गलत नजीर पेश न करें प्रत्याशी

Published at :26 Nov 2014 2:53 AM (IST)
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गलत नजीर पेश न करें प्रत्याशी

झारखंड में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगरमी चरम पर है. पहले चरण का चुनाव भी संपन्न हो चुका है. ऐसे में सभी राजनीतिक दलों की जवाबदेही बनती है कि राज्य में माहौल न बिगड़ने दें. चार दिन पूर्व जमशेदपुर में एक टेलीविजन के लाइव शो के दौरान दो प्रमुख पार्टियों के प्रत्याशी आपस में […]

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झारखंड में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगरमी चरम पर है. पहले चरण का चुनाव भी संपन्न हो चुका है. ऐसे में सभी राजनीतिक दलों की जवाबदेही बनती है कि राज्य में माहौल न बिगड़ने दें.

चार दिन पूर्व जमशेदपुर में एक टेलीविजन के लाइव शो के दौरान दो प्रमुख पार्टियों के प्रत्याशी आपस में भिड़ गये. अपने नेता को भिड़ते देख कर उनके कार्यकर्ता भला कैसे शांत रहते. नेताओं से दो कदम आगे बढ़ कर कार्यकर्ता बाहुबल पर उतरे आये और कुर्सियां चलाने लगे. टीवी शो तो बाधित हुआ ही शहर का राजनीतिक माहौल भी बिगड़ा. तब से दोनों पार्टी के कार्यकर्ताओं में तनाव है. वैसे भी यह पहला मौका नहीं था जब दोनों नेता या कार्यकर्ता आपस में भिड़े हों. इससे पहले भी कई मौकों पर दोनों में भिड़ंत होती रही है. यहां गौर करने की बात यह है कि यह चुनावी सीजन है. चुनावी बिसात में हर प्रत्याशी अपनी एक-एक चाल बहुत ही सोच-समझ कर चल रहा है.

पर शतरंज के शौकीन यह बात भली-भांति जानते हैं कि एक भी मोहरा गलत होने पर बाजी पलटते देर नहीं लगती. ऐसे में यह मानने को मन नहीं करता कि जमशेदपुर में दो प्रत्याशियों के बीच जो कुछ हुआ वह अनजाने में या भूलवश हुआ हो. फिर भी क्या दोनों की जिम्मेवारी नहीं बनती कि वे ऐसा कुछ ना करें जिससे मतदाता या कार्यकर्ता उलझन में पड़ें, या उनके सामने गलत नजीर पेश हो. प्रत्याशियों का बात-व्यवहार उनकी छवि बनाने-बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभाता है.

वोटर भी अपने प्रत्याशी को बहुत बारीकी से निरखता-परखता है. यह विडंबना ही है कि झारखंड की राजनीति का मुड 14 वर्ष बाद भी परिपक्व न होकर किशोरावस्था जैसी है. यहां राजनीति का मतलब येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीत जाना भर है. कोई भी राजनेता जनता का दिल जीतना नहीं जानता या नहीं चाहता. उन्हें यह लगता है कि जनता उनकी चेरी है और वे उनके रहनुमा. जनता तो बेचारी है वोट देना उसकी मजबूरी है, उसके बाद अगले चुनाव तक नेताजी की मरजी. यह हाल तब है जब चुनाव आयोग पहले की अपेक्षा अधिक सचेष्ट हुआ है. प्रत्याशियों की एक-एक गतिविधि पर कड़ी नजर और निगरानी है. बहरहाल पार्टियों और प्रत्याशियों से उम्मीद की जानी चाहिए कि वे सिर्फ वोटर को लुभाने के लिए कुछ ऐसा-वैसा न करें.

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