NJAC vs Collegium System: ‘मोदी सरकार के पास जजों की नियुक्ति पर नियंत्रण’, पूर्व जज के आरोप से फिर उठे सवाल

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सुप्रीम कोर्ट और जस्टिस के चंद्रू का फोटो. (Image: X)

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कॉलेजियम सिस्टम क्या है, NJAC को सुप्रीम कोर्ट ने क्यों रद्द किया था? मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व जज के चंद्रू ने न्यायिक नियुक्तियों में केंद्र सरकार के प्रभाव और गोपनीयता पर सवाल उठाए हैं. जानिए पूरा विवाद और दोनों व्यवस्थाओं में अंतर.

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चेन्नई में आयोजित एक चर्चा के दौरान के चंद्रू के अलावा ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस मुरलीधर ने भी नियुक्तियों में सरकार की भूमिका, फैसलों में देरी और महिला जजों की कम भागीदारी जैसे मुद्दे उठाए. हालांकि, सरकार के प्रभाव को लेकर लगाए गए आरोपों को समझने के लिए कॉलेजियम सिस्टम और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग यानी NJAC के पूरे विवाद को जानना जरूरी है.

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कॉलेजियम सिस्टम क्या है?

कॉलेजियम सिस्टम वह व्यवस्था है, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति और तबादले के लिए वरिष्ठ जजों का समूह नामों की सिफारिश करता है. इस व्यवस्था का संविधान में सीधे तौर पर जिक्र नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग फैसलों के बाद यह व्यवस्था बनी.

सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी CJI और चार वरिष्ठतम जज शामिल होते हैं. हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए भी तय प्रक्रिया के तहत संबंधित हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम की भूमिका होती है.

कॉलेजियम नामों की सिफारिश करता है, लेकिन नियुक्ति की प्रक्रिया में केंद्र सरकार की भी भूमिका होती है. जजों की औपचारिक नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं. इसलिए यह कहना सही नहीं है कि कॉलेजियम अकेले ही नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया चलाता है.

कॉलेजियम सिस्टम की शुरुआत कैसे हुई?

कॉलेजियम सिस्टम को समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट के तीन अहम फैसलों को जानना जरूरी है.

  • पहला जज मामला, 1981: इस फैसले में जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका को ज्यादा महत्व दिया गया था.
  • दूसरा जज मामला, 1993: सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्तियों में मुख्य न्यायाधीश की राय और वरिष्ठ जजों की भूमिका को प्रमुखता दी. इससे कॉलेजियम व्यवस्था की नींव मजबूत हुई.
  • तीसरा जज मामला, 1998: इस फैसले में कॉलेजियम की संरचना और नियुक्तियों के लिए विचार-विमर्श की प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया.

इन फैसलों के बाद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए वरिष्ठ जजों की सिफारिशें महत्वपूर्ण हो गईं.

NJAC क्या था और इसे क्यों लाया गया?

NJAC का पूरा नाम नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन है. हिंदी में इसे राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कहते हैं. इसे कॉलेजियम सिस्टम की जगह जजों की नियुक्ति के लिए एक नई व्यवस्था के तौर पर लाया गया था.

केंद्र सरकार का कहना था कि कॉलेजियम सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की जरूरत है. इसी उद्देश्य से 99वां संविधान संशोधन और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014 लाया गया. दोनों 13 अप्रैल 2015 से प्रभावी हुए.

सरकार चाहती थी कि जजों की नियुक्ति में सिर्फ वरिष्ठ जजों की ही नहीं, बल्कि दूसरे जिम्मेदार लोगों की भी भागीदारी हो. इससे चयन प्रक्रिया ज्यादा खुली और जवाबदेह बन सके.

कॉलेजियम और NJAC में क्या अंतर है?

दोनों व्यवस्थाओं में सबसे बड़ा अंतर जजों की नियुक्ति में दूसरे लोगों की भूमिका को लेकर था.

आधारकॉलेजियम सिस्टमNJAC
व्यवस्थावरिष्ठ जजों का समूहछह सदस्यों का आयोग
न्यायपालिका की भूमिकाप्रमुख भूमिकातीन न्यायिक सदस्य
सरकार की भूमिकानियुक्ति प्रक्रिया में भागीदारीकानून मंत्री आयोग के सदस्य
मुख्य उद्देश्यन्यायिक स्वतंत्रता की रक्षापारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना
बड़ा विवादगोपनीयता और चयन के मानदंडन्यायपालिका पर सरकारी प्रभाव
वर्तमान स्थितिलागू है2015 में रद्द

NJAC में कौन-कौन सदस्य शामिल थे?

NJAC में कुल छह सदस्य रखे गए थे.

  • भारत के मुख्य न्यायाधीश इसके अध्यक्ष होते.
  • सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जज सदस्य होते.
  • केंद्रीय कानून मंत्री को भी सदस्य बनाया गया था.
  • दो प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भी आयोग में जगह मिलनी थी.
  • इन दो प्रतिष्ठित व्यक्तियों को प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष के नेता या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता वाली समिति नामित करती.

इस तरह NJAC में न्यायपालिका के साथ सरकार और अन्य सदस्यों को भी भूमिका दी गई थी. इसके समर्थकों का मानना था कि इससे नियुक्तियों में जवाबदेही बढ़ेगी. वहीं, विरोध करने वालों को डर था कि इससे सरकार का प्रभाव बढ़ सकता है और न्यायपालिका की स्वतंत्रता कमजोर हो सकती है.

16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से NJAC और 99वें संविधान संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर दिया. इसके बाद कॉलेजियम सिस्टम फिर से लागू हो गया. अदालत के बहुमत का मानना था कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है. NJAC की व्यवस्था में जजों की नियुक्ति को लेकर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिल रही थी. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं था कि कॉलेजियम सिस्टम में कोई कमी नहीं है. नियुक्तियों में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल पहले भी उठते रहे थे और फैसले के बाद भी यह बहस जारी रही. इस मामले में जस्टिस जे चेलमेश्वर ने बहुमत के फैसले से असहमति जताई थी. उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी पर सवाल उठाए थे.

के चंद्रू का आरोप है कि केंद्र सरकार ने NJAC को दोबारा लागू करने की कोशिश नहीं की, क्योंकि मौजूदा कॉलेजियम सिस्टम में ही उसे जजों की नियुक्ति पर प्रभाव डालने के मौके मिल रहे हैं. उन्होंने कॉलेजियम की गोपनीयता पर भी सवाल उठाए. उनका कहना है कि जजों की नियुक्ति जैसे अहम मामले में आम लोगों को यह पता चलना चाहिए कि किन नामों पर विचार हुआ और किसी उम्मीदवार को चुनने या छोड़ने के पीछे क्या वजह रही. ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. मुरलीधर ने भी नियुक्तियों में देरी का मुद्दा उठाया. उन्होंने जस्टिस के.एम. जोसेफ की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति की सिफारिश का उदाहरण दिया. जनवरी 2018 में कॉलेजियम ने जस्टिस के.एम. जोसेफ और वरिष्ठ अधिवक्ता इंदु मल्होत्रा के नामों की सिफारिश की थी. इंदु मल्होत्रा की नियुक्ति को मंजूरी मिल गई, जबकि जस्टिस जोसेफ के नाम पर फैसला लेने में कई महीने लग गए. इस मामले को नियुक्तियों में देरी और सरकार की भूमिका से जुड़े सवालों के उदाहरण के तौर पर पेश किया गया. हालांकि, किसी नियुक्ति में देरी होना अपने आप में सरकारी हस्तक्षेप का पक्का सबूत नहीं है. ऐसे मामलों को समझने के लिए पूरी प्रक्रिया और संबंधित तथ्यों को देखना जरूरी है.

कॉलेजियम सिस्टम को लेकर मुख्य रूप से तीन सवाल उठते हैं. पहला, नियुक्तियों में पारदर्शिता कितनी है? कॉलेजियम किन नामों पर विचार करता है और किसी उम्मीदवार को क्यों चुना जाता है, इसकी पूरी जानकारी हमेशा सार्वजनिक नहीं होती. इसलिए चयन के मानदंड स्पष्ट करने की मांग होती रही है. दूसरा, सरकार की भूमिका कितनी होनी चाहिए? सरकार नियुक्ति प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी जरूरी है. ऐसे में सिफारिशों पर फैसला लेने में देरी होने पर जवाबदेही तय करने का सवाल उठता है. तीसरा, महिला जजों और अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों की भागीदारी कैसे बढ़े? उच्च न्यायपालिका में महिलाओं और अलग-अलग सामाजिक व क्षेत्रीय पृष्ठभूमि के लोगों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की जरूरत पर भी चर्चा होती रही है.

NJAC को दोबारा लागू करना आसान नहीं है. सुप्रीम कोर्ट पहले ही 99वें संविधान संशोधन और NJAC अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर चुका है. इसलिए ऐसी व्यवस्था को फिर से लाने के किसी भी प्रयास को संवैधानिक सीमाओं और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप होना होगा. फिलहाल देश में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम सिस्टम ही लागू है. केंद्र सरकार की भूमिका और नियुक्तियों की प्रक्रिया में सुधार को लेकर बहस आगे भी जारी रह सकती है. कुल मिलाकर, NJAC और कॉलेजियम सिस्टम की बहस सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं है कि जजों की नियुक्ति कौन करे. असली सवाल यह है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता कैसे बनी रहे, नियुक्तियों में पारदर्शिता कैसे बढ़े और सरकार तथा न्यायपालिका के बीच जवाबदेही का संतुलन कैसे कायम हो. के चंद्रू के आरोपों ने एक बार फिर इसी बहस को चर्चा में ला दिया है.

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Frequently Asked Questions

16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से NJAC और 99वें संविधान संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर दिया. इसके बाद कॉलेजियम सिस्टम फिर से लागू हो गया. अदालत के बहुमत का मानना था कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है. NJAC की व्यवस्था में जजों की नियुक्ति को लेकर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिल रही थी. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं था कि कॉलेजियम सिस्टम में कोई कमी नहीं है. नियुक्तियों में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल पहले भी उठते रहे थे और फैसले के बाद भी यह बहस जारी रही. इस मामले में जस्टिस जे चेलमेश्वर ने बहुमत के फैसले से असहमति जताई थी. उन्होंने कॉलेजियम सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी पर सवाल उठाए थे.