लू का कहर

देश के ज्यादातर हिस्से में तापमान सामान्य से ऊपर है. भारी गर्मी और लू से आगामी कुछ दिनों तक राहत की भी उम्मीद नहीं है. अप्रैल के आखिरी हफ्ते में भारतीय मौसम विभाग ने चेतावनी दी थी कि मध्य और पूर्वी भारत में मई के शुरुआती दिनों में लू का असर रहेगा. तापमान बढ़ने का […]
देश के ज्यादातर हिस्से में तापमान सामान्य से ऊपर है. भारी गर्मी और लू से आगामी कुछ दिनों तक राहत की भी उम्मीद नहीं है. अप्रैल के आखिरी हफ्ते में भारतीय मौसम विभाग ने चेतावनी दी थी कि मध्य और पूर्वी भारत में मई के शुरुआती दिनों में लू का असर रहेगा.
तापमान बढ़ने का एक बड़ा कारण मार्च और अप्रैल की मॉनसून-पूर्व बारिश में औसत से 27 फीसदी की कमी है. इस कारण मिट्टी की ऊपरी परत सूखी हुई है और हवा में नमी बहुत कम है. फिलहाल देश का करीब 42 फीसदी भाग सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहा है. आशंका है कि पूरे मई में गर्मी का कहर जारी रह सकता है. मौसम के पूर्वानुमानों में इस साल मॉनसून के कमजोर रहने की बात कही जा रही है.
ऐसे में खेती और पानी का संकट गहरा हो सकता है. हालिया सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बीते दो सालों में शीतलहर और लू की तादाद में बड़ा इजाफा हुआ है. साल 2017 में 2016 की तुलना में लू की संख्या में 14 गुना तथा शीतलहर की संख्या में 34 गुना की बढ़ोतरी हुई थी. पिछले साल इनमें मामूली गिरावट हुई थी.
स्वाभाविक रूप से इन कारणों से मरनेवाले लोगों की संख्या भी बढ़ी है. वर्ष 1970 से 2018 तक के आंकड़ों के मुताबिक, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सबसे अधिक लू चली है. इस अवधि में राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार में शीतलहर की बारंबारता अधिक रही है.
जलवायु परिवर्तन के कारण लू और शीत लहर के अलावा अन्य प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति भी बढ़ी है. बाढ़ और सूखे की चुनौती लगातार गंभीर होती जा रही है. हाल के तीन साल- 2015, 2016 और 2017- अब तक के सबसे गर्म साल हैं. इसका मतलब यह है कि मौजूदा और आगामी सालों में गर्मी बढ़ने के नये रिकॉर्ड बन सकते हैं. विभिन्न अध्ययनों की मानें, तो देश के आधे जिलों के तापमान में इस सदी के आखिर तक दो डिग्री सेल्सियस की बढ़त हो सकती है. इससे 45 करोड़ से अधिक आबादी सीधे प्रभावित होगी.
बढ़ती गर्मी कृषि उत्पादन और जल उपलब्धता पर नकारात्मक असर तो डालती ही है, इसके साथ स्थानीय आर्थिकी के अन्य आयामों को भी नुकसान पहुंचाती है. कुछ शहरों में गर्मी के खतरनाक स्तर पर पहुंचने पर चेतावनी देने के यंत्र लगाये गये हैं. ऐसे यंत्रों को गांवों-कस्बों तक ले जाने की जरूरत है. जानकारों की राय है कि गर्मी का आकलन करते समय उमस का भी संज्ञान लिया जाना चाहिए, क्योंकि कम तापमान में अधिक उमस का वही असर होता है, जो अधिक तापमान और कम उमस का होता है.
ऊर्जा, जल और यातायात में ऐसी व्यवस्था और संरचना बनायी जानी चाहिए, जो गर्मी से बचाव में सहायक हो सके. लू और तापमान बढ़ने तथा इनसे होनेवाली जान-माल की हानि का ब्यौरा भी ठीक से जमा होना चाहिए, ताकि नीति-निर्धारण बेहतर हो सके. तात्कालिक बचाव के इंतजाम के साथ दीर्घकालिक योजनाओं पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए.
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