लालू प्रसाद के लिए कड़ी परीक्षा की घड़ी

Published at :01 Oct 2013 5:03 AM (IST)
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लालू प्रसाद के लिए कड़ी परीक्षा की घड़ी

बहुचर्चित चारा घोटाले में फैसला करीब दो दशक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आया है. न्याय में इतनी देरी के कारण पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इससे भ्रष्टाचारियों को सबक मिलेगा और वे भविष्य में सत्ता का दुरुपयोग करने से बाज आयेंगे. फिलहाल इस फैसले का महत्व यही है कि जिन्हें दोषी […]

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बहुचर्चित चारा घोटाले में फैसला करीब दो दशक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आया है. न्याय में इतनी देरी के कारण पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इससे भ्रष्टाचारियों को सबक मिलेगा और वे भविष्य में सत्ता का दुरुपयोग करने से बाज आयेंगे.

फिलहाल इस फैसले का महत्व यही है कि जिन्हें दोषी माना गया है, उनमें राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद भी हैं. 2014 के आम चुनाव को लेकर जिस प्रकार की सियासी बिसात बिछ रही थी, उसमें बिहार में लालू प्रसाद की महत्वपूर्ण भूमिका तय मानी जा रही थी.

इसलिए फैसले के बाद भारतीय राजनीति का यक्ष प्रश्न यही है कि अब लालू प्रसाद की राजनीति का भविष्य क्या होगा? सजायाफ्ता नेताओं को चुनाव के अयोग्य करार देनेवाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले की काट में केंद्र सरकार ने अध्यादेश का रास्ता नहीं अपनाया होता, तब कहा जा सकता था कि दोषी करार दिये जाने के साथ लालू प्रसाद के राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लग गया है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा दागियों के लिए उम्मीदवारी की राह तैयार करनेवाले अध्यादेश को बकवास कहे जाने के बाद यह भी माना जा सकता है कि अब लालू प्रसाद आम चुनाव या उसके बाद बननेवाली सरकार के गठन में शायद ही कोई भूमिका निभा पायें. लेकिन, राजनीति, संभावनाओं का खेल है.

इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि लालू प्रसाद के जेल जाने से राजद की राजनीति को एक पुनर्जीवन मिल जाये. भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाने के बावजूद तमिलनाडु में जयललिता और आंध्र प्रदेश में जगन रेड्डी का राजनीतिक रुतबा अब भी बुलंद है.

जयललिता और जगन की तरह ही लालू भी अस्मितापरक राजनीति करते हैं और जेल जाने पर उनकी राजनीति से जुड़े सामाजिक वर्गो के बीच यह संदेश जा सकता है कि उन्हें राजनीतिक बदले की भावना से जेल भेजा गया है. जज बदलने का मामला उठा कर लालू ऐसा जताने की कोशिश कर भी चुके थे.

ऐसे में अगर लालू राजद समर्थक नेताओं, मतदाता वर्गो के बीच यह संदेश समय रहते पहुंचा पाने में सफल रहते हैं, तो फिर कम से कम बिहार की राजनीति में सामाजिक गोलबंदी का एक नया दौर दिख सकता है. कुल मिला कर लालू प्रसाद के लिए यह कड़ी परीक्षा की घड़ी है.

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