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आदिवासी समाज में पूर्वजों के नाम को जिंदा रखने की अद्भुत परंपरा

Updated at : 23 Aug 2019 6:59 AM (IST)
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आदिवासी समाज में पूर्वजों के नाम को जिंदा रखने की अद्भुत परंपरा

दशमत सोरेन यह शरीर एक दिन मिट्टी में मिल जायेगा. बस रह जायेगा, तो इस धरती में केवल व्यक्ति का नाम. भले शरीर नश्वर हो, लेकिन लोग मर कर भी अमर होना चाहते हैं. मर कर भी अपने नाम की बदौलत इस धरती पर जीवित रहना चाहते हैं. लोगों को अपनी मौजूदगी एहसास करना चाहते […]

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दशमत सोरेन
यह शरीर एक दिन मिट्टी में मिल जायेगा. बस रह जायेगा, तो इस धरती में केवल व्यक्ति का नाम. भले शरीर नश्वर हो, लेकिन लोग मर कर भी अमर होना चाहते हैं. मर कर भी अपने नाम की बदौलत इस धरती पर जीवित रहना चाहते हैं. लोगों को अपनी मौजूदगी एहसास करना चाहते हैं.
नाम कमाने के लिए जीवन भर लोग तरह-तरह के उद्यम करते हैं. इसके विपरीत आदिवासी समुदाय में नाम को कभी मरने नहीं दिया जाता है. नाम को पीढ़ी दर पीढ़ी हजारों साल तक जीवित रखने की परंपरा है. यह संभव होता है नामकरण के दोहराव से. आदिवासी संताल समाज में पोता-पोती को दादा-दादी एवं नाना-नानी का नाम देने की परंपरा है. हर माता-पिता चाहते हैं कि वे माता-पिता के नाम पर बेटा-बेटी का नामकरण करें. कभी-कभी तो ऐसा भी हो जाता है कि एक ही परिवार में एक ही नाम के तीन-चार लोग रहते हैं.
प्रगाढ़ प्रेम को दर्शाता है नामकरण : माता-पिता को इस धरती पर ईश्वर के तुल्य माना गया है. माता-पिता हमेशा अपने बच्चों से प्रेम करते हैं. बच्चे भी अपने माता-पिता से अथाह प्रेम करते हैं. जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. बच्चों के लिए उनके माता-पिता ही उनकी दुनिया हैं. विपरीत परिस्थिति में माता-पिता अपने बच्चों के लिए जान तक दे देते हैं.
बच्चे भी अपने माता-पिता का सिर ऊंचा करने के लिए हर जोखिम व परेशानी झेल जाते हैं. आदिवासी संताल समाज में अपने बच्चों का नामकरण माता-पिता के नाम पर करना, अपने माता-पिता के प्रति प्रगाढ़ प्रेम को दर्शाता है.
वे अपने माता-पिता को हमेशा अपने पास देखना चाहते हैं. यही वजह है कि संताल समाज अपने माता-पिता के नाम पर ही बच्चों का नाम रखते हैं. वे अपने बच्चों को अक्सर उनके नाम से नहीं बल्कि मां-बाबा कह कर ही पुकारते हैं. अपने बच्चों के चेहरे पर अपने माता-पिता को देखते हैं.
यही वह मुख्य वजह है, जिसके कारण आदिवासी समाज अपने माता-पिता को बुजुर्ग अर्थात बूढ़ा-बूढ़ी होने पर वृद्धाश्रम का रास्ता नहीं दिखाते हैं. आदिवासी समाज में वृद्धाश्रम पहुंचाने की कोई परंपरा नहीं है. जीवन के अंतिम समय तक माता-पिता की तन्मयता से सेवा की जाती है.
पोता-पोती को दादा-दादी का पुनर्जन्म हैं मानते : पुनर्जन्म को किसी ने नहीं देखा है. इस वजह से लोगों में अपने पुनर्जन्म के बारे में जानने की तीव्र इच्छा होती है. साधु-संतों से अपने पुनर्जन्म के बारे में जान कर काफी खुश होते हैं.
पूर्वजों ने हर रिश्ते को संजोये रखने के लिए अनूठी संस्कृति व संस्कार बनाये हैं. उसे हम मान कर चलें, तो समाज में हमेशा मिठास बनी रहेगी. यही वजह है कि नयी पीढ़ी को अपने समाज व संस्कृति को नजदीक से जानने व समझने के लिए प्रेरित किया जाता है. जो अपने पूर्वजों के बनाये रास्ते का अनुसरण करेगा. वह हमेशा हर रिश्ते की अहमियत को समझेगा. इतना ही नहीं, वह सामाजिक दायित्व का निर्वहन करते हुए समाज की उन्नति व प्रगति के बारे में भी सोचेगा. आदिवासी समाज मरणोपरांत भी अपने पूर्वजों की पूजा करता है.
दशमत हांसदा, तोरोफ परगना, जुगसलाई (पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के प्रमुख)
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