पांडेयडीह में 51.75 एकड़ वन भूमि की अवैध जमाबंदी का खुलासा

Updated at : 10 Jul 2018 4:37 AM (IST)
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पांडेयडीह में 51.75 एकड़ वन भूमि की अवैध जमाबंदी का खुलासा

गिरिडीह : गिरिडीह सदर अंचल के पांडेयडीह मौजा में स्थित 51.75 एकड़ वन भूमि की अवैध जमाबंदी किये जाने का खुलासा हुआ है. स्थानीय ग्रामीणों के आवेदन पर गिरिडीह की एसडीओ विजया जाधव ने मामले की जांच-पड़ताल के बाद यह खुलासा किया. इस मामले में तत्कालीन डीसी, एसी, एलआरडीसी, अवर निबंधक और सीओ की मिलीभगत […]

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गिरिडीह : गिरिडीह सदर अंचल के पांडेयडीह मौजा में स्थित 51.75 एकड़ वन भूमि की अवैध जमाबंदी किये जाने का खुलासा हुआ है. स्थानीय ग्रामीणों के आवेदन पर गिरिडीह की एसडीओ विजया जाधव ने मामले की जांच-पड़ताल के बाद यह खुलासा किया. इस मामले में तत्कालीन डीसी, एसी, एलआरडीसी, अवर निबंधक और सीओ की मिलीभगत से जमाबंदी किये जाने का मामला उजागर हुआ है. अपर समाहर्ता को भेजे गये अनुशंसा पत्र में एसडीओ एसडीओ ने स्पष्ट किया है कि पांडेयडीह मौजा के मैगजीनिया गांव स्थित खाता संख्या 15 एवं 19 के प्लॉट संख्या 405, 424 एवं 425 में कुल रकवा 51.75 एकड़ जमीन वन भूमि है, जिसकी अवैध तरीके से जमाबंदी कायम कर दी गयी है.
बता दें कि वर्ष 2013 में तत्कालीन उपायुक्त मुकेश कुमार वर्मा ने ललन प्रसाद, विकास आनंद एवं अमित रंजन के आवेदन पर एक जांच कमेटी गठित की थी. आवेदकों ने प्लॉट संख्या 405, 424 और 425 में कुल 83.68 एकड़ भूमि पर अपना दावा पेश कर जमाबंदी कायम करने का अनुरोध किया था. तत्कालीन उपायुक्त के निर्देश पर जांच कमेटी में तत्कालीन अपर समाहर्ता एस किरो, तत्कालीन भूमि सुधार उप समाहर्ता पवन कुमार मंडल, तत्कालीन अवर निबंधक अजय कुमार हेंब्रम और तत्कालीन अंचलाधिकारी अनवर हुसैन को रखा गया. कमेटी ने जांच के क्रम में संबंधित लोगों से भूमि पर हक होने एवं दखल संबंधित कागजात की मांग की.
समिति के समक्ष पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर ललन प्रसाद, विकास आनंद व अमित रंजन के द्वारा बंदोबस्ती, कबूलियत, इस्तीफा, निबंधित पट्टा आदि से संबंधित कागजात की छाया प्रति समर्पित की गयी. बताया जाता है कि जमीन मालकिन के वारिशान निलिमा मधुकर गुप्ता ने ललन प्रसाद, विकास आनंद एवं अमित रंजन को खाता नंबर 405, 424 और 425 जिसका कुल रकवा 83.68 एकड़ है, का पावर ऑफ अटॉर्नी दिया था.
कागजात के अध्ययन के बाद कमेटी ने स्पष्ट किया कि निलिमा मधुकर गुप्ता का दावा सही प्रतीत होता है और इसके अतिरिक्त 42 रैयतों का उक्त भूखंड के आंशिक भाग पर कब्जा व मकान है, ऐसे में उन्हें बेदखल करने से विधि-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होने की बात कही गयी और अवशेष भूमि लगभग 51.75 एकड़ की जमाबंदी निलिमा मधुकर गुप्ता के पक्ष में कायम करने की अनुशंसा कमेटी ने कर दी.
इस जांच कमेटी की अनुशंसा के आलोक में तत्कालीन उपायुक्त मुकेश कुमार वर्मा ने राजस्व हित का सहारा लेते हुए प्लॉट नंबर 405, 424 और 425 कुल रकवा 51.75 एकड़ भूमि की जमाबंदी कायम करने का आदेश भी जारी कर दिया. इतना ही नहीं, तत्कालीन उपायुक्त वर्मा ने उक्त जमीन निलिमा मधुकर गुप्ता (पति स्व. राहुल बसु) के नाम से जमाबंदी कायम करते हुए लगान जमींदारी उन्मूलन की तिथि 1953-54 से वसूलने की स्वीकृति भी दे दी दी.
कई प्रावधानों की अनदेखी : मामले में कई बिंदुओं की अनदेखी करते हुए उक्त अधिकारियों ने जमाबंदी कायम करने का आदेश तो दिया ही, बिना प्रावधान के ही 1953-54 से लगान रसीद निर्गत करने की भी स्वीकृति दे दी. जब इस बात की जानकारी स्थानीय ग्रामीणों को मिली तो ग्रामीण प्रदीप कुमार पासवान समेत कई लोगों ने एसडीओ विजया जाधव को अवैध जमाबंदी कायम किये जाने की जानकारी देते हुए जांच कर जमाबंदी रद्द करने की मांग की.
एसडीओ ने मामले की गहन जांच-पड़ताल के बाद यह खुलासा किया कि पांडेयडीह मौजा का प्लॉट संख्या 405, 424 और 425 का कुल रकवा 51.75 एकड़ जमीन न सिर्फ सर्वे खतियान में जंगल दर्ज है, बल्कि जंगल विभाग ने इस भूमि को अधिसूचित भी किया है. उन्होंने अपर समाहर्ता को भेजे गये पत्र के पत्रांक 221 में यह भी स्पष्ट किया है कि अधिसूचित वन भूमि के साथ-साथ प्रश्नगत भूमि का एक साथ लगान निर्धारण किया जाना बिहार भूमि सुधार अधिनियम 1950 की धारा 5, 6, 7 का उल्लंघन है.
साथ ही राज्य सरकार द्वारा वर्ष 1967 में निर्गत किये गये एक आदेश का हवाला देते हुए एसडीओ ने कहा है कि जमाबंदी सृजन किये जाने का अधिकार सिर्फ अनुमंडल पदाधिकारी को ही है, लेकिन गठित जांच कमेटी में अनुमंडल पदाधिकारी को नहीं रखा जाना असंवैधानिक है. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि तत्कालीन उपायुक्त गिरिडीह के द्वारा गोपनीय शाखा के संचिका में प्रश्नगत भूमि की जमाबंदी का सृजन किया गया है जो उनके क्षेत्र अधिकार से बाहर है.
पूर्व एसी समेत कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा
जांच के बाद जब अवैध जमाबंदी किये जाने का खुलासा हुआ तो इस मामले में एसडीओ विजया जाधव ने अवैध जमाबंदी रद्द किये जाने की अनुशंसा की है. इस गोरखधंधे में शामिल अधिकारियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की सुसंगत धाराओं के तहत कार्रवाई करने की भी अनुशंसा की है. एसडीओ ने अपनी जांच रिपोर्ट में जमाबंदी कायम करने के लिए अधिकारियों द्वारा उठाये गये कई अवैध कार्यों का भी जिक्र किया है.
कहा है कि कई मामले में क्षेत्र अधिकार का हनन तो किया ही गया, जबकि इस पूरे मामले में अधिकारियों ने अमानत में खयानत का काम किया है. एसडीओ जाधव ने तत्कालीन अपर समाहर्ता एस किरो, तत्कालीन भूमि सुधार उप समाहर्ता पवन कुमार मंडल, तत्कालीन अवर निबंधक अजय कुमार हेंब्रम, तत्कालीन अंचलाधिकारी अनवर हुसैन के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने एवं भारतीय दंड संहिता की धारा 405 के तहत कार्रवाई करने की अनुशंसा की है.
वन भूमि पर हो रहा है कब्जा का प्रयास : एसडीओ
एसडीओ विजया जाधव ने बताया कि पांडेयडीह में कुछ भू माफिया सक्रिय हैं. ये पैसे और पहुंच के बल पर सरकार की जमीन पर कब्जा जमाने के प्रयास में हैं. ऐसा किसी भी स्थिति में होने नहीं दिया जायेगा. उन्होंने कहा कि विकास आनंद, ललन प्रसाद और अमित रंजन नामक व्यक्ति पांडेयडीह मौजा में वन भूमि की जमीन पर कब्जा जमाने के प्रयास में है और उन्हें कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से अवैध तरीके से जमाबंदी कायम कराने में सफलता भी मिल गयी है.
एसडीओ ने कहा कि यह काफी आश्चर्य की बात है कि संदिग्ध भूमि सर्वे खतियान में किस्म जंगल दर्ज है. इसके बाद भी जांच कमेटी ने वन विभाग से इस मामले में प्रतिवेदन लेना और सत्यापन कराना उचित नहीं समझा. उन्होंने कहा कि पांडेयडीह की उक्त जमीन पर वन विभाग ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वह वन भूमि है और वन विभाग से अधिसूचित भी है. एसडीओ ने कहा कि पूरे मामले से गिरिडीह के डीसी मनोज कुमार को भी अवगत करा दिया गया है. डीसी ने इस मामले को गंभीरता से लिया है. इस संबंध में डीसी ने वन विभाग के अधिकारियों को भी अग्रेतर कार्रवाई करने का निर्देश दिया है.
जमीन की जमाबंदी वैध है : चौरसिया
इधर उक्त जमीन पर दावा कर रहे विकास आनंद उर्फ विकास चौरसिया ने कहा कि उनके जमीन की जमाबंदी वैध है. तत्कालीन डीसी द्वारा गठित जांच कमेटी के अनुशंसा पर ही उनके जमीन की जमाबंदी कायम की गयी और लगान रसीद भी निर्गत किया गया है. उन्होंने कहा कि उक्त जमीन की मालकिन ज्योत्सना बसु है और उनके वारिशान से उन्हें पावर ऑफ अटॉर्नी हासिल हुआ है. मामले को बेवजह तूल देने की कोशिश की जा रही है.
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