माननीय पवन सिंह जी, आपके गाने ‘लहंगा से महंगा’ को बेस्ट गानों में लहंगा-चोली, मंच पर संस्कृति का ढोंग! भोजपुरीसिंगर का अवॉर्ड मिला है. बधाई! लेकिन एक सवाल है. लहंगा-चोली और महिलाओं के शरीर के इर्द-गिर्द घूमने वाले गाने हमारे समाज का क्या भला कर रहे हैं? मंच पर ऐसे गानों के लिए सम्मान मिलता है, तो क्या आपको जरा भी हिचक नहीं होती? और जब आपके पास इतनी लोकप्रियता है कि लोग आपको ‘पावर स्टार’ कहते हैं, तो क्या इस पावर का इस्तेमाल बिहार की संस्कृति को ऊपर उठाने के लिए नहीं किया जा सकता?भोजपुरी गाने इन दिनों फिर चर्चा में हैं. एक तरफ ‘लहंगा से महंगा’ जैसे गानों को अवॉर्ड मिल रहे हैं, तो दूसरी तरफ ‘गरमी गरम बिया’ जैसे गाने भी खूब सुने जा रहे हैं. किसी को इन गानों की धुन पसंद है, तो किसी को इनका अंदाज. कलाकारों के लिए ये गाने हिट हैं, आयोजकों के लिए कमाई का जरिया और कंपनियों के लिए बाजार में टिके रहने का फॉर्मूला. लेकिन इस चमक-दमक के बीच एक सवाल भी है, जिस पर बात कम होती है. क्या भोजपुरी की पहचान अब बस लहंगा, चोली और दोहरे मतलब वाले बोल तक सिमटकर रह जाएगी?पवन सिंह मजे की बात यह है कि भोजपुरी के मंच पर संस्कृति और परंपरा की बात खूब होती है. अपनी भाषा पर गर्व करने की अपील भी की जाती है. भोजपुरी को सम्मान दिलाने की बातें भी उठती हैं. लेकिन जब गानों की बारी आती है, तो वही भाषा कई बार ऐसे बोल और वीडियो में उलझी दिखती है, जहां महिला का किरदार उसकी अदाओं, कपड़ों और शरीर तक सिमटकर रह जाता है. सवाल यह नहीं कि भोजपुरी में मनोरंजन क्यों हो रहा है. सवाल यह है कि मनोरंजन के नाम पर बार-बार भोजपुरी की गरिमा के साथ खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है?भिखारी ठाकुर के गानों और आज की भोजपुरी में इतना फर्क क्यों?भोजपुरी कोई कल पैदा हुई भाषा नहीं है. न ही इसकी पहचान सिर्फ फिल्मों और म्यूजिक वीडियो से बनी है. इस भाषा की अपनी लोक परंपरा है, अपना दुख-सुख है और समाज को आईना दिखाने का अपना तरीका भी.एक बार भिखारी ठाकुर को याद कीजिए. उन्होंने ‘बिदेसिया’, ‘बेटी-वियोग’ और ‘बेटी बेचवा’ जैसी रचनाओं के जरिए समाज की उन सच्चाइयों को सामने रखा, जिन पर खुलकर बात करना आसान नहीं था. महेंद्र मिसिर की रचनाओं ने भोजपुरी लोकसंगीत को अलग पहचान दी. शारदा सिन्हा ने छठ के गीतों और लोकधुनों को घर-घर पहुंचाया. सोहर, विवाह गीत, बिरहा, निर्गुण और खेत-खलिहान में गाए जाने वाले गीतों में इस भाषा की असली मिट्टी बसती है.तब जीवन का रस था, अब क्या है?इन गीतों में भी प्रेम था, शरारत थी, हंसी थी और जीवन का रस था. लेकिन इनके पास कहने के लिए कुछ था. कहीं विरह था, कहीं परिवार का दुख, कहीं समाज की बुराई पर चोट और कहीं लोकजीवन की खूबसूरती.ऐसा नहीं है कि आज भोजपुरी में अच्छे और अर्थपूर्ण गीत नहीं बन रहे. बन रहे हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि चर्चा में अक्सर वही गाने आगे आ जाते हैं, जिनके बोल और वीडियो विवाद खड़ा करते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि हर बार उसी गाने और वीडियो की चर्चा क्यों होती है, जिसमें महिला के कपड़ों या शरीर को लेकर सनसनी पैदा की जाए? क्या दर्शकों को हंसाने, नचाने और मनोरंजन करने के लिए इसके अलावा कोई रास्ता नहीं बचा?क्या गाने हिट होने चाहिए या हर बार गरिमा गिरवी रखनी होगी?पवन सिंह का ‘लहंगा से महंगा’ हो या खेसारी लाल यादव का ‘गरमी गरम बिया’, इन गानों की लोकप्रियता और इन्हें मिले सम्मान पर चर्चा हो सकती है. लेकिन सवाल किसी एक कलाकार को कटघरे में खड़ा करने का नहीं है. भोजपुरी संगीत की दुनिया में कई बड़े सितारे हैं और बाजार में टिके रहने की अपनी मजबूरियां भी. फिर भी यह पूछना गलत नहीं होगा कि हिट होने की दौड़ में आखिर किस चीज को सबसे पहले दांव पर लगाया जा रहा है?अगर किसी गाने में महिला को बार-बार उसके कपड़ों, शरीर या दोहरे मतलब वाले संवादों के जरिए ही पेश किया जाता है, तो क्या यह सिर्फ मनोरंजन है? और अगर यही फॉर्मूला लगातार दोहराया जाता है, तो क्या इससे भोजपुरी की छवि को नुकसान नहीं पहुंचता?समाज को भी सोचना होगायह भी सच है कि दर्शक ऐसे गाने सुनते हैं, वीडियो देखते हैं और कई बार उन्हें वायरल भी करते हैं. इसलिए पूरी जिम्मेदारी कलाकारों पर डालकर दर्शकों को बरी नहीं किया जा सकता. म्यूजिक कंपनियां, वीडियो बनाने वाले, आयोजक और दर्शक, सभी इस बाजार का हिस्सा हैं.लेकिन बाजार की मजबूरी बताकर कलाकार अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकते. जिन सितारों की आवाज और चेहरे से करोड़ों लोग जुड़ते हैं, उनकी जिम्मेदारी भी ज्यादा बनती है. लोकप्रियता सिर्फ कमाई और तालियों का नाम नहीं है. इसके साथ यह सवाल भी आता है कि आप लोगों तक क्या पहुंचा रहे हैं.हर गाने में समाज सुधार का संदेश हो, यह जरूरी नहीं. प्रेम, मस्ती और नाच-गाने की अपनी जगह है. लेकिन मस्ती और महिला को महज सामान बनाकर पेश करने के बीच फर्क तो होना ही चाहिए. राजनीति में पहुंचे, तब सवाल और बड़ा हो जाता हैभोजपुरी की लोकप्रियता का दायरा सिर्फ सिनेमा और संगीत तक नहीं रहा. मनोज तिवारी और रवि किशन जैसे कलाकार संसद तक पहुंचे. दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ भी सांसद रह चुके हैं. इनकी पहचान में भोजपुरी भाषा, संगीत और फिल्मों की बड़ी भूमिका रही है. लाखों लोगों ने इन्हें कलाकार के तौर पर पसंद किया और इनमें से कुछ को राजनीतिक जिम्मेदारियां भी मिलीं.यहां सवाल उठना लाजिमी है. जब भोजपुरी के नाम पर जनता से जुड़ने, भाषा के सम्मान और संस्कृति की बात करने का मौका मिलता है, तब इस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए क्या किया जा रहा है? क्या भोजपुरी की पहचान सिर्फ चुनावी मंचों पर अपनी भाषा में भाषण देने और भीड़ जुटाने तक सीमित रहेगी? या फिर संगीत, फिल्मों और डिजिटल वीडियो में भी ऐसी विविधता को बढ़ावा मिलेगा, जिसमें भोजपुरी की पूरी दुनिया दिखाई दे?यह सवाल किसी नेता की नीयत पर फैसला सुनाने के लिए नहीं है. सवाल उनकी सार्वजनिक भूमिका और सांस्कृतिक प्रभाव का है. जो कलाकार राजनीति में हैं, उनसे उनके काम और जिम्मेदारियों पर सवाल पूछे जा सकते हैं. जो कलाकार राजनीति में नहीं हैं, उनसे उनके संगीत और समाज पर पड़ने वाले असर को लेकर बात हो सकती है. दोनों को एक ही तराजू पर तौलना ठीक नहीं, लेकिन भोजपुरी की छवि पर चर्चा करते समय उनकी भूमिका को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता.क्या केवल अफसोस से काम चलेगा?रवि किशन ने अपने पुराने गाने ‘लहंगा उठा के’ को लेकर अफसोस जताने की बात कही है. वहीं मनोज तिवारी ने भोजपुरी संगीत के बाजार और म्यूजिक कंपनियों की भूमिका पर भी बात की है. ऐसे बयानों को उनके पूरे संदर्भ में समझना जरूरी है.लेकिन एक सवाल यहां भी है. अगर किसी कलाकार को बाद में अपने पुराने काम पर अफसोस होता है, तो आज बन रहे गानों के बारे में दस साल बाद क्या कहा जाएगा? संस्कृति की बात करना आसान है. उसे अपने काम में जगह देना मुश्किल. यही फर्क गानों और मंचों के बीच भी दिखाई देता है.भोजपुरी को प्यार है, तो उसकी पहचान का ख्याल भी रखिएभोजपुरी के कलाकारों को यह समझना होगा कि उनकी भाषा सिर्फ एक बाजार नहीं है. यह करोड़ों लोगों की मातृभाषा है. इसमें लोगों की यादें हैं, उनके त्योहार हैं, उनकी मेहनत है, उनका प्रेम है और उनकी जिंदगी की कहानियां हैं. इसी भाषा ने कलाकारों को पहचान, पैसा और शोहरत दी है. कुछ को राजनीति तक पहुंचाया है.ऐसे में भोजपुरी की गरिमा की बात करना सिर्फ भाषण देने या किसी खास दिन पर अपनी संस्कृति याद करने से पूरा नहीं होगा. यह भी देखना होगा कि गानों, फिल्मों और वीडियो में इस भाषा को किस रूप में पेश किया जा रहा है.शर्म और सम्मान का रिश्ता भी समझिएयहां शर्म की बात किसी एक गाने के हिट होने या किसी कलाकार को अवॉर्ड मिलने में नहीं है. सवाल तब उठता है, जब भोजपुरी की पूरी सांस्कृतिक दुनिया को कुछ चुनिंदा फॉर्मूलों में समेट दिया जाता है और फिर उसी भाषा के सम्मान की दुहाई भी दी जाती है.भोजपुरी में भिखारी ठाकुर भी हैं, महेंद्र मिसिर भी और शारदा सिन्हा भी. इसमें खेतों की खुशबू है, छठ की आस्था है, बिरहा का दर्द है और प्रेम की शरारत भी. इसे सिर्फ लहंगा-चोली तक सीमित कर देना इस भाषा के साथ नाइंसाफी होगी.गाने बनाइए, हिट कराइए, लेकिन पहचान बचाकरगाने बनाइए, खूब बनाइए. हिट कराइए और पैसा भी कमाइए. लेकिन अपनी भाषा की पहचान को इतना छोटा मत कर दीजिए कि आने वाली पीढ़ी भोजपुरी सुनते ही सबसे पहले दोहरे मतलब वाले बोल याद करे.भोजपुरी संस्कृति की दुहाई देने वालों से बस इतना सवाल है: अगर भोजपुरी की गरिमा सच में इतनी प्यारी है, तो उसे बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ भाषणों में क्यों दिखाई देती है, हकीकत में क्यों नहीं?ये भी पढ़ें: फिल्म बनाना पड़ा भारी! 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