विदेश में पढ़ाई का सपना, लेकिन पैसे की टेंशन? भारत से लें Loan या वहीं से, जानें क्या है बेहतर
पढ़ाई के लिए फाइनेंस का फैसला
विदेश में पढ़ाई के लिए एजुकेशन लोन लेने वाले हैं? जानें भारत से लोन लेना बेहतर है या होस्ट कंट्री से और किसमें ब्याज व करेंसी रिस्क कम हो सकता है.
विदेश में पढ़ाई का सपना सिर्फ एडमिशन और वीजा तक सीमित नहीं है. असली सवाल तब आता है जब फीस, रहने का खर्च और दूसरे खर्चों के लिए लाखों रुपये की जरूरत पड़ती है. ऐसे में भारतीय छात्रों के सामने एक बड़ा सवाल रहता है कि एजुकेशन लोन भारत से लिया जाए या जिस देश में पढ़ाई करने जा रहे हैं, वहीं से? सही विकल्प चुनना इसलिए जरूरी है, क्योंकि लोन की करेंसी, ब्याज दर और रीपेमेंट का असर पढ़ाई पूरी होने के बाद कई साल तक रहता है.
भारत से एजुकेशन लोन लेने का क्या फायदा है?
भारत से लोन लेने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि परिवार के लिए पूरी प्रक्रिया रुपये में रहती है. उदाहरण के लिए, SBI की ग्लोबल एड-वैंटेज स्कीम के तहत विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों को 3 करोड़ रुपये तक का लोन मिल सकता है. कुछ चुनिंदा विदेशी संस्थानों में 50 लाख रुपये तक का लोन बिना कोलेटरल के भी मिल सकता है. इस स्कीम में कोर्स पूरा होने के बाद मोरेटोरियम और 15 साल तक रीपेमेंट की सुविधा भी है. SBI के मुताबिक, यह योजना विदेश में हायर एजुकेशन के लिए बनाई गई है. भारत से लोन लेने पर माता-पिता या गार्जियन को-बारोअर बन सकते हैं और जरूरत पड़ने पर प्रॉपर्टी जैसी सिक्योरिटी भी देनी पड़ सकती है. यानी अगर परिवार की फाइनेंशियल प्रोफाइल अच्छी है और कोलेटरल उपलब्ध है, तो भारतीय बैंक का विकल्प सुविधाजनक हो सकता है.
लेकिन यहां एक जरूरी बात समझना भी जरूरी है. विदेश में पढ़ाई का खर्च डॉलर, पाउंड या यूरो में होता है, जबकि लोन रुपये में लिया जाता है. ऐसे में अगर विदेशी करेंसी के मुकाबले रुपया कमजोर होता है, तो फीस और दूसरे खर्चों के लिए ज्यादा रुपये की जरूरत पड़ सकती है.
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होस्ट कंट्री से लोन लेने पर क्या फायदा होगा?
अगर कोई छात्र अमेरिका जैसे देश में पढ़ाई करने के साथ वहीं नौकरी करने की योजना बना रहा है, तो उसी देश की करेंसी में लोन लेना एक विकल्प हो सकता है. इसका फायदा यह है कि पढ़ाई पूरी होने के बाद डॉलर में सैलरी मिलने पर उसी करेंसी में रीपेमेंट किया जा सकता है. इससे करेंसी कन्वर्जन का जोखिम कम हो सकता है. हालांकि, इंटरनेशनल स्टूडेंट्स के लिए होस्ट कंट्री में प्राइवेट एजुकेशन लोन लेना हमेशा आसान नहीं होता. अमेरिका में प्राइवेट स्टूडेंट लोन के लिए क्रेडिट हिस्ट्री, इनकम और कई मामलों में को-साइनर की जरूरत पड़ सकती है. कंज्यूमर फाइनेंशियल प्रोटेक्शन ब्यूरो के मुताबिक, प्राइवेट स्टूडेंट लोन की ब्याज दर फेडरल स्टूडेंट लोन से अलग हो सकती है और कुछ लोन में ब्याज दर बदल भी सकती है. इसलिए सिर्फ कम ब्याज दर देखकर लोन चुनना सही फैसला नहीं होगा. प्रोसेसिंग फीस, वेरिएबल इंटरेस्ट रेट, रीपेमेंट हॉलिडे और को-साइनर की शर्त भी देखनी चाहिए.
तो भारतीय छात्रों के लिए कौन सा लोन बेहतर है?
अगर छात्र पढ़ाई के बाद भारत लौटकर नौकरी करने की सोच रहा है, तो रुपये में लोन लेना ज्यादा सुविधाजनक हो सकता है. इसकी वजह साफ है कि सैलरी रुपये में आएगी और ईएमआई भी रुपये में ही चुकानी होगी. वहीं, अगर छात्र का साफ प्लान विदेश में नौकरी करने और वहीं कमाई करने का है, तो होस्ट कंट्री का लोन भी विकल्प बन सकता है.
सबसे जरूरी बात यह है कि लोन की तुलना सिर्फ ब्याज दर से न करें. कुल कितना पैसा वापस करना होगा, करेंसी रिस्क कितना है, कोलेटरल देना पड़ेगा या नहीं और नौकरी न मिलने पर रीपेमेंट कैसे होगा. इन सभी बातों को साथ में देखें.
विदेश की पढ़ाई का फैसला करते समय सिर्फ यूनिवर्सिटी और कोर्स की फीस न देखें. लोन की पूरी लागत, रहने का खर्च और पढ़ाई के बाद संभावित कमाई को जोड़कर देखें. इससे पता चलेगा कि लिया गया लोन वास्तव में आपकी जेब पर कितना बोझ डालेगा. विदेश में पढ़ाई महंगी हो सकती है, लेकिन सही लोन चुनकर उसके फाइनेंशियल रिस्क को काफी हद तक संभाला जा सकता है.
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