मुख्य सचिव बनाने और हटाने का खेल

Published at :02 Oct 2014 4:36 AM (IST)
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मुख्य सचिव बनाने और हटाने का खेल

मंगलवार को अचानक झारखंड के मुख्य सचिव सुधीर प्रसाद बदल दिये गये. वे अभी विदेश में हैं. जिस सजल चक्रवर्ती को डेढ़ माह पहले हटा दिया गया था, उन्हें पुन: मुख्य सचिव बनाया गया. एक फर्क रहा कि इस बार उन्हें प्रभारी नहीं, बल्कि स्थायी पद दिया गया है. सवाल सुधीर प्रसाद या सजल चक्रवर्ती […]

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मंगलवार को अचानक झारखंड के मुख्य सचिव सुधीर प्रसाद बदल दिये गये. वे अभी विदेश में हैं. जिस सजल चक्रवर्ती को डेढ़ माह पहले हटा दिया गया था, उन्हें पुन: मुख्य सचिव बनाया गया. एक फर्क रहा कि इस बार उन्हें प्रभारी नहीं, बल्कि स्थायी पद दिया गया है. सवाल सुधीर प्रसाद या सजल चक्रवर्ती का नहीं है, सवाल सिस्टम का है.
राज्य बने 14 साल होने जा रहे हैं और ये 15वें मुख्य सचिव हैं. किसी भी मुख्य सचिव को किसी भी सरकार ने (अपवाद छोड़ कर) काम करने का पूरा वक्त दिया ही नहीं. जब मन किया, मुख्य सचिव बना दिया, जब चाहा हटा दिया. यह राज्य की नौकरशाही का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पद होता है. अगर इस पद पर काम करनेवाले अधिकारी भी स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे, तो वे कैसे काम कर पायेंगे. एक समय था, जब नेता नौकरशाहों का आदर करते थे, सम्मान देते थे, उनकी राय को अहमियत देते थे.
अब यह सब गायब हो गया है. आजादी के बाद, संयुक्त बिहार राज्य में आठ-आठ साल तक एक अफसर मुख्य सचिव (एलपी सिंह 1948 से 1956 तक इस पद पर थे) पद पर रहे. बाद में भी यही सिलसिला चला. यानी उन्हें काम करने का पूरा अवसर मिला. मुख्य सचिव बनाने के पहले ठोंक बजा कर फैसले लें. लेकिन जब बना दें, तो काम करने दें. लेकिन राजनीतिक स्वार्थ इसमें आड़े आता है.
सरकार अपने हिसाब से फैसला लेती है. इसमें राजनीतिक फैसले भी हो सकते हैं. लेकिन मुख्य सचिव तो नियम-कानून के तहत काम करते हैं. मुख्य सचिव कोई भी हो, सरकार को नियमसम्मत काम करने का सुझाव देते हैं. संभव है इसमें कई बार किसी सरकार को मुख्य सचिव की टिप्पणी पसंद न आये.
आज की राजनीति में राजनेता अपने और अपने दल के एजेंडे को लागू करने के लिए इतने अडिग हो जाते हैं कि उन्हें उचित और अनुचित का ख्याल ही नहीं रहता. तात्कालिक लाभ के लिए नियमों का उल्लंघन करते हैं और कानूनी उलझन में फंस जाते हैं. मुख्य सचिव सत्ता को अनैतिक कार्य करने से रोकने का प्रयास करते हैं और नेताओं की टेढ़ी नजर का शिकार हो जाते हैं. सच तो यह है कि मुख्य सचिव कोई भी हो, सरकार अगर कोई गलत निर्णय लेती है, तो वे अपनी गर्दन नहीं फंसायेंगे.
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