केवल वोट न मांगें, विकास का ब्लू प्रिंट सामने रखें दल

Published at :14 Nov 2014 6:15 AM (IST)
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केवल वोट न मांगें, विकास का ब्लू प्रिंट सामने रखें दल

फरजंद अहमद वरिष्ठ पत्रकार सवाल यह नहीं है कि सत्ता के शीर्ष पर पर बैठा व्यक्ति आदिवासी है या गैरआदिवासी. मूल सवाल यह है कि वह जनता के विकास को तत्पर है या नहीं. इसलिए इस चुनाव में जनता के समक्ष दो सवाल प्रमुख होने चाहिए. पहला, यही कि स्थायी नेतृत्व होने के साथ ही […]

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फरजंद अहमद

वरिष्ठ पत्रकार

सवाल यह नहीं है कि सत्ता के शीर्ष पर पर बैठा व्यक्ति आदिवासी है या गैरआदिवासी. मूल सवाल यह है कि वह जनता के विकास को तत्पर है या नहीं. इसलिए इस चुनाव में जनता के समक्ष दो सवाल प्रमुख होने चाहिए. पहला, यही कि स्थायी नेतृत्व होने के साथ ही दूरदर्शी नेतृत्व हो. और दूसरा, जो भी दल इस चुनाव में जनता के समक्ष वोट मांगने जाते हैं, उनसे जनता पूछे कि झारखंड के विकास का उनका ब्लूप्रिंट क्या है?

झारखंड के निर्माण के पीछे एक लंबा संघर्ष रहा है. झारखंड के आसपास के वे राज्य जहां आदिवासियों की संख्या थी, उन राज्यों मसलन झारखंड, बंगाल, ओड़िशा, मध्य प्रदेश आदि में विशाल झारखंड के निर्माण की मांग काफी दशक से चली आ रही थी.

हालांकि विशाल झारखंड की मांग तो नहीं पूरी की गयी, लेकिन बिहार से झारखंड को अलग कर यह नया राज्य बना और मध्य प्रदेश से अलग कर छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ. लेकिन जब झारखंड राज्य का निर्माण हुआ या निर्माण की जब बात हो रही थी, तो अकसर बातचीत में लोग कहते थे कि झारखंड मतलब जंगल राज्य. लेकिन ये बातें कहने के पीछे लोगों की मंशा यह दिखाना था कि झारखंड खनिज संसाधनों से परिपूर्ण होते हुए भी पिछड़ा है. भले ही विशाल झारखंड नहीं बना फिर भी जब राज्य का निर्माण हुआ, तो लोगों की यह धारणा थी कि राज्य निर्माण के पीछे छिपी आकांक्षाएं पूरी होंगी.

लेकिन, आज जब राज्य निर्माण को लगभग डेढ़ दशक बीत चुके हैं, ऐसा लगता है कि सारी अपेक्षाएं धूमिल हो गयी हैं. सही अर्थो में झारखंड अपने नाम के अनुरूप ही शासन व्यवस्था देनेवाले लोगों की कमी की वजह से आज राजनीतिक अफरातफरी, कुशासन, सरकारी धन की लूट, माफियागिरी और माओवादियों के दिन-प्रतिदिन बढ़ते प्रभाव से दो-चार हो रहा है. और इन अर्थो में राज्य निर्माण के पीछे की जो आकांक्षाएं थीं, अपेक्षाएं थीं, विशेष रूप से उनकी जो इस राज्य में बहुसंख्यक थे, और जिनके दबाव में यह राज्य बना, धूमिल सी हो गयी दिखती हैं.

अब तो वे लोग भी, जो कि इस राज्य के आंदोलन से बौद्धिक रूप से जुड़े हुए थे और नये राज्य के गठन के पक्षधर थे, ऐसा मानने लगे हैं कि पूरा सपना ही चकनाचूर हो गया है.

जब झारखंड राज्य का निर्माण हुआ तो उस समय आदिवासियों की संख्या 48 फीसदी थी और आज वह घट कर 28 फीसदी हो गयी है. ऐसे में सवाल उठता है कि बाकी आदिवासी गये कहां? स्वाभाविक रूप से इस सवाल का जवाब यही होगा कि वे राज्य से पलायन कर गये. झारखंड शुरू से ही राजनीतिक अस्थिरता का दंश ङोलता आ रहा है. वहां जो लोग भी सत्ता में आये, उन्होंने विकास के नाम पर उद्योगपतियों से अच्छी-खासी सांठगांठ की और राज्य में लूट का सिलसिला चल निकला.

इसके लिए किसी एक दल को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. वर्ष 2000 में जब झारखंड बना तो कई नेता दावेदार थे, लेकिन बावजूद इसके बाबूलाल मरांडी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया. मरांडी ने कोशिश तो की कि राज्य में प्रगति हो लेकिन स्थानीय राजनीति के मूलचरित्र को नहीं बदल पाये. इसके बाद अर्जुन मुंडा आये, जो भाजपा के ही नेता थे. फिर झामुमो के गुरुजी शिबू सोरेन गद्दी पर आये और मात्र 10 दिन में उन्हें अपनी गद्दी छोड़नी पड़ी. अर्जुन मुंडा को फिर राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया. इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए राज्य में निर्दलीय मधु कोड़ा मुख्यमंत्री बने, जिन्हें कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनाया. यह वह दौर था, जब राज्य के संसाधनों की खुली लूट मची. ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि मधु कोड़ा के कार्यकाल में झारखंड में लगभग चार हजार करोड़ की लूट हुई.

ऐसा नहीं है कि लूट का यह सिलसिला यहां थम गया हो. लूट की यह परंपरा तो राज्य निर्माण के पहले ही शुरू हो गयी थी. संसाधनों से परिपूर्ण इस राज्य के द्वारा भले ही बिहार के साथ रहते हुए बिहार की लगभग 60 फीसदी आमदनी इसी राज्य से आती हो, लेकिन लूट उस काल में भी था. संयुक्त बिहार के दौरान जो चारा घोटाला का मामला सामने आया, वह इसी झारखंड में घटित हुआ था. इस घोटाले को उजागर करने में सरयू राय की अहम भूमिका रही. उन्होंने ही मधु कोड़ा की लूट का राज अपनी पुस्तक ‘मधु कोड़ा: लूट राज’ छाप कर खुलासा किया.

इस परिस्थिति में जब झारखंड फिर चुनाव के मुहाने पर खड़ा है, और राज्य की जनता को कमोबेश सभी राजनीतिक दलों, जो स्थानीय नेतृत्व में आज भारी-भरकम रूप से चुनाव जीतने का दावा कर रहे हैं, उन्हीं के बीच से ही अपना प्रतिनिधि चुनना है. इसलिए इस परिस्थिति में कोई व्यापक बदलाव आयेगा, या जो सपने टूट गये हैं वे फिर से जुड़ेंगे, ऐसा नहीं लगता. यह सवाल बार-बार पूछा जाता रहा है या विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय भी है कि आखिर झारखंड में लगातार आदिवासी मुख्यमंत्री होने के बावजूद विकास क्यों नहीं हुआ? लेकिन, असल सवाल यह नहीं है कि सत्ता के शीर्ष पर पर बैठा व्यक्ति आदिवासी है या गैरआदिवासी. मूल सवाल यह है कि वह जनता के विकास को तत्पर है या नहीं. इसलिए इस चुनाव में जनता के समक्ष दो सवाल प्रमुख होने चाहिए.

पहला, यही कि स्थायी नेतृत्व होने के साथ ही दूरदर्शी नेतृत्व हो. और दूसरा, जो भी दल इस चुनाव में जनता के समक्ष वोट मांगने जाते हैं, उनसे जनता पूछे कि झारखंड के विकास का उनका ब्लूप्रिंट क्या है? चुनावी महासमर में सभी दल प्रदेश के विकास की बात कर रहे हैं, या करेंगे. लेकिन पलट कर यह सवाल जनता के तरफ से आना चाहिए कि आखिर अब तक विकास क्यों नहीं हुआ, और उनकी नजर में झारखंड के विकास का ब्लू प्रिंट क्या होना चाहिए? विकास के किस मॉडल को अपनाये जाने हैं, जिससे पूरे झारखंड का और वहां के आम नागरिकों का सर्वागीण विकास हो.

(संतोष कुमार सिंह से बातचीत पर आधारित)

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