भाजपा का वर्चस्व

Updated at : 05 Mar 2018 6:49 AM (IST)
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भाजपा का वर्चस्व

मशहूर कहावत है कि राजनीति संभावनाओं की कला है. यह बात भाजपा के बढ़ते वर्चस्व पर सटीक बैठती है. पूर्वोत्तर के राज्यों में कुछ समय पहले तक खाता खोलने को तरसती भाजपा उस हिस्से के सात में से पांच राज्यों में सत्तासीन है. त्रिपुरा में ढाई दशक से सरकार चला रहे वाम मोर्चे को परास्त […]

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मशहूर कहावत है कि राजनीति संभावनाओं की कला है. यह बात भाजपा के बढ़ते वर्चस्व पर सटीक बैठती है. पूर्वोत्तर के राज्यों में कुछ समय पहले तक खाता खोलने को तरसती भाजपा उस हिस्से के सात में से पांच राज्यों में सत्तासीन है.
त्रिपुरा में ढाई दशक से सरकार चला रहे वाम मोर्चे को परास्त कर उसने न सिर्फ रणनीतिक जीत हासिल की है, बल्कि अपनी विचारधारात्मक बढ़त को भी दर्ज किया है. त्रिपुरा और नगालैंड में गठबंधन बनाने, आक्रामक प्रचार करने और विपक्ष की खामियों पर प्रहार की उसकी शैली एक बार फिर कामयाब हुई है.
मेघालय की संभावित सरकार में अपनी जगह बनाने की भी उसने गंभीर कोशिशें शुरू कर दी हैं. देश के 29 में से 21 राज्यों की सरकारें या तो भाजपा की हैं या फिर उसके सहयोगी दलों की. संसद से लेकर सड़क तक भाजपा को ठोस विरोध का भी सामना नहीं करना पड़ा है.
परंतु, ऐसा नहीं है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से अब तक उसकी जीत का सिलसिला निर्बाध रहा है. बीच-बीच में झटके भी लगे हैं और खतरनाक चुनौतियां भी सामने आयी हैं, पर उसके राजनीतिक विरोधी न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की काट खोज पाये हैं और न ही भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के रणनीतिक कौशल की.
संगठन के सटीक इस्तेमाल में भी भाजपा का मुकाबला उसके विरोधी नहीं कर सके हैं. अब अगर कहीं भाजपा कमजोर दिख रही है, तो वह दक्षिण भारत है, पर वहां उसकी उपस्थिति भी है और उसकी सक्रियता भी तेज हुई है. ऐसे में देश के कुछ राज्यों में जहां विरोधी दल सत्तारूढ़ हैं, उनका भाजपा के बढ़ते वर्चस्व से चिंतित होना स्वाभाविक है.
अब विरोधी दलों को नये सिरे से आत्मावलोकन कर भाजपा के बरक्स खड़ा होने की कोशिश करनी होगी, लेकिन विपक्ष की कमजोरियों को देखते हुए यह कह पाना मुश्किल है कि वह कब मजबूत चुनौती के रूप में खड़ा हो सकेगा.
भाजपा के राजनीतिक विस्तार के साथ उससे जुड़ी लोगों की अपेक्षाएं भी बढ़ रही हैं और पार्टी को इसका गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए. यह ठीक है कि उसका जनाधार व्यापक हुआ है, पर लोकतंत्र में पार्टियों को मतदाताओं के दरवाजे बार-बार खटखटाने होते हैं.
ऐसे में चाहे वह देश का पश्चिमी क्षेत्र हो, मध्य भारत हो या फिर पूर्वोत्तर, भाजपा को अपने चुनावी वादों को पूरा करने की गंभीर कोशिश करनी होगी. केंद्र और कई राज्यों में सत्तारुढ़ होकर उसके पास अपनी नाकामयाबियों के लिए कोई बहाना बनाने की गुंजाइश नहीं है.
पार्टी को भी निश्चित ही इसका भान होगा. पूर्वोत्तर बेहद पिछड़ा होने के साथ दशकों से अलगाववाद और हिंसा से भी पीड़ित रहा है. केंद्र सरकार के सहयोग से उन राज्यों में विकास की नयी इबारत लिखी जा सकती है. अब समय है कि भाजपा अपने वादों को अमलीजामा पहनाकर अपने वर्चस्व को सार्थक सिद्ध करे.
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