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giridih

  • Mar 19 2019 2:18AM
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सिंथेटिक रंगों ने हर ली पलाश की लाली

गांडेय/बेंगाबाद : त्योहार होली का नाम जेहन में आते ही लोगों के चेहरे खिल जाते हैं, चारों ओर एक उल्लास छा जाता है. मानव के साथ प्रकृति भी इस त्योहार को मनाने के लिए तैयारियों में जुट जाती है, लेकिन अब आधुनिकता के युग में न तो पलाश के फूलों की होली होती है और न ही गांवों में कबड्डी व जोगिरा का जश्न दिखायी देता है.

 
समय के साथ-साथ विभिन्न पर्व त्योहारों की तरह होली की तैयारियों में भी काफी बदलाव आया है. रंगों के इस त्योहार में प्रकृति के उपर आधुनिकता हावी होती दिख रही है. प्राकृतिक तरीके से तैयार किये जाने वाले  रंग के स्थान पर पैकेट बंद हानिकारक रंगों ने ले लिया है. रंगों के साथ-साथ होली मनाने के तरीके में भी काफी बदलाव आया है.
 
फूलों को उबाल कर बनाने थे रंग : पूर्व में होली के आगमन से पहले ही ग्रामीण पलाश के केसरिया फूलों को पानी में उबाल कर रंग तैयार करते थे और बगैर खर्च के गहरे रंगों का इस्तेमाल कर एक दूसरे के साथ होली के रंग में सरोबार होकर खुशियां मनाते थे,लेकिन अब पलाश के फूलों का रंग गायब हो चुका है और इसके स्थान पर खर्चीले आधुनिक रंगों ने ले लिया है. 
 
अब नहीं होता कबड्डी व जोगिरा का जश्न : बुर्जुगों के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में होली के पूर्व ही तैयारियों में लोग जुट जाते थे. सामूहिक रूप से होली खेलने के लिए सामूहिक प्रबंध किया जाता था. होली के आगमन के एक महीने पहले से ही ग्रामीण इलाकों में कबड्डी, छड्डा व जोगिरा का अभ्यास व कार्यक्रम शुरू हो जाता था.
 
होलिका दहन के लिए ग्रामीणों का जत्था झाल, करताल व ढोलक के साथ जोगिरा गाते हुए निकलते थे. नियत स्थान पर होलीका दहन के बाद होली शुरू की जाती थी. बड़े-बुजुर्गों को रंगों का टीका लगाकर आर्शीवाद लिया जाता था. सुबह होने के बाद कबड्डी-छड्डा का आयोजन किया जाता था, जिसमें सभी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे.
 
शाम को पुनः टोली बनाकर जोगिरा के साथ एक दूसरे को पलाश फूल से तैयार रंग को एक दूसरे को लगाकर खुशी मनाते थे और पकवान का आनंद उठाते थे. इस संबंध में ग्रामीण प्यारी सिंह, एतवारी सिंह, डोमन पाठक, भागवत सिंह आदि ने कहा कि वर्तमान में आधुनिकता के रंग में लोग पुरानी व्यवस्था व परंपरा को भूलते जा रहे हैं. 
 
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