पड़ोसियों से रिश्ते खराब करने का रास्ता

Published at :12 Jun 2015 5:17 AM (IST)
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पड़ोसियों से रिश्ते खराब करने का रास्ता

उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार केंद्र सरकार ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ से प्रभावित है. उसकी सोच का निर्देशन इसी तरह के राष्ट्रवाद से होता है. म्यांमार के मामले का बड़बोलापन हो या पाकिस्तान से रिश्ते और बिगाड़ने की पैंतरेबाजी, सबमें एक खास पैटर्न दिखता है. क्या इसी सोच से भारत मजबूत होगा? एनएससीएन-खपलांग गुट के नागा-अलगाववादियों के खिलाफ सैन्य […]

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उर्मिलेश
वरिष्ठ पत्रकार
केंद्र सरकार ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ से प्रभावित है. उसकी सोच का निर्देशन इसी तरह के राष्ट्रवाद से होता है. म्यांमार के मामले का बड़बोलापन हो या पाकिस्तान से रिश्ते और बिगाड़ने की पैंतरेबाजी, सबमें एक खास पैटर्न दिखता है. क्या इसी सोच से भारत मजबूत होगा?
एनएससीएन-खपलांग गुट के नागा-अलगाववादियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और म्यांमार के हाल के पूरे प्रसंग पर देश के खुफिया, सुरक्षा और विदेश मामलों के कई शीर्ष विशेषज्ञ भी चकित हैं. इस सरकार ने एक नया मुहावरा खोज लिया है, अनेक मामलों में उसके किसी फैसले को ‘पहली बार’ हुआ बताया जाता है.
म्यांमार में उग्रवादियों के खिलाफ कार्रवाई हुई, तो सरकार और भाजपा के कई प्रमुख नेताओं ने सुबह से शाम तक एक सुर में बोलना शुरू कर दिया, ‘ऐसा पहली बार हुआ.’ सुरक्षा या सैन्य मामलों के हर तथ्य संभाल कर रखे जाते हैं.
इस तरह के रिकॉर्ड कई एजेंसियों के पास होते हैं, क्योंकि ऐसी कार्रवाइयों में कई एजेंसियों की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भूमिका होती है. हमारे देश की सुरक्षा एजेंसियों ने 1995 से 2006 के बीच अनेकों बार विदेशी धरती पर शरण लिये, उग्रवादियों-अलगाववादियों के खिलाफ वहां जाकर सैन्य कार्रवाई की, पर 2015 के जून महीने में देश को बताने की कोशिश की गयी कि ऐसा ‘पहली बार’ हो रहा है. उसका भी म्यांमार सरकार ने खंडन कर दिया.
बीते बुधवार की रात म्यांमार ने साफ किया कि उसकी जमीन पर सैन्य कार्रवाई नहीं हुई, जो कुछ हुआ, वह भारत की सरहद के अंदर हुआ. बहरहाल, सैन्य कार्रवाई जहां भी हुई हो, वह सेना की संगठित और सुनियोजित पहल थी. असम रायफल्स और पैरा कमांडो फोर्स ने कड़ी मेहनत की थी. एमआइ-17 हेलीकाप्टरों का भी इस्तेमाल किया गया.
जिस तरह नागालैंड और मणिपुर के सरहदी इलाकों में सक्रिय खपलांग गुट के अलगाववादियों ने भारतीय सैनिकों पर हमला किया था और घात लगा कर 18 सैनिकों की हत्या की थी, सेना को उसके खिलाफ कार्रवाई करनी ही थी. लेकिन सैन्य और खुफिया मामलों में ‘सियासी फौज’ कहां से आ गयी?
कार्रवाई हुई नहीं कि सत्तारूढ़ पार्टी के प्रवक्ताओं और सरकार के कुछ मंत्रियों के बीच प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री को खुश करने की होड़ मच गयी. न्यूज चैनलों पर तरह-तरह के निशानेबाजों का ‘मेला’ लग गया. इन ‘सियासी निशानेबाजों’ के साथ सेना के पूर्व अधिकारियों, रिटायर खुफिया अधिकारियों और कुछेक स्वघोषित रणनीतिक मामलों के जानकारों ने मोर्चा संभाल लिया. बुधवार की सुबह से देर रात तक निशाने साधे जाते रहे.
इन सबने चीख-चीख कर कहा कि हमारी सेना ने म्यांमार के अंदर जाकर नागा विद्रोहियों के खिलाफ ‘पहली बार’ इस तरह की सैन्य कार्रवाई की है. इससे पहले स्वतंत्र भारत में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. इनका बस चले तो ये कहना शुरू कर दें कि भारत की स्वतंत्रता तो अब शुरू हुई है. सैन्य कार्रवाई के बारे में रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री या गृह मंत्री के बजाय सूचना प्रसारण राज्यमंत्री से बयान दिलवाया गया.
राज्यमंत्री सेना के पूर्व अधिकारी भी हैं. इस नाते उनसे ज्यादा संजीदगी की अपेक्षा थी, पर वह तो पार्टी प्रवक्ताओं से भी ज्यादा बढ़-चढ़ कर बोलने लगे. आश्चर्य कि बुधवार, देर रात तक, सरकार के शीर्ष स्तर से किसी ने भी सत्ताधारी-बड़बोलेपन को संभालने और शासकीय समझदारी दिखाने की कोशिश नहीं की. तब, देर रात को म्यांमार के राष्ट्रपति कार्यालय के निदेशक जाव ते ने यंगून से जारी फेसबुक पोस्ट में साफ किया, ‘म्यांमार सेना की तरफ से उन्हें जो सूचना मिली है, उसके मुताबिक भारत-म्यांमार सरहद के पास भारतीय क्षेत्र में सैन्य कार्रवाई को अंजाम दिया गया है.’
बहुत संभव है, सैन्य कार्रवाई के बारे में अगर लगातार चौबीस घंटे एक ही ढंग का प्रचार न किया गया होता और उसका राजनीतिक फायदा उठाने को कोशिश न की जाती, तो म्यांमार की सरकार की तरफ से इस तरह का स्पष्टीकरण शायद ही जारी होता. लेकिन पड़ोसी मुल्क को आत्म-प्रचार और आत्माघा ने शायद सफाई जारी करने के लिए विवश कर दिया. आखिर कोई देश बड़ा हो या छोटा, सबको अपने सम्मान और अपनी संप्रभुता का ख्याल रखना होता है.
मामला यहीं तक सीमित नहीं रहा. बड़बोलेपन और आत्माघा के बवंडर का असर पश्चिमी सरहद पर भी दिखा. सत्ताधारी दल से जुड़े कुछ नेताओं ने कहना शुरू किया कि म्यांमार जैसी कार्रवाई पाकिस्तान के अंदर भी की जा सकती है. कहा गया कि जरूरत महसूस की गयी, तो भारत अब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में भी सैन्य कार्रवाई करने से नहीं चूकेगा. अब भारत ‘पहले वाला भारत’ नहीं है.
सत्ताधारी दल के नेताओं-प्रवक्ताओं द्वारा जिस तरह की सड़क-छाप भाषा का इस्तेमाल हुआ, वह किसी लोकतांत्रिक देश की राजनीति और खासतौर पर राजनियक संदर्भो या विमर्शो की भाषा तो कतई नहीं हो सकती. पर सरकार के शीर्ष स्तर से कोई सफाई नहीं आयी. उधर, पाकिस्तान को मौका मिल गया. वहां के इंटीरियर मंत्री निसार अली खान ने बुधवार की रात अपने बयान में भारत को नसीहत दे डाली, ‘भारत हमें म्यांमार समझने की भूल न करे, पाकिस्तान की धरती पर उसकी किसी भी सैन्य कार्रवाई का मुंहतोड़ जवाब दिया जायेगा.’ इसे कहते हैं, युद्धोन्माद!
दोनों तरफ से गैर-जिम्मेदाराना बयानों की झड़ी सी लग गयी. पाकिस्तान के मंत्री के बयान में भी म्यांमार के प्रति एक हिकारत-भाव छिपा है- ‘हमें म्यांमार समझने की भूल न करे भारत!’ क्या एक छोटे या सैन्य शक्ति के मामले में अपेक्षाकृत सामान्य देश का कोई सम्मान नहीं? पाकिस्तान के इंटीरियर मंत्री को भी अपने बयान के इस हिस्से पर आत्मालोचना जरूर करनी चाहिए.
पिछले तीन-चार महीने के हालात पर गौर करें, तो पड़ोसी मुल्कों के बारे में ‘दोस्ताना’ दिखाने के बावजूद हमारे नये सत्ताधारी नेताओं में एक तरह के ‘बिग-ब्रदरली’ रवैये से भरा बड़बोलापन साफनजर आता है. भूकंप पीड़ित नेपाल को हम बार-बार आश्वस्त करते हैं, ‘हम उसका आंसू पोछेंगे.’ लेकिन असलियत क्या है?
इसका खुलासा नेपाल की अवाम की तरफ से होता दिखा, जब भूकंप से पीड़ित लोगों, नेपाली मीडिया और वहां की सिविल सोसायटी की तरफ से आवाज आयी, ‘प्लीज, आप हमे अपने हाल पर छोड़ दीजिये. भारतीय मीडिया और अन्य एजेंसियां प्लीज, आप जाइये.’
किसी भी देश की विदेश नीति उसकी घरेलू नीतियों, खासतौर पर उसके अर्थतंत्र और राजनीतिक सोच की वैदेशिक अभिव्यक्ति होती है.
इसमें भला क्या दो राय कि भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ से प्रभावित है. उसकी सोच का निर्देशन इसी तरह के राष्ट्रवाद से होता है. म्यांमार के मामले का बड़बोलापन हो या पाकिस्तान से रिश्ते और बिगाड़ने की पैंतरेबाजी, सबमें एक खास पैटर्न दिखता है. क्या इसी सोच और दिशा से भारत मजबूत होगा?
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