कैंसर के इलाज में आनेवाली है क्रांति

Updated at : 08 Jun 2014 5:43 AM (IST)
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कैंसर के इलाज में आनेवाली है क्रांति

-मैथ्यू हार्पर- कैंसर का नाम सुनते ही अच्छे-अच्छे लोगों की रूह कांप जाती है. जरा सोचिए! जो इससे पीड़ित हैं, उनके दिल पर क्या बीतती होगी. कैंसर की दवा बनाने वाली अग्रणी कंपनी नोवार्टिस एक ऐसी दवा विकसित कर रही है, जिससे आनेवाले दिनों में न केवल कीमियोथेरेपी जैसी लंबी और कष्टकारी प्रक्रिया से निजात […]

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-मैथ्यू हार्पर-

कैंसर का नाम सुनते ही अच्छे-अच्छे लोगों की रूह कांप जाती है. जरा सोचिए! जो इससे पीड़ित हैं, उनके दिल पर क्या बीतती होगी. कैंसर की दवा बनाने वाली अग्रणी कंपनी नोवार्टिस एक ऐसी दवा विकसित कर रही है, जिससे आनेवाले दिनों में न केवल कीमियोथेरेपी जैसी लंबी और कष्टकारी प्रक्रिया से निजात मिल जायेगी, वरन यह लाइलाज मर्ज सौ फीसदी ठीक भी हो सकेगा. प्रभात खबर के संडे स्पेशल में आज पढ़ें इसी पर एक रिपोर्ट..

रक्त कैंसर से पीड़ित 85 फीसदी बच्चों का इलाज कीमियोथेरेपी से हो जाता है. लेकिन छह साल की एमिलि ह्वाइटहडे पर कीमियोथेरेपी कारगर साबित नहीं हो रही थी. पांच वर्ष की उम्र में कीमियोथेरेपी के पहले दौर में ही उसे संक्रमण हुआ, जिससे उसके पैर लगभग बेकार हो गये. इसके बाद कैंसर फिर वापस आ गया. तब उसका बोनमैरो ट्रांसप्लांट हुआ. लेकिन, कैंसर लौट कर फिर आ गया. डॉक्टरों के पास कुछ करने को नहीं बचा था. डॉक्टरों ने एमिलि का इलाज नये तरीके से करने की सोची.

यह इलाज एक तरह से ऐसा प्रयोग था, जो पहले किसी बच्चे पर नहीं किया गया था. एमिलि के शरीर से खून को निकाला गया. मशीन की मदद से खून में से सफेद रक्त कोशिकाओं को अलग कर खून को एमिलि के शरीर में प्रवेश करा दिया गया. पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने मोडिफाइड एचआइवी वायरस की मदद से सफेद रक्त कोशिकाओं की जीन को इस तरह से प्रोग्राम किया कि वो कैंसर को खत्म करें. इसके बाद सफेद रक्त कोशिकाओं को एमिलि के शरीर में डाला गया.

नतीजा उत्साहजनक सफेद रक्त कोशिकाएं कैंसर पर तो हमला कर रही थीं, लेकिन एमिलि के शरीर पर भी उनका हमला हो रहा था. इस नये उपचार के बाद एमिलि की हालत इतनी खराब हुई कि उसे आइसीयू में वेंटीलेटर पर रखना पड़ा. एक डॉक्टर ने उसके परिवार को बताया कि एमिलि के बचने की उम्मीद न के बराबर है. यानी उसके जीवित रहने के चांस एक हजार में से एक ही हैं. इसके बाद एक चमत्कार हुआ. डॉक्टरों ने एमिलि को रूमेटाइड आर्थराइटिस की दवा दी, जिसकी मदद उसकी प्रतिरोधक क्षमता में फिर से जान आने लगी. उधर, कैंसर पर सफेद रक्त कोशिकाओं का हमला भी जारी था. इसके बाद एमिलि धीरे-धीरे ठीक होने लगी और उसने अपना सातवां जन्मदिन भी मनाया. एक हफ्ते बाद उसके बोनमैरो की जांच की गयी. एमिलि के पिता ने बताया कि उसके डॉक्टर स्टीफन ग्रूप्प ने फोन पर बताया- इलाज काम कर गया. अब वह कैंसर से मुक्त है. आज एमिलि पियानो बजाना सीख रही है और स्कूल जा रही है.

क्या कहते हैं डॉक्टर

एमिलि के इस इलाज की बाबत डॉ ग्रूप्प कहते हैं कि मैं 20 साल से कैंसर रोगियों का इलाज कर रहा हूं. लेकिन एमिलि जिस तरह से ठीक हुई, वैसा मैने पहले कभी नहीं देखा है. यह तो चमत्कार जैसा है.

एमिलि बनी पोस्टर चाइल्ड

अब एमिलि दवा कंपनी नोवार्टसि के उस अभियान की पोस्टर चाइल्ड बन गयी है, जिसके तहत कंपनी 9.9 बिलियन डॉलर खर्च कर इस उपचार को बाजार में लाने की तैयार कर रही है. यह रकम कंपनी शोध पर खर्च करेगी. नोवार्टसि के सीइओ जोसेफ जीमिनेज ने बताया कि मैंने कैंसर के इलाज को खोजने में लगी टीम से कह दिया है कि पैसे की चिंता करने की जरूरत नहीं है. जल्द से जल्द परिणाम लाने की कोशिश करनी चाहिए. जीमिनेज ने बताया कि वो अपनी टीम से यह सुनना चाहते हैं कि फेज-3 का ट्रायल पूरा हो गया है और इसे बाजार में उतारा जा सकता है. अगर कंपनी इसमें सफल होती है, तो कैंसर के इलाज में क्रांति आ जायेगी.

नोवार्टसि का इतिहास पुराना

कंपनी के पूर्व सीइओ डैनियल वसेल्ला बताते हैं कि उनके कार्यकाल का सबसे अच्छा दिन वह था, जिस दिन उन्होंने कंपनी के मार्केटिंग के लोगों की बात नहीं सुन कर कैंसर विशेषज्ञ ब्रायन ड्रकर की बात मानी. ड्रकर ने उन्हें कैंसर की दवा ग्लीव पर काम करने की सलाह दी थी. ग्लीव एक विशेष तरह के रक्त कैंसर के मरीजों के लिए चमत्कारिक दवा के रूप में सामने आयी. इस दवा की मदद से मरीज लंबे समय तक जिंदा रहने लगे. इस दवा की इतनी मांग है कि कंपनी से 2001 से अब तक इसकी कीमत में चार गुना से ज्यादा की वृद्धि की है. ग्लीव ने कंपनी की दिशा ही मोड़ दी है. जुलाई 2015 में नोवार्टसि का ग्लीव पर पेटेंट समाप्त होने जा रहा है.

मंजिल अभी दूर

फिर भी नोवार्टसि की मंजिल इतनी नजदीक भी नहीं है. इस तरह के उपचार को बाजार में उतारने से पहले कंपनी को पूरे विश्व में बच्चों और बड़ों पर क्लिनिकल ट्रायल करना होगा. हर व्यक्ति पर उसके असर को जांचना होगा. साइड इफेक्ट को कम करने पर भी शोध करना होगा. लेकिन कंपनी को उम्मीद है कि सभी कार्य 2016 तक पूरे हो जायेंगे, जब वह इसे बाजार में उतारने के लिए आवेदन करेगी.

(लेखक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका फोर्ब्स से जुड़े हैं)

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