इंतजार का फल मीठा हो तो कैसे?

Updated at : 14 Jun 2014 5:43 AM (IST)
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इंतजार का फल मीठा हो तो कैसे?

।। कमलेश सिंह ।। इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल के प्रबंध संपादक छोटे और लघु उद्योग का विकास तो दूर, उनके सामने चलते रहने का संकट है. उद्योग नहीं बढ़ेंगे तो रोजगार नहीं बढ़ेगा. रोजगार नहीं बढ़ेगा तो उत्पादकता नहीं बढ़ेगी. विकास का पहिया रफ्तार नहीं पकड़ेगा. मोदी के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है. अच्छे […]

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।। कमलेश सिंह ।।

इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल के प्रबंध संपादक

छोटे और लघु उद्योग का विकास तो दूर, उनके सामने चलते रहने का संकट है. उद्योग नहीं बढ़ेंगे तो रोजगार नहीं बढ़ेगा. रोजगार नहीं बढ़ेगा तो उत्पादकता नहीं बढ़ेगी. विकास का पहिया रफ्तार नहीं पकड़ेगा. मोदी के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है.

अच्छे दिन का इंतजार कर रहे लोगों का मुंह खट्टा हो रहा है. इसका कारण नरेंद्र मोदी नहीं हैं. सच है कि उन्होंने उम्मीदों को पंख दे दिये. लोगों को चमत्कार का यकीन दिला दिया. अब तक के उनके काम संदेश भी अच्छा दे रहे हैं. उनमें लोगों से किये वादों के प्रति गंभीरता है. उन्हें अनुभव भी है. कड़ी मेहनत और मजबूत इरादे इंसान को कहां तक ले जा सकते हैं, उन्होंने इसे इस चुनाव में साबित भी कर दिखाया. पर यह ताज कांटों से भरा है और अनुकूल वक्त का कुछ भरोसा नहीं है.

चुनाव के समय था. कुर्सी मिल गयी. कठोर परिश्रम कर भी रहे हैं, पर इस मुल्क को बदलने में वक्त लग सकता है. उनकी ऊर्जा बरकरार भी रहे, तो देश को ऊर्जा चाहिए. आधुनिक दौर में रोजगार के लिए, विकास के लिए, उद्यमशीलता और उद्योग के लिए ऊर्जा चाहिए.

देश के सामने बड़ा ऊर्जा संकट है. भीषण गर्मी ने पोल खोल दिये हैं. राजधानी तक में त्रहि मची है. मोदी के अपने चुनाव क्षेत्र वाराणसी में बारह घंटे तक बिजली गुल रहती है. यूपी के बाकी हिस्से कुछ बेहतर नहीं. बिहार-झारखंड जैसे राज्यों में तो लोगों को बिना बिजली के रहने की आदत है. फिर भी संकट है. यशवंत सिन्हा बिजली के लिए आंदोलन करते हुए जेल पहुंच गये. चूंकि यह बुनियादी जरूरत पूरी नहीं हो पा रही है, मोदी के त्वरित विकास के सपनों पर अर्धविराम लगा है. चौबीस घंटे बिजली उनके चुनावी भाषणों में ऊपर रहा. अब लोग बिजली मांग रहे हैं. हालांकि केंद्र बिजली उपलब्ध करा सकता है. वितरण तो राज्य ही करते हैं. यहीं सबसे बड़ा संकट है. एक तो वितरण की आधारभूत संरचना में जंग लग गया है. दूसरे राज्यों के पास पैसे नहीं हैं.

दो साल पहले मैं पंजाब में रहा करता था. एक तथाकथित समृद्ध राज्य को बिजली की कमी से जूझते देख मैंने विभाग के एक बड़े अधिकारी से बात की. जो उन्होंने कहा, मुङो दंग कर गया. कमी बिजली की नहीं थी. कमी पैसे की थी. राज्य जिस दर पर बिजली खरीदता था, उससे कम दर पर बिजली बेचता था. एक निजी बिजली उत्पादक से जब यही सवाल किया, तो उन्होंने भी चौंकानेवाली बात कही. उनके संयंत्र की जितनी क्षमता थी, उससे कम बिजली पैदा कर रहे थे, क्योंकि खरीदार नहीं थे. प्रश्न उठा कि जिस देश में लोग बिजली के लिए इतने बेचैन हैं, वहां खरीदार कैसे नहीं. उत्तर था कि लोग बिजली कंपनी से तो बिजली खरीदते नहीं.

सरकारी वितरण व्यवस्था है. सरकार राजनीतिक लाभ के लिए घाटे में बिजली देती है. बिजली खरीद कर लोगों को पहुंचाने में घाटा और ज्यादा बढ़ेगा. जितना घाटा होगा, सरकारी बिजली वितरण व्यवस्था उतनी लाचार होगी. उन्होंने रास्ता यही निकाला कि लोड शेडिंग करके काम चलाओ. जर्जर पोल, पुराने ट्रांसफॉर्मर बदले नहीं जा रहे, क्योंकि पैसा ही नहीं है. यह देश बिजली की कमी से नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से जूझ रहा है. मुफ्त बिजली के नारे दे दिये. फिर बिजली मुफ्त देनी पड़ी. पर बिजली पैदा करने का खर्च बढ़ता गया. वोट के नारों का चोट जनता पर. यह इंसाफ है!

एक दूसरी नाइंसाफी भी है. झारखंड के कोयले से देश रौशन होता है. बदले में उसे कोयले की कीमत नहीं दी जाती. रॉयल्टी दी जाती है. कीमत का कुछ फीसदी. झारखंड अंधेरे से जूझता है. कोयले के ब्लॉक आवंटित कर दिये जाते हैं. बिजली कंपनियां जब ऑस्ट्रेलिया या अमेरिका से कोयला मंगाती हैं, तो कोयले का अंतरराष्ट्रीय दाम चुकाती हैं. माल भाड़ा लगता है सो अलग. वही दाम झारखंड को नहीं दिया जाता, क्योंकि कोयला राष्ट्रीय संपत्ति है. झारखंड पंजाब से आनेवाले गेहूं की कीमत चुकाता है, रॉयल्टी नहीं.

क्योंकि जमीन के ऊपर गेहूं उगे तो सोना और जमीन के अंदर सोना भी हो तो कोयला. झारखंड की अपनी व्यवस्था को भ्रष्टाचार ने कुछ यूं खोखला कर दिया है कि अभी भी हर घर को बिजली नहीं पहुंची. जहां पहुंची है वहां पूरी नहीं मिलती. जबकि बिजली पैदा करने का सारा सामान झारखंड के पास ही है.

छोटे और लघु उद्योग का विकास तो दूर, उनके सामने चलते रहने का संकट है. उद्योग नहीं बढ़ेंगे तो रोजगार नहीं बढ़ेगा. रोजगार नहीं बढ़ेगा तो उत्पादकता नहीं बढ़ेगी. विकास का पहिया गति नहीं पकड़ेगा. नरेंद्र मोदी के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है. वोट की राजनीति से मुक्ति नहीं मिली तो बिजली मिलनी संभव नहीं. लोगों को यह बताना पड़ेगा कि बिजली के वाजिब दाम देने होंगे, क्योंकि नहीं देने पर बिजली ही नहीं होगी. इसके लिए सबको तैयार करना कठिन है पर नामुमकिन नहीं. नेशनल ग्रिड से हर राज्य अपनी जरूरत के हिसाब से बिजली तभी ले सकेंगे, जब उनके पास इतना धन हो कि वह उसकी कीमत अदा कर सकें. शक्ति है, पर इच्छाशक्ति नहीं. क्या मोदी जुटा पायेंगे?

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