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झारखंड में पहली बार 1918 में हजारीबाग से निकली थी रामनवमी शोभायात्रा, गुरु सहाय ठाकुर व मित्र जुलूस लेकर गए थे कर्जन ग्राउंड

Updated at : 17 Apr 2024 12:58 PM (IST)
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झारखंड में पहली बार 1918 में हजारीबाग से निकली थी रामनवमी शोभायात्रा, गुरु सहाय ठाकुर व मित्र जुलूस लेकर गए थे कर्जन ग्राउंड

गुरू सहाय ठाकुर का 1893 में कुम्हारटोली के एक सामान्य परिवार में जन्म हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा हजारीबाग नगरपालिका स्कूल और माध्यमिक स्तर की पढाई जिला स्कूल से हुई थी.

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सलाउद्दीन, हजारीबाग : झारखंड में रामनवमी जुलूस की शुरूआत 1918 में हजारीबाग से हुई थी. इसकी शुरूआत स्व गुरू सहाय ठाकुर ने अपने मित्र हीरालाल महाजन, टीभर गोप, कन्हाई गोप, जटाधर बाबू, यदुनाथ के साथ की थी. शहर के कुम्हारटोली से पहली बार जुलूस निकाला गया था. गोधुली बेला में बड़ा अखाडा से 40-50 फीट उंचे दर्जनों झंडों के साथ जुलूस निकाला गया था. बड़ा बाजार स्थित एक नंबर टाउन थाना के सामने कर्जन ग्राउंड से जुलूस मैदान में पहुंचा. यहां एक-दो घंटे लोगों ने लाठी खेला. फिर वापस झंडे अपने-अपने मुहल्ले में चले गये. यह सिलसिला कई वर्षों तक जारी रहा. वहीं 1933 में कुम्हारटोली में बसंती दुर्गा पूजा की शुरूआत हुई.

रामनवमी महासमिति 1956 में अस्तित्व में आयी

हजारीबाग शहर में बिजली के तार लगने के कारण रामनवमी के दिन निकलने वाले महावीरी झंडे की उंचाई में कमी की गयी थी. साल 1956 में महासमिति अस्तित्व में आई. 1962 तक सिर्फ नवमी में मुहल्ले के लोग झंडा लेकर जुलूस निकालते थे. वहीं मंगल जुलूस की शुरुआत 1963 में कुम्हारटोली मुहल्ला से हुई. हनुमान मंदिर में पहली बार लंगोट व लड्डू चढाकर पूजा शुरू की गई. आपको बता दें कि सिर्फ नवमी के दिन जुलूस निकाला जाता था. साल 1970 के बाद जुलूस निकालने की प्रक्रिया में बदलाव आ गया. मुहल्लों में झंडा लेकर लोग दिन में बडा अखाडा में जमा होने लगे. वहां से कर्जन ग्राउंड जाकर अस्त्र-शस्त्र और लाठी से करतब दिखाते थे. जुलूस में ढोल नगाडा, शहनाई, शंख, बांसुरी, झाल, मंजीरा, परंपरागत वाद्य यंत्र रहते थे. पूरे परिवार के साथ लोग रामनवमी मेला जुलूस में शामिल होते थे. बाद में जुलूस के बढते स्वरूप को देखते हुए चैत्र रामनवमी महासमिति का गठन हुआ.

पहली बार कोलकाता से ताशा पार्टी आया

1970 में पहली बार बाडम बाजार ग्वालटोली रामनवमी समिति ने कोलकाता से ताशा पार्टी मंगायी थी. जुलूस में प्रतिमाएं और प्रकाश की भी व्यवस्था की गयी.

जुलूस में झांकी की शुरुआत

1980 के आसपास जुलूस में झंडों के साथ झांकी भी शामिल की गयी. 1985 में कोर्रा पूजा समिति, मल्लाहटोली पूजा समिति ने पहली बार जीवंत झांकी प्रस्तुत की. 1990 के आसपास रामनवमी जुलूस में बडे स्तर पर आकर्षक झांकियां शामिल होने लगी.

रामचरित मानस के ज्ञाता थे गुरू सहाय

गुरू सहाय ठाकुर का 1893 में कुम्हारटोली के एक सामान्य परिवार में जन्म हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा हजारीबाग नगरपालिका स्कूल और माध्यमिक स्तर की पढाई जिला स्कूल से हुई थी. वे रामचरित मानस के अच्छे ज्ञाता भी थे. वे नगरपालिका के तहसीलदार के पद पर कार्य करते थे. उन्होंने हिंदू समाज में नवजागृति लाने की पहल की. वह समाज में व्याप्त कुरीतियों को मिटाना चाहते थे.

कोरोना काल के दौरान जुलूस नहीं निकला

कोराेना काल में जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा तब दो साल जुलूस नहीं निकाला गया. मंदिरों और अखाडों में ही पूजा अर्चना हुई. वर्तमान में शहर में दशमी और एकादशी तक रामनवमी का जुलूस निकलता है. अखाडों की संख्या लगभग 100 के करीब पहुंच गयी है. सभी मुहल्लों, क्लब और अखाडों का जुलूस दशमी को अपने अखाडों से निकल कर देर रात तक शहर के मेन रोड तक पहुंचता है. एकादशी को दिनभर शहर के सभी मार्गों में सैंकडों जुलूस पार करते हैं. देर शाम तक जुलूस का समापन होता है. धार्मिक, सामाजिक संदेशवाले एक से बढकर एक झांकी, जीवंत झांकी की प्रस्तुति होती है. पुलिस-प्रशासन द्वारा डीजे बजाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. दरअसल डीजे बजाने से बढ़ते विवाद को देखते हुए चलंत डीजे पर रोक लगाया गया. जुलूस में डीजे की जगह पिछले दो वर्षों से महाराष्ट्र, कोलकाता और अन्य राज्यों से ढोल, ताशा और बैंजो वाद्ययंत्र जुलूस में शामिल हो रहे हैं.

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Kunal Kishore

लेखक के बारे में

By Kunal Kishore

कुणाल ने IIMC , नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा की डिग्री ली है. फिलहाल, वह प्रभात खबर में झारखंड डेस्क पर कार्यरत हैं, जहां वे बतौर कॉपी राइटर अपने पत्रकारीय कौशल को धार दे रहे हैं. उनकी रुचि विदेश मामलों, अंतरराष्ट्रीय संबंध, खेल और राष्ट्रीय राजनीति में है. कुणाल को घूमने-फिरने के साथ पढ़ना-लिखना काफी पसंद है.

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