अफगानिस्तान पर ट्रंप
Updated at : 23 Aug 2017 6:32 AM (IST)
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अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की मौजूदगी के डेढ़ दशक से ज्यादा हो रहे हैं लेकिन युद्ध-जर्जर इस देश को न तो आतंकवाद से मुक्ति मिली है, और न ही वहां सुदृढ़ लोकतांत्रिक शासन कायम कर सकने लायक माहौल ही तैयार हुआ है. अफगानिस्तान को लेकर अमेरिकी नीति राष्ट्रपतियों के बदलने के साथ युद्ध और शांति […]
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अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की मौजूदगी के डेढ़ दशक से ज्यादा हो रहे हैं लेकिन युद्ध-जर्जर इस देश को न तो आतंकवाद से मुक्ति मिली है, और न ही वहां सुदृढ़ लोकतांत्रिक शासन कायम कर सकने लायक माहौल ही तैयार हुआ है. अफगानिस्तान को लेकर अमेरिकी नीति राष्ट्रपतियों के बदलने के साथ युद्ध और शांति के दो ध्रुवों पर डोलती रही है.
कभी वहां अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़ायी जाती है, तो कभी इसे क्रमशः कमकरने और उनकी पूर्ण वापसी के बारे में सोचा गया. लेकिन कामयाबी न मिल सकी. साल 2010 में अमेरिकी सैनिकों की तादाद एक लाख से ज्यादा थी, जो अब महज 8,400 रह गयी है. इस साल अब तक करीब 2,500 अफगानी सैनिक और पुलिसकर्मी आतंकी हमलों में मारे गये हैं.
सो माना जा सकता है कि तालिबानी आंतकियों की हमला करने की ताकत कायम है और स्थायी लोकतांत्रिक शासन कायम करने का अमेरिकी स्वप्न अफगानिस्तान में अब भी साकार होना शेष है. ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से अफगानिस्तान को लेकर अमेरिकी नीति की बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा की जा रही थी. राष्ट्रपति पद के चुनाव में ट्रंप का एक वादा विदेशी धरती पर अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी में कमी करना भी था. लेकिन, इस वादे के उलट स्थिति की नजाकत को भांपते हुए उन्होंने अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की तादाद बढ़ाने का फैसला किया है.
नयी तैनाती का फौरी मकसद अफगानिस्तान की सरकार को फौज को मजबूत बनाना, अफगानी सरजमीं से आइएसआइएस के आतंकियों को भगाना और तालिबानी आतंकियों को सत्ता पर काबिज होने से रोकना है. अमेरिका इस मकसद में भारत से मदद चाहता है, खासकर आर्थिक परियोजनाओं और विकास कार्यों में उसे भारत से सहयोग की उम्मीद है. अमेरिका की यह सोच इलाके में भारत के सैन्य और आर्थिक हितों की बढ़वार के लिए बहुत अहम है.
इसके उलट अमेरिका ने पाकिस्तान को साफ शब्दों में कहा है कि वह अफगानी तालिबानी आतंकियों को अपनी धरती पर पनाह देना बंद करे या अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहे. आतंकियों पर लगाम कसने केनाम पर करोड़ों अमेरिकी डॉलर की सहायता हासिल करनेवाले पाकिस्तान के लिए अमेरिका का यह रुख किसी सदमे से कम नहीं.
माना जा सकता है कि अमेरिकी विदेश विभाग पाकिस्तान को लेकर भारत के रुख के अब ज्यादा करीब आ गया है. भारत लगातार कहता आया है कि आतंकवाद पाकिस्तान की विदेश-नीति का हिस्सा है. अमेरिका के इस बदले रुख और अफगानिस्तान संबंधी नयी नीति से भारत के लिए इलाके में बड़ी भूमिका निभाने की राह खुल सकती है.
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