झारखंड लिटरेरी मीट का समापन, अंतिम दिन साहित्यिक भाषा, फिल्म, अभिनय और नृत्यशैली पर हुआ मंथन

Updated at : 07 Mar 2022 10:39 AM (IST)
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झारखंड लिटरेरी मीट का समापन, अंतिम दिन साहित्यिक भाषा, फिल्म, अभिनय और नृत्यशैली पर हुआ मंथन

टाटा स्टील लिटरेरी मीट का समापन कल हुआ, जिसमें साहित्यिक भाषा, फिल्म, अभिनय और नृत्यशैली पर मंथन हुआ. मीट का समापन पद्मभूषण व भरतनाट्यम में ख्याति प्राप्त मल्लिका साराभाई और रेवांता साराभाई की नृत्य प्रस्तुति से हुआ

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रांची : टाटा स्टील झारखंड लिटरेरी मीट का समापन रविवार को हुआ. प्रभात खबर के सहयोग से आयोजित यह मीट का चौथा संस्करण था. अंतिम दिन भाषाई परिचर्चा से शुरुआत हुई. ‘स्मार्टफोन वाली हिंदी’ विषय पर सत्य व्यास, यतीश कुमार और आरजे अरविंद के साथ प्रतीति गनात्रा ने राष्ट्रभाषा पर चर्चा की.

इसके बाद एक-एक कर गीतकार व लेखकों ने महानायक उत्तम कुमार के शताब्दी वर्ष में फिल्म और अभिनय पर चर्चा की. दूसरे सत्र में कथा कहानी और काव्य रचना पर मंथन हुआ. मीट का समापन पद्मभूषण व भरतनाट्यम में ख्याति प्राप्त मल्लिका साराभाई और रेवांता साराभाई की नृत्य प्रस्तुति से हुआ. धन्यवाद ज्ञापन मालविका बनर्जी ने किया.

सिनेमा में किरदारों का सिर्फ ब्लैक और व्हाइट चरित्र चित्रण होता है

सिनेमा में नकारात्मक किरदारों के बदलते चेहरे पर मालविका बनर्जी ने लेखक बालाजी विट्ठल और अभिनेता मोहन अगाशे से बातचीत की. बालाजी विट्ठल ने अपनी नवीनतम पुस्तक प्योर एविल द बैड मैन ऑफ बॉलीवुड के बारे में बताते हुए हिंदी सिनेमा की शुरुआत से खलनायकों के बदले चरित्र चित्रण पर बातें की. वहीं मोहन अगाशे ने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि सिनेमा में किरदारों का संपूर्ण चित्रण नहीं किया जाता है.

किरदारों का केवल ब्लैक एंड व्हाइट चरित्र चित्रण किया जाता है. किरदारों को सिर्फ अच्छा और बुरा बताया जाता है. बातचीत का निष्कर्ष निकला कि हिंदी सिनेमा में खलनायकों को समाज या व्यक्ति की बुराइयों के प्रतीक के रूप में जगह दी जाती है. इसी कारण उनके चरित्र के किसी अन्य पहलू की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है.

लेकिन, यथार्थवादी सिनेमाओं में व्यक्ति विशेष न होकर सामाजिक बुराइयों को भी खलनायक के रूप में चित्रित किया जाता है. मोहन अगाशे ने स्वीकारा कि पिछले दो दशक में खलनायकों के चरित्र चित्रण का स्वरूप बदला है. यह चरित्र कई जगहाें पर आम लोगों को आकर्षित भी करता है, लेकिन उसे आदर्श मानना बिल्कुल सही नहीं होगा.

सत्यजीत रे के जमाने की फिल्मों की बात ही अलग

द सेंटेनरी में सत्यजीत रे की विरासत पर परिचर्चा के दौरान अभिनेता मोहन अगाशे ने कहा : सत्यजीत रे का समय और उनके जमाने की फिल्मों की बात ही अलग है. उनसे मिलने का अलग ही अनुभव था, जब मैं कोलकाता गया था. फिल्मों की जो समझ उनकी थी, वो लाजवाब थी. चीजों को समझने का जो उनका हुनर था, वो अपने आप में अनोखा था.

इस परिचर्चा में अरुणाव सिन्हा, बरुण चंद्रा और सुमन घोष भी शामिल हुए. मोहन अगाशे ने 1978 की चर्चा की, जब वे अपनी थियेटर टीम के साथ घासीराम नाटक का मंचन करने कोलकाता गये थे. उस दौरान सत्यजीत रे से मुलाकात की थी. उन्होंने कहा : मैं जल्दी किसी को अपना प्ले देखने के लिए नहीं कहता, लेकिन मैंने कोलकाता में सत्यजीत रे से कहा. उन्होंने प्ले देखा भी और सभी कास्ट से बात भी की. बरुण चंदा ने कहा कि सत्यजीत रे कैमरे के साथ खुद रहते थे और सभी कलाकारों को बांध कर रखते थे.

Posted By : Sameer Oraon

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