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डॉ राम मनोहर लोहिया की 50वीं पुण्यतिथि पर विशेष : जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं

Updated at : 12 Oct 2017 7:47 AM (IST)
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डॉ राम मनोहर लोहिया की 50वीं पुण्यतिथि पर विशेष : जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं

क्रांति प्रकाश वरिष्ठ पत्रकार राम मनोहर लोहिया के तीन करीबी व्यक्ति प्रो रमा मित्रा, बद्री विशाल पित्ती और लोकबंधु राजनारायण का स्नेह मुझे सदा मिलता रहा है. पहली बार डॉ लोहिया के बारे में बिहार युवा आंदोलन के दौरान सुना था. उस वक्त मैं बाल अवस्था में था. दिल्ली आने के बाद 1977 में डॉ […]

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क्रांति प्रकाश
वरिष्ठ पत्रकार
राम मनोहर लोहिया के तीन करीबी व्यक्ति प्रो रमा मित्रा, बद्री विशाल पित्ती और लोकबंधु राजनारायण का स्नेह मुझे सदा मिलता रहा है. पहली बार डॉ लोहिया के बारे में बिहार युवा आंदोलन के दौरान सुना था. उस वक्त मैं बाल अवस्था में था. दिल्ली आने के बाद 1977 में डॉ लोहिया के बारे में जानकारी मिली, जब मैं दिल्ली के विश्वंभर दास मार्ग में रहा करता था. डॉ लोहिया समता न्यास की बैठक 8 विश्वंभर दास मार्ग में हुआ करती थी, तो इसके न्यासी रमा मित्रा, बद्री विशाल पित्ती आदि से मुझे लोहिया जी के बारे में जानकारी मिलती थी.
यह न्यास डॉ लोहिया के भाषणों की पुस्तिका बनाकर प्रचार-प्रसार का काम करती थी. डॉ लोहिया के द्वारा दिये गये भाषणों की पुस्तिका – सगुण और निर्गुण, रामकृष्ण और शिव, निराशा का कर्तव्य, इतिहास चक्र, माक्, गांधी और सोशलिज्म आदि हैं. ये सारी पुस्तकें सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को पढ़नी चाहिए, खासकर नई पीढ़ी के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को. इससे उनकी बौध्दिक क्षमता का विकास होगा.
डॉ लोहिया कई सिद्धांतों के जनक माने जाते हैं. उनकी सप्त क्रांति आज भी प्रासंगिक है.
उन्होंने नर-नारी की समानता के लिए क्रांति, दिमागी असमानता के खिलाफ क्रांति, जन्मजात जाति प्रथा के खिलाफ क्रांति, गुलामी के खिलाफ क्रांति, निजी पूंजी की विषमता के खिलाफ क्रांति, निजी जीवन में अन्यायी हस्तक्षेप के खिलाफ क्रांति, हिंसा के खिलाफ और सत्याग्रह के लिए क्रांति का आह्वान किया था. उन्होंने एक साथ 7 क्रांतियों का आह्वान किया था. लोहिया ने कहा था कि सातों क्रांतियां विश्व में एक साथ चल रही हैं और भारत में भी इन क्रांतियों को एक साथ चलाने की कोशिश करना चाहिए.
देश में गैर-कांग्रेसवाद की अलख जगाने वाले लोहिया चाहते थे कि दुनियाभर के समाजवादी एकजुट होकर मजबूत मंच बनाएं. लोहिया के अथक प्रयासों का ही नतीजा था कि 1967 में कई राज्यों में कांग्रेस की पराजय हुई.
वह स्वतंत्र भारत के उन लोगों की आवाज थे, जिनकी आवाज सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंचती थी. डॉ लोहिया हिमालय के प्रति संवेदनशील थे, इसलिए हिमालय बचाओ सम्मेलन का भी आयोजन करवाते थे. वह पड़ोसी देशों के प्रति भी उतने ही संवेदनशील थे. स्वतंत्र भारत में पहली राजनीतिक गिरफ्तारी उनकी ही हुई थी. नेपाल के सवाल पर मंडी हाउस पर धारा 144 तोड़ने का काम करने पर उनकी गिरफ्तारी हुई थी.
डॉ लोहिया रंगभेद के खिलाफ थे, इसलिए अफ्रीकी लोगों को ‘रंगीन’ कहते थे. वह जब तक जीवित रहे, पूरे देश में एक सशक्त राजनेता की भूमिका अदा करते रहे.
चाहे गोवा की आजादी की लड़ाई लड़ने की बात हो या नेफा का सवाल हो, वह अपना निजी स्वार्थ न रखते हुए देश हित में काम करते थे और अपने सहयोगियों को यही सिखाते थे. उन्होंने कम समय में ही लोकसभा में अपनी वाणी और तर्कों से पहचान बनायी. ये बातें आज भी नए सांसदों को सीखना चाहिए. डॉ लोहिया के कालखंड में जितने भी विपक्षी नेता थे, उनमें एक नैतिक बल हुआ करता था, जिसका आज के प्रतिपक्षी नेताओं में अभाव है.
डॉ लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं. लोहिया कौम के बारे में सोचते थे, लेकिन इसके उलट आज के नेता सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं. लोहिया की आज भी भारतीय राजनीति को जरूरत है. उनका ही व्यक्तित्व सही मायने में भारतीय संदर्भों में भारत का भविष्य सुनिश्चित कर सकता है.
(लेखक राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और जैविक खेती अभियान के संस्थापक हैं.)
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