‘बदले गांव, बदले समाज’ के संकल्प के साथ प्रभात खबर ने झारखंड के चार गांवों को गोद लिया

By Prabhat Khabar Digital Desk
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रांचीः प्रभात खबर ने गांवों को सशक्त बनाने के लिए झारखंड के चार गांवों को गोद लिया है. प्रभात खबर ने इन गांवों के हालात को बदलने का संकल्प लिया है. महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की परिकल्पना को साकार करने का संकल्प लिया है. बापू ने कहा था कि गांव मजबूत और खुशहाल होंगे, तो राज्य और देश में खुशहाली आयेगी. पर विकास के तमाम मानकों पर इन गांवों की हकीकत अाज भी किसी फसाने से कम नहीं है. केंद्र और राज्य की सरकारें भी मानती हैं कि गांवों को स्मार्ट यानी समृद्ध बनाना है. शहरों की तरह गांवों तक विकास की गाड़ी पहुंचानी है. इसी शृंखला में प्रभात खबर ने सामाजिक दायित्व के तहत झारखंड और बिहार के चार-चार गांवों में बुनियादी जरूरतों को चरणबद्ध तरीके से पहुंचाने का संकल्प लिया है. हम मानते हैं कि गांवों की सूरत बदलेगी तो समाज भी बदलेगा. प्रभात खबर ने झारखंड के जिन चार गांवों को गोद लिया है, उसके बारे में पढ़ कर और जान कर आपको स्वतः अंदाजा हो जायेगा कि अाज भी हमारे गांव कितने पिछड़े हैं.

उजाले की राह देखता सीताडीह

अनगड़ा : बरवादाग पंचायत के तहत सीताडीह गांव समस्याओं के मकड़जाल में घिरा हुआ है. यह गांव रांची–पुरूलिया मुख्य मार्ग के किनारे है, लेकिन इसके टोले सुदुर जंगलों के बीच बसे हैं. आदिवासी बहुल इस गांव की सीमा करीब 12 किमी दूर तक फैली हुई है. बेलटोली, वनटोली, गंझुटोली, सरईवन, हाराहंगा इसी गांव के टोले हैं. करीब डेढ़ सौ घरों वाले इस गांव की आबादी करीब एक हजार है. रांची से इसकी दूरी 45 किलोमीटर है.

‘बदले गांव, बदले समाज’ के संकल्प के साथ प्रभात खबर ने झारखंड के चार गांवों को गोद लिया

ग्रामीण बताते हैं कि उनकी मुख्य समस्या बच्चों के स्कूल की है, सीताडीह गांव में एक उत्क्रमित मध्य विद्यालय है, लेकिन यह रांची–मुरी डाउन रेलवे लाइन के दूसरी ओर है. इससे बच्चों को स्कूल आने-जाने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. बच्चे रेलवे लाइन को पारकर स्कूल पहुंचते हैं. हाइस्कूल के लिए आठ किलोमीटर दूर जोन्हा जाना पड़ता है. गांव में एक भी स्वास्थ्य उपकेन्द्र नहीं है. प्राथमिक चिकित्सा के लिए बरवादाग या जोन्हा जाना पड़ता है. सिर्फ मुख्यटोला सीताडीह में बिजली है. उदय बेदिया का कहना है कि मुख्यटोला सीताडीह में बिजली है, लेकिन बिजली हफ्तों गायब रहती है. गांव में लगाये गये अधिकतर चापाकल खराब पड़े हैं.

गांव में रोजगार के लिए कोई व्यवस्था नहीं है. ग्रामीण खेती या मजदूरी कर अपना जीवन बसर करते हैं. गांव में एक भी सार्वजनिक शौचालय नहीं है. स्वच्छ भारत अभियान के तहत करीब 100 शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है. गांव की साक्षरता दर करीब 50 प्रतिशत है. महिला स्वयं सहायता समूहों के गठन के बाद महिला साक्षरता दर में भी वृद्धि हुई है. गांव में मैट्रिक करने वाले लड़के लड़कियों की संख्या 25 है. राजस्व गांव के अधिकतर घर कच्चे हैं. अभी प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कार्य हो रहा है. ग्राम प्रधान राजेश बेदिया ने बताया कि कई बार विभाग को खराब चापाकलों के मरम्मति के लिए कहा गया, लेकिन कभी पाइप नहीं होने तो कभी आदमी नहीं होने की बात कहकर टाल दिया जाता है. उन्होंने बताया कि बरवादाग पंचायत क्षेत्र में एक उच्च विद्यालय की अति आवश्यकता है. इसकी कमी के कारण बच्चे प्राथमिक शिक्षा से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं.

क्या कहते हैं गांव के लोग

दिवाकर बेदिया ने बताया कि गांव में सिंचाई के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है. ग्रामीण नाला को बांधकर थोड़ी बहुत सिंचाई कर लेते हैं. पूर्व वार्ड सदस्य बुधराम बेदिया ने बताया कि बेलटोली में पहुंच पथ एवं सिंचाई का अभाव है. वनटोली, गंझुटोली व सरइवन में बराबर ही जंगली हाथी पहुंचते रहते हैं.

जिला- रांची, प्रखंड - अनगड़ा, गांव - सीताडीह

कुल परिवार - 120

गांव की आबादी- 700

बिजली- 60 घरों में

साक्षरता दर- 50%

बहुलता - आदिवासी

स्वास्थ्य उपकेंद्र - नहीं

पहुंच पथ- उपलब्ध है

सिंचाई - परंपरागत

पेयजल - कुआं/चापाकल

स्कूल - उपलब्ध

शौचालय का निर्माणजारी

आंगनबाड़ी केंद्र चल रहे हैं


झिकटी गांव में न सड़क है, न बिजली-पानी

देवघर: सारवां प्रखंड का झिकटी गांव. जिला मुख्यालय से इसकी दूरी भले 17 किलोमीटर हो, पर विकास के हर मानक से इसका फासला बेहद लंबा है. सारवां प्रखंड मुख्यालय से 12 किमी तक उबड़-खाबड़ सड़क से गांव तक हम किसी तरह पहुंचे. अनुसूचित जाति बहुल इस इलाके के लोगों के तन पर ढंग का कपड़ा भी नहीं है. इन गरीबों को न इंदिरा आवास मिला है और ही राशन कार्ड. गांव के अधिकांश घर मिट्टी, फूस, बांस के बने हैं. देश व राज्य में सभी गांवों तक बिजली पहुंचाने की बात हो रही है. गांव के लोग शाम होते ही ढिबरी पर आश्रित हैं. ये लोग थोड़ी-बहुत खेती-बाड़ी करते हैं. झारखंड बने भी 17 साल होने को है, लेकिन आज भी इस गांव के लोग विकास की परिभाषा में शामिल नहीं हैं. प्रभात खबर की टीम को देख वहां जुटे ग्रामीण एक स्वर में बोलने लगे : हमलोग बिजली, पानी, सड़क, सिंचाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे हैं. इसी बीच एक 70 वर्षीय बुजुर्ग ने सवाल किया ...भैया हम वोट भी देते हैं , फिर भी सरकार हम पर मेहरबान क्यों नहीं होती? गांव तक पहुंचने को सड़क नहीं है. कच्ची सड़क पर िनर्माण सामग्री गिरी हुई है, पर सड़क का काम आठ सालों से बंद है. लोग गिट्टी वाली सड़क से गुजरने को मजबूर हैं.

क्या कहते हैं ग्रामीण

गांव के चंद्रकांत ठाकुर कहते हैं कि गांव में कहने को आठ सिंचाई कूप हैं, लेकिन इनमें से दो-तीन ही कारगर हैं. 40 साल पहले बने लिफ्ट इरिगेशन का अब कोई मायने नहीं है. वहीं, भोला तुरी ने कहा कि गांव के लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिल पातीं. उपस्वास्थ्य केंद्र इस गांव से एक किलोमीटर दूर है. झारो देवी हिंदी नहीं बोल पातीं, उन्होंने कहा, ‘एगारे बरछ उमेर छले, तखनी हमर बियाह होले छेले. तखनी ते झिकटी ठिके छले. ऐते आदमी ने छेले. आबें रोड बनावे के बदले पाथल बिछे देलके.’ यानी जब उनकी शादी हुई थी, तब स्थिति ठीक थी. इतने लोग नहीं थे. अब तो गांव में रोड बनाने के बदले पत्थर बिछा दिया जा रहा है.

‘बदले गांव, बदले समाज’ के संकल्प के साथ प्रभात खबर ने झारखंड के चार गांवों को गोद लिया

जिला-देवघर, प्रखंड-सारवां

कुल परिवार - 134

गांव की आबादी-1200

बिजली पहुंची नहीं है

साक्षरता दर-50%

बहुलता - ओबीसी

स्वास्थ्य केंद्र - नहीं

सड़क - पक्की नहीं है

सिंचाई - सुविधा नहीं

पेयजल - सुविधा नहीं है

स्कूल - एक मध्य विद्यालय

शौचालय- एक भी घर में नहीं

आंगनबाड़ी केंद्र- 01


पहाड़, जंगल व प्रकृति से सराबोर पर गोबरघुसी का जीवन है बेरंग

पटमदा: पहाड़, जंगल व प्राकृतिक सौंदर्य से भरे-पूरे गोबरघुसी गांव में बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं. पटमदा के इस नक्सलग्रस्त गांव में बिजली, सड़क, चिकित्सा, पेयजल व रोजगार भी लोगों को नसीब नहीं है. गोबरघुसी गांव अब अपने अतीत को भी याद नहीं करना चाहता. जमशेदपुर से इस गांव की दूरी 27 िकलोमीटर है.

गोबरघुसी गांव में छह टोले हैं-लड़ाडुंगरी, काशीडीह, कुमारडुंगरी, कुआरमा, रानीझरना व हरिजन टोला. इनमें कुल 557 परिवार रहते हैं. करीब साढ़े तीन हजार की आबादी आज भी खाल का पानी पीने को विवश हैं. गांव में 26 चापाकल गड़े हैं लेकिन पानी निकलता है सिर्फ आठ से. लड़ाइडुंगरी व रानीझरना सबर टोला के लोग खाल का पानी पीते हैं. गोबरघुसी के लोग रोजगार के लिए पूरी तरह जंगल पर निर्भर हैं. गांव की 85% आबादी कच्चे मकान में रहती है.

‘बदले गांव, बदले समाज’ के संकल्प के साथ प्रभात खबर ने झारखंड के चार गांवों को गोद लिया

बरसात में टापू बन जाता है गांवः सबसे खराब स्थिति गोबरघुसी गांव के रानीझरना सबर टोले की है. बरसात में रानी झरना में पानी भर जाने के बाद टोले में रहने वाले कुल 75 सबर परिवार गांव सहित पूरे प्रखंड से कट जाते हैं. गांव में 60 प्रतिशत आबादी को आज भी बिजली की सुविधा नहीं है. स्वच्छ भारत मिशन के तहत 120 परिवारों को शौचालय तो मिल गये, बाकी के परिवार आज भी खुले में शौच जाते हैं.

सिंचाई का साधन नहींः टोटको नदी की साफ-सफाई नहीं होने व स्रोत में मिट्टी आ जाने के कारण सालों भर पानी नहीं बहता. फरवरी तक ही उपलब्ध पानी से थोड़ी-बहुत साग-सब्जियों की खेती हो पाती है. बाकी पूरी खेती बरसात पर निर्भर है. इससे धान की फसल साल में एक बार हो पाती है.

स्वर्णिम इतिहास : कभी 85 मौजा की जमींदारी चलती थीः आजादी से पहले यह गांव जमींदार भरत सिंह भुइयां के कारण पहचाना जाता था. पटमदा से मानगो पारडीह तक गोबरघुसी जमींदार का क्षेत्र हुआ करता था. 85 मौजा के जमींदार गांव होने के कारण उस वक्त तमाम सुविधाएं थीं. ऐश-अो-आराम के तमाम इंतजामात थे. लोग कोसों दूर से टैक्स देने आते थे. जमींदार के घर के अवशेष गांव में मौजूद हैं. उनके वंशज भी गोबरघुसी में रहते हैं.

क्या कहते हैं जनप्रतिनिधि

मुखिया खगेंद्र नाथसिंह बताते हैं कि शिक्षक के अभाव में बच्चों को शिक्षा नहीं मिल पाती . यहां के लोग स्वच्छ पेयजल व सिंचाई की सुविधा से वंचित हैं. दूसरी तरफ, पूर्व मुखिया नील रतन पाल ने कहा किचिकित्सा सुविधा नहीं रहने के कारण हर वर्ष यहां सबर व आदिवासियों की बीमारी से मौत हो जाती है. ग्राम प्रधान बेलू सिंह कहते हैं किहाट में सुविधा कुछ नहीं है. सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, सिंचाई का अभाव है. आज भी लोग जंगल पर निर्भर हैं.

जिला- पूर्वी सिंहभूम, प्रखंड-पटमदा, गांव- गोबरघुसी

कुल परिवार- 557

गांव की आबादी- 3500

बिजली- 220 घरों में

शौचालय -120 घरों में

आंगनबाड़ी केंद्र- 02

साक्षरतादर- 30%

बहुलता - अादिवासी

स्वास्थ्य केंद्र - नहीं

सड़क - नहीं है

सिंचाई - परंपरागत

पेयजल - पारंपरिक स्रोत

स्कूल - हाई स्कूल अपग्रेडेड

गरीबी व बेबसी के बीच रेंगतीजिंदगी का नाम है त्रियोनाला

धनबाद: आजादी का जश्न कभी त्रियोनाला के आदिवासियों ने भी मनाया था़ पर 70 साल बाद भी गरीबी और बेबसी ही इस गांव के नसीब में होगा. कसमार प्रखंड मुख्यालय से करीब 32 किमी दूर हिसीम पहाड़ पर त्रियोनाला बसा है़ गांव में आदिवासियों की बहुलता है़ 180 परिवारों व लगभग एक हजार की आबादी में एससी (तुरी जाति) के 15 व ओबीसी (करमाली जाति) के छह परिवारों को छोड़कर बाकी सभी आदिवासी परिवार है़ं इनमें मांझी के अलावा लुप्त हो रही बेदिया जनजाति के लगभग दो दर्जन परिवार हैं.

‘बदले गांव, बदले समाज’ के संकल्प के साथ प्रभात खबर ने झारखंड के चार गांवों को गोद लिया

डांड़ी के पानी पर टिका जीवनः पीने के पानी के नाम पर वही सदियों पुराना डांड़ी व चुआं ग्रामीणों का सहारा है़ करीब एक किमी दुर्गम पहाड़ी रास्ता तय कर डांड़ी तक पहुंचना पड़ता है़ गांव में तीन चापाकल में दो खराब है़ स्कूलों में लगा चापाकल भी खराब है़ गांव में कुआं नहीं है़ यहां चिकित्सा सुविधा कुछ भी नहीं है़ ग्रामीण कहते हैं : छोटी-बड़ी बीमारी होने पर उन्हें खैराचातर जाना पड़ता है़

मलेरिया का प्रकोप सालों भरः मलेरिया का प्रकोप गांव में सालों भर रहता है़ हर साल इसकी चपेट में आकर कई लोगों की मौत हो जाती है़ पिछले साल आधा दर्जन से अधिक लोगों की मौत हुई थी़ सिंचाई के अभाव में खेती अच्छी तरह से नहीं हो पाती है़.

मजदूरी ही साधनः त्रियोनाला में ग्रामीणों को रोजगार का कोई साधन उपलब्ध नहीं है़ दिहाड़ी मजदूरी आय का मुख्य स्रोत है़ कुछ लोग जंगल से पत्ता-दतवन बेचकर जीवन गुजारते हैं.

प्रखंड मुख्यालय से कटा गांवः त्रियोनाला कसमार प्रखंड के बिल्कुल अंतिम छोर, रामगढ़ जिला की सीमा पर अवस्थित होने के कारण प्रखंड मुख्यालय से बिल्कुल कटा-कटा रहता है़ यातायात सुविधा नहीं होने के कारण ग्रामीणों को किसी प्रकार का काम कराने के लिए प्रखंड मुख्यालय जाने के लिए भी सोचना पड़ता है़ गांव के कुछ लोगों को छोड़ दिया जो तो अधिकतर लोगों ने प्रखंड मुख्यालय अभी तक देखा भी नहीं है़

क्या कहते हैं लोग

जगेश्वर मुर्मू कहते हैं, ‘कहां से शुरू करें. गांव में तो समस्याएं-ही-समस्याएं हैं. ऐसा लगता है कि इस गांव की फिक्र किसी को नहीं है.’ बिलासमनी देवी को तोकभी-कभी ऐसा लगता है कि सरकार इस गांव के लिए है ही नहीं. जनप्रतिनिधि भी उनकी सुविधाअों का ख्याल नहीं रखते. गांव की समस्याअों का जिक्र करते हुए फूलचंद्र मुर्मू ने कहा किगांव में समस्याओं का अंबार है. अब तक किसी की नजर हमारी समस्याओं पर नहीं पड़ी है.

जिला-बोकारो, प्रखंड- कसमार, गांव- त्रियोनाला

परिवार- 180

आबादी- 1000

बिजली-कनेक्शन है पर रहती नहीं

शौचालय - 40 घरों में

आंगनबाड़ी केंद्र- 01

साक्षरता दर -35%

बहुलता -एससी

स्वास्थ्य केंद्र - नहीं

सड़क - नहीं है

सिंचाई - पारंपरिक

पेयजल - पारंपरिक स्रोत

स्कूल - प्राथमिक व मध्य

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