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जोशीले नारे गढ़ने में महारत हासिल रही है वाम दलों को

Updated at : 08 Apr 2019 12:11 AM (IST)
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जोशीले नारे गढ़ने में महारत हासिल रही है वाम दलों को

डॉ आरके नीरद इनके नारों की आक्रामकता को दूसरे दलों ने भी स्वीकारा और इसी तर्ज को अपनाया जोशीले नारे गढ़ने में वाम दलों को महारत हासिल रही है. इनके नारों की आक्रामकता को दूसरे दलों ने भी स्वीकारा और उन्होंने भी इसी तर्ज को अपनाया. जब देश आजाद हुआ और केंद्र में कांग्रेस की […]

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डॉ आरके नीरद
इनके नारों की आक्रामकता को दूसरे दलों ने भी स्वीकारा और इसी तर्ज को अपनाया
जोशीले नारे गढ़ने में वाम दलों को महारत हासिल रही है. इनके नारों की आक्रामकता को दूसरे दलों ने भी स्वीकारा और उन्होंने भी इसी तर्ज को अपनाया. जब देश आजाद हुआ और केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी, तब के सामाजिक-आर्थिक यथार्थ को केंद्र में रख कर वामपंथियों ने नारा गढ़ा- ‘देश की जनता भूखी है, यह आजादी झूठी है’. इस नारे से समाज में गोलबंदी का राजनीतिक अभियान चला. केंद्र की सत्ता हासिल करने के लिए चुनावी नारा भी गढ़ा गया.
वह था ‘लाल किले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’. 1990 के दशक में भाजपा ने इसी तर्ज पर चुनावी नारा बुलंद किया था-‘अटल-आडवाणी-कमल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’. जन संघ का यह नारा खूब लोकप्रिय हुआ था- ‘हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, हर घर में दीपक, जनसंघ की निशानी’. आपातकाल में जनसंघ का एक और नारा आया- ‘अटल बिहारी बोला, इंदिरा का शासन डोला’. कहते हैं कि इंदिरा जी की रायबरेली से हार में इस नारे का भी योगदान था.
भारतीय चुनावी राजनीति में समाजवादियों ने भी अपने पॉलिटिकल आइडियोलॉजी को आम जन तक पहुंचाने के लिए नारे का सहारा लिया. इसमें सन सत्तर के दशक में डॉ राम मनोहर लोहिया का नारा ‘सोशिलस्टों ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ’ सबसे ज्यादा प्रभावी माना गया. इसने समाज के पिछड़े तबके के लोगों को गोलबंद करने में बड़ी भूमिका निभायी.
समाज के निचले तबके में गोलबंदी का नारा
1971 के लोस चुनाव में इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया. इसने समाज के निचले तबके को कांग्रेस के पक्ष में गोलबंद करने में मदद की और इंदिरा की छवि गरीबों की नेता के रूप में उभरी.
इस नारे को लाने के पीछे राजनीतिक परिस्थितियां जटिल थीं. इस नारे की बदौलत उस जटिलता को साधने में इंदिरा गांधी को बड़ी कामयाबी मिली. आपातकाल के बाद जिन नेताओं ने इंदिरा गांधी का साथ छोड़ा, उनमें जगजीवन राम भी थे. लोकतांत्रिक मूल्यों की हिफाजत के सवाल पर उन्होंने इंदिरा जी से किनारा किया. तब बिहार में उनके समर्थकों का यह नारा भी खूब गूंजा था :
जगजीवन राम की आयी आंधी, उड़ जायेगी इंदिरा गांधी.
आपातकाल के बाद, 1977 के लोस चुनाव में जनता पार्टी ने इंदिरा हटाओ, देश बचाओ का नारा दिया. इस नारे को आपातकाल में जनता को हुई तकलीफों का समर्थन भी मिला. उन दिनों बिहार में एक और नारा गांव-शहर में गूंज रहा था-¯‘जमीन गयी चकबंदी में, मरद गया नसबंदी में’. यह संजय गांधी के जबरिया नसबंदी अभियान पर तीखी जनप्रतिक्रिया थी. लिहाजा ‘इंदिरा हटाओ, देश बचाओ’ के नारे को बड़ी आसानी से लोगों ने स्वीकार कर लिया. बहरहाल, जनता पार्टी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी और 1980 में मध्यावधि चुनाव हुआ.
इस सरकार के ढाई साल के कार्यकाल में जनता को हुई परेशानियों को कांग्रेस ने मुद्दा बनाया और सकारात्मक नारा दिया- ‘आधी रोटर खायेंगे, इंदिरा को जितायेंगे’. इस नारे में देश को विकल्प दिया गया. इसने सत्ता में इंदिरा जी की वापसी करायी. इसी चुनाव से स्थिर सरकार मुद्दा बना. कांग्रेस ने एक और सकारात्मक नारा दिया था, जो आज भी देश-राज्यों के चुनावों में बड़ा मुद्दा बन रहा है- ‘चुनिए उन्हें, जो सरकार चला सकें’.
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