कुछ भी कहो, मोदी का खौफ कायम है

Published at :13 Aug 2014 12:13 AM (IST)
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कुछ भी कहो, मोदी का खौफ कायम है

आम चुनाव में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, तो विरोधियों ने एक सुर में इसका विरोध किया. सबने कहा कि यदि यह शख्स देश का प्रधानमंत्री बन गया, तो देश टूट जायेगा. देश बिखर जायेगा. लेकिन चुनाव के बाद जो स्थिति बन रही है, वह उनके दावों के […]

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आम चुनाव में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया, तो विरोधियों ने एक सुर में इसका विरोध किया. सबने कहा कि यदि यह शख्स देश का प्रधानमंत्री बन गया, तो देश टूट जायेगा. देश बिखर जायेगा.

लेकिन चुनाव के बाद जो स्थिति बन रही है, वह उनके दावों के उलट दिख रही है. चुनाव में जो लोग अलग-अलग होकर लड़े और बुरी तरह पराजित हुए, आज एकजुट हो रहे हैं. अब लालू प्रसाद और नीतीश कुमार को ही लीजिए. जब तक नरेंद्र मोदी केंद्र में नहीं थे, दोनों एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे. लालू के शासन को नीतीश कुमार जंगल राज बताते थे. वहीं, लालू कहते थे कि नीतीश ने अफसरों के हाथों में राज्य को सौंप दिया है. अफसर बेलगाम हो गये हैं. राज्य में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गयी है. नौ साल तक भाजपा के साथ गंठबंधन की सरकार चलानेवाले नीतीश कुमार को कभी ‘बड़े भाई’ लालू प्रसाद की याद नहीं आयी. नरेंद्र मोदी की आंधी में उनके सुशासन की वो हवा निकली कि नीतीश कुमार सीधे बड़े भैया की गोद में गिरे.

लालू को बड़ा फा है इस बात का. होना भी चाहिए. छोटा भाई यदि रास्ता भटक गया था और वह घर लौट आया है, तो बड़े भाई का खुश होना लाजिमी है. लेकिन, बड़े भाई को उस आदमी का भी शुक्रिया जरूर करना चाहिए, जिसकी वजह से छोटा भाई घर लौट आया. इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए लालू प्रसाद की ओर से एक थैंक्स तो बनता है. नरेंद्र मोदी न होते, तो नीतीश का सुशील मोदी (भाजपा) से गंठबंधन नहीं टूटता. गंठबंधन न टूटता, तो जदयू को अपनी जमीन का पता नहीं चलता और वह कभी लालू प्रसाद के पास नहीं जाता. कांग्रेस तो उन्हें घास भी नहीं डालती, यदि उसकी खुद की हालत पस्त न हुई होती. कहावत भी है : हारे को हरिनाम. लेकिन, बिहार में सब हारे भाई-भाई. 20 साल बाद नीतीश के साथ एक मंच पर आये लालू प्रसाद उनसे सारे मतभेद भूल चुके हैं.

दोनों मिल कर भाजपा को साफ करने की तैयारी कर चुके हैं. खुदा करे कि देश के लोग जो जाति, धर्म और संप्रदाय के नाम पर बंटे हैं, इस बुराई के खिलाफ एकजुट हो जायें. शांति और सौहाद्र्र का माहौल कायम हो और देश प्रगति के पथ पर अग्रसर हो. जिस दिन हम इस दिशा में सोचना शुरू कर देंगे, फिरकापरस्त ताकतें खुद-ब-खुद परास्त हो जायेंगी. गलत लोगों के हाथों में सत्ता नहीं जा पायेगी. बहरहाल, बिहार में राजद-जदयू और कांग्रेस का महागंठबंधन विधानसभा उपचुनावों के लिए है. देखना यह है कि बिहार उपचुनाव में नरेंद्र मोदी की हवा चलती है या उत्तराखंड की तरह भाजपा की हवा निकल जाती है. नतीजा तो वक्त बतायेगा, लेकिन अपना यह मानना है कि यदि विभिन्न मतों के लोगों के गले मिलने को देश का टूटना कहते हैं, तो देश हर दिन, हर घड़ी और हर क्षण टूटे.

मिथिलेश झा

प्रभात खबर, रांची

mithilesh_jha123@yahoo.com

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