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श्रीमद्भागवत से मिलता है ज्ञान, भक्ति, वैराग्य व मोक्ष

कोलकाता : जीवन में सद्गुरु, साधु-संत और महापुरुष मिल जायें तो समझिये कि भगवान की कृपा है. सद्गुरु हमें विवेक की दृष्टि देता है, जिससे हम जीवन को सही रूप में जीते हुए भगवान को प्राप्त करते हैं. श्रीमद्भागवत कथा हमारे जीवन की आचार संहिता है, इससे ज्ञान, भक्ति, वैराग्य एवं मोक्ष की प्राप्ति होती […]

कोलकाता : जीवन में सद्गुरु, साधु-संत और महापुरुष मिल जायें तो समझिये कि भगवान की कृपा है. सद्गुरु हमें विवेक की दृष्टि देता है, जिससे हम जीवन को सही रूप में जीते हुए भगवान को प्राप्त करते हैं. श्रीमद्भागवत कथा हमारे जीवन की आचार संहिता है, इससे ज्ञान, भक्ति, वैराग्य एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है. जीवन में आगे बढ़ना है तो हर समय सीखने की प्रवृति होनी चाहिए. यह सीख किसी से भी मिले तो उसमें संकोच नहीं करना चाहिए.

उसे सहज ही स्वीकार करना चाहिए. जिससे सीख मिलती है वही हमारे गुरु हैं. भगवान दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाये. वह कहते थे कि जिस किसी से भी जितना सीखने को मिले, हमें अवश्य ही उसे सीखने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए. उनके 24 गुरुओं में कबूतर, पृथ्वी, सूर्य, पिंगला, वायु, मृग, समुद्र, पतंगा, हाथी, आकाश, जल, मधुमक्खी, मछली, बालक, कुरर पक्षी, अग्नि, चंद्रमा, कुमारी कन्या, सर्प, तीर (बाण) बनानेवाला, मकड़ी, भृंगी, अजगर और भौंरा (भ्रमर) हैं. शुकदेव मुनि ने श्रीकृष्ण की सारी कथाओं को राजा परीक्षित को सुनाया.

परीक्षित के जीवन के अंतिम दिन शुकदेव मुनि ने परीक्षित से कहा कि विद्या, तपस्या, प्राणायाम, समस्त प्राणियों के प्रति, मित्र भाव, तीर्थ स्नान, व्रत, दान और जप आदि किसी भी साधन से मनुष्य का अंत:करण उतना शुद्ध नहीं होता जैसी शुद्धि भगवान श्रीकृष्ण को हृदय में विराजने से हो जाती है. परीक्षित से वह कहते हैं कि उनकी मृत्यु अब निकट आ गयी है इसलिए वह सजग हो जायें और पूरे मनोयोग से अपने हृदय में श्रीकृष्ण को विराजमान कर लें. ऐसा करने से उन्हें परम गति की प्राप्ति होगी.
परीक्षित ने वैसा ही किया. शुकदेव मुनि के मुख से कही गयी श्रीमद्भागवत कथा साक्षात श्रीकृष्ण को प्राप्त करानेवाली है. ये बातें टैगोर कैसल टेनेंट एसोसिएशन, राजबाड़ी एकता संघ, टैगोर कैसल निवासी वृंद, त्रिमूर्ति महिला समिति व पचीसिया एकेडमी के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा पर प्रवचन करते हुए पाथुरिया घाट स्थित बिन्नानी सभागार में पंडित गोपालजी व्यास ने कहीं.
आचार्य राजीव किराडू के आचार्यत्व में 111 ब्राह्मणों ने श्रीमदभागवत के मूल पाठ का पारायण किया. पंडित विमल किशोर किराडू के सान्निध्य में वैदिक मंत्रोच्चार से पूजन संपन्न हुआ. कथा को सफल बनाने में शोभा-घनश्याम लाखोटिया, पुष्पा मूंधड़ा, मंजु कोठारी, राजकमल पचिसिया, नारायण सादानी, सूरज नारायण मल, अरविंद सारडा, मुरारी केडिया, राधेश्याम साबु, गोपाल साबु, आनंद बिन्नानी, सुशील सारडा, महेंद्र कुमार पुरोहित, आदित्य माहेश्वरी, अरुण बागड़ी, राजकुमार लाट, विकास जैन, संजय जैन, पवन कानोड़िया, जयकिसन सादानी, लल्लू बिन्नानी, गिरिराज कोठारी, शशिकांत बागड़ी, सत्यनारायण मल्ल, राजीव किराडु, विजय कुमार व्यास, सुशील कुमार व्यास, अजय व्यास, अरविंद किराडू, नंदकिशोर किराडु, नंदकुमार व्यास, राहुल थानवी, प्रदीप वर्मा, सत्यनारायण चितलांगिया, महेंद्र कुमार रंगा, अमरनाथ जोशी, विकास कोठारी, मनमोहन ओझा व अजय सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.

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