदालत ने सरकार को कड़ी फटकार लगायी है और खबरों […]

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अरविंद जयतिलक
स्वतंत्र टिप्पणीकार
यह हैरान करनेवाला है कि सर्वोच्च अदालत द्वारा बार-बार ताकीद किये जाने के बाद भी केंद्र सरकार गुमशुदा बच्चों को लेकर संवेदनशील नहीं है. उल्टे गलत आंकड़ों के जरिये वह अदालत को गुमराह करने की कोशिश कर रही है.
इससे नाराज अदालत ने सरकार को कड़ी फटकार लगायी है और खबरों के मुताबिक केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रलय पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है. इस मंत्रलय ने शीर्ष अदालत में दाखिल हलफनामे में कहा है कि 2013-15 के दौरान 25,834 बच्चे लापता हुए, जबकि इसके उलट राज्यसभा में कहा गया है कि 79,721 बच्चे लापता हुए.
अदालत के निर्देश के मुताबिक, अब सरकार को 7 अगस्त तक सही-सही आंकड़ा पेश करना होगा. पिछले महीने भी अदालत ने नाराजगी जताते हुए सरकार से जानना चाहा था कि 15 साल गुजर जाने के बाद भी जेजे एक्ट के तहत एडवाइजरी बोर्ड का गठन क्यों नहीं किया गया?
सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि विगत तीन वर्षो में तकरीबन दो लाख से अधिक बच्चे लापता हुए हैं.इनमें से अधिकतर बच्चों का इस्तेमाल बाल मजदूरी और देह व्यापार जैसे धंधों में हो रहा है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग कह चुका है देश में हर साल 40 हजार से अधिक बच्चे गुम होते हैं. एक जिम्मेवार राष्ट्र और संवेदनशील समाज के लिए यह शर्मनाक है.
पिछले साल सीबीआइ ने दिल्ली हाइकोर्ट के समक्ष तथ्य पेश किया कि देश में बच्चों का अपहरण करनेवाले कई गैंग सक्रिय हैं, लेकिन इन गैंगों की पहचान नहीं की गयी है. नतीजा गायब होते बच्चों की तादात बढ़ती ही जा रही है.
सरकार को समझना होगा कि सिर्फ कानून बना देने मात्र से इस समस्या का समाधान होनेवाला नहीं. गौर करना होगा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 और 24 में व्यवस्था है कि मानव तस्करी व बालश्रम के अलावा 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखाने और जोखिम भरे कार्यो में नहीं लगाया जायेगा.
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग स्वीकार चुका है कि उसके पास बालश्रम के हजारों मामले दर्ज हैं. ऐसे में सवाल है कि आखिर सरकार लापता बच्चों की सुध क्यों नहीं ले रही है. वह भी तब, जब आज भारत बच्चों की तस्करी वाले दुनिया के खतरनाक देशों में शुमार हो चुका है.
भारत दुनिया में 14 साल से कम उम्र के सबसे ज्यादा बाल श्रमिकों वाला देश है. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक, दुनियाभर में तकरीबन बीस करोड़ से अधिक बच्चे जोखिम भरे कार्य करते हैं और उनमें से सर्वाधिक संख्या भारतीय बच्चों की ही है. यूनिसेफ के मुताबिक, विश्व में करीब दस करोड़ से अधिक लड़कियां विभिन्न खतरनाक उद्योग-धंधों में काम कर रही हैं.
इसके अलावा अराजक तत्व सुनियोजित तरीके से बच्चों का इस्तेमाल हथियारों की तस्करी और मादक पदार्थो की सप्लाई में भी कर रहे हैं. अगर सरकार चेतती नहीं हैं, तो वह दिन दूर नहीं जब अराजक तत्व बच्चों का इस्तेमाल विध्वंसक गतिविधियों में भी करेंगे. उचित होगा कि सरकार आंकड़ों की बाजीगरी से बाहर निकल संवेदनशीलता का परिचय दे.
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