शाम ढलते ही शुरू हो जाता है पीने-पीलाने का दौर

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शाम ढलते ही शुरू हो जाता है पीने-पीलाने का दौरप्रशासन की आंखाें में धूल झोंक फल-फूल रहा शराब का अवैध कारोबार प्रतिनिध, बसंतपुरचुनाव में शराब व पैसे का खेल आम बात है. वोटरों को लुभाने के लिए प्रलोभन के तौर पर शराब का चुनाव में राजनीतिक पाटिर्यों द्वारा खूब इस्तेमाल किया जाता है. चुनाव में […]

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शाम ढलते ही शुरू हो जाता है पीने-पीलाने का दौरप्रशासन की आंखाें में धूल झोंक फल-फूल रहा शराब का अवैध कारोबार प्रतिनिध, बसंतपुरचुनाव में शराब व पैसे का खेल आम बात है. वोटरों को लुभाने के लिए प्रलोभन के तौर पर शराब का चुनाव में राजनीतिक पाटिर्यों द्वारा खूब इस्तेमाल किया जाता है. चुनाव में शराब के अवैध कारोबारी पर शिकंजा कसने के लिए कई कारोबारियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है. बावजूद इसके शराब के अवैध कारोबारियों पर नकेल कसने में पुलिस असफल ही रही है. इसके कारण शाम ढलते ही गांव से लेकर शहर तक ठेला पर चल रहीं फास्ट फूड की दुकान हों या चाय या नाश्ते की दुकान, वहां शराब बेचना, खरीदना, पीना व पीलाना आम बात हो गयी है. इस तरह की दुकानों पर जारी शराब के अवैध कारोबार फलने-फूलने के पीछे कहीं ना कहीं पुलिस की संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता है. इस परिस्थिति के लिए उत्पाद विभाग भी कम जिम्मेवार नहीं है. यह धंधा धड़ल्ले से चल रहा है. जिस पर प्रशासन की अब तक नजर नहीं पड़ी है.आमदनी का सबसे बड़ा जरिया है शराब शराब से सरकार को करोड़ों की आमदनी होती है. इसलिए प्रत्येक वर्ष उत्पाद विभाग द्वारा शराब की बंदोबस्ती की जाती है. इसके लिए लॉटरी की प्रक्रिया अपनायी जाती है. यही वजह है कि सुपौल जिले में कुल 181 पंचायतें हैं, जिनमें सरकारी 105 स्वीकृत दुकानें हैं. विभागीय आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2014-15 में फरवरी तक उत्पाद विभाग को 03 लाख 31 हजार 05 सौ 05 रुपये राजस्व की वसुली हुई है और सरकार के करोड़ों के आमदनी वाला विभाग पर सरकारी शिकंजा के बावजूद अवैध शराब कारोबारी खूब चांदी काट रहे हैं. प्रशासन द्वारा निष्पक्ष चुनाव कराने का क्षेत्र में खोखला साबित हो रहा है.रोकने में विफल साबित हो रहा प्रशासन निष्पक्ष व शांतिपूर्ण चुनाव कराने को लेकर प्रशासन द्वारा जगह-जगह बैरियर लगा कर वाहन चेकिंग अभियान चलाया जा रहा है. असामाजिक तत्वों और अवैध शराब के कारोबारियों पर शिकंजा कसने के लिए गहन गश्ती भी चलाई जा रही है. बावजूद स्थानीय पुलिस व उत्पाद विभाग की मिलीभगत से अवैध शराब का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है. और जगह-जगह लगाये गये पुलिस बैरियर नाममात्र के हैं, जहां एक भी पुलिस बल की मौजूदगी नहीं होती है. इससे अवैध शराब के कारोबारी खुले आम शराब को एक जगह से दूसरे जगह ले जाने में सफल हो जाते हैं. प्रशासन द्वारा निष्पक्ष चुनाव कराने का दावा शराब के अवैध कारोबारी के सक्रिय होने से और बैरियर पर पुलिस बल की गैर मौजूदगी से खोखला साबित होता प्रतीत हो रहा है.कहते हैं आम लोगदलित सेना के कार्यकर्ता विशुनदेव पसवान, गंगा पासवान व अन्य बतातें हैं कि चुनाव के समय शराब का सबसे ज्यादा इस्तेमाल दलित और महादलित बस्तियों में होता है. इसे देखने वाला कोई नहीं है. ललित नारायण मिश्रा अनुमंडल अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ वीरेंद्र प्रसाद कहते हैं, शराब के सेवन से कई तरह की जानलेवा बीमारियां होती हैं. शराब के आदी लोगों का आर्थिक, मानसिक व शारीरिक विकास भी अवरुद्ध होता है. बहरहाल चुनाव में पैसे के साथ शराब का खेल पुरानी बात है. बावजूद प्रशासन द्वार कार्रवाई के नाम पर एक दो फुटपाथी दुकानदारों को पकड़ कर खानापूर्ति कर ली जाती है, लेकिन चुनाव के समय में अवैध शराब के असली धंधेबाजों पर प्रशासन की नजर नहीं पड़ती है. इस पर शिकंजा कसे बिना निष्पक्ष चुनाव कराने का दाव करना बेमानी सा प्रतीत होता है.

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