सबको साथ लेकर चलने की सीख देती हैं छठी मैया
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :14 Nov 2015 4:02 AM (IST)
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रोसड़ा : रामायण एवं महाभारत काल से ही महापर्व के रूप में मनाया जाने वाला छठ पर्व का आज भी उतना ही महत्वपूर्ण. प्राचीन ग्रंथों का निकटता से अवलोकन करने वालों का कहना है कि अर्थवेद में इस पर्व के जिक्र से इसकी महानता व प्राचीनता का पता चलता है. हिंदुओं का एक मात्र पर्व […]
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रोसड़ा : रामायण एवं महाभारत काल से ही महापर्व के रूप में मनाया जाने वाला छठ पर्व का आज भी उतना ही महत्वपूर्ण. प्राचीन ग्रंथों का निकटता से अवलोकन करने वालों का कहना है कि अर्थवेद में इस पर्व के जिक्र से इसकी महानता व प्राचीनता का पता चलता है. हिंदुओं का एक मात्र पर्व छठ ही ऐसा है जिसमें सूर्य को देवता मानकर प्रत्यक्ष रूप से लोग पूजा करते हैं. जिसका वर्णन पुराणों में भी मिलता है.
इस महापर्व में लोग उदीयमान सूर्य के साथ-साथ अस्ताचलगामी सूर्य को भी अर्घ्य देते हैं. जिससे यह संदेश मिलता है कि जीवन में सिर्फ उन्हें ही सम्मान नहीं देना चाहिए जो उच्च शिखर पर पहुंच गये हों, बल्कि समय आने पर उनका भी साथ देना चाहिए जो पीछे छूट गये हैं,
या जिनका महत्व कम व समाज के अंतिम पायदान पर है. जिसकी ओर मुड़कर देखने वाला कोई नहीं है. इस तरह यह पर्व हमारे संस्कृति का संवाहक माना जाता है. कहा जाता है कि रामायण काल में मुंगेर के सीता चरण में छह दिनों तक रहकर माता सीता ने छठ की पूजा की थी. पौराणिक कथा के अनुसार भगवान राम जब 14 वर्ष के बाद अयोध्या लौटे थे तो ऋ षि-मुनियों के आदेश पर भगवान राम ने रावण वध के पाप से मुक्ति के लिए राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया.
इसके लिये राम व सीता ने मुग्दल ऋ षि के आश्रम में जाकर पूजा के बारे में जानकारी ली. कहा जाता है कि उस समय मुग्दल ऋ षि ने माता सीता को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करते हुए कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष शष्टी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया. फिर माता सीता ने ऋ षि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी. महाभारत काल में भी माता कुंती द्वारा सूर्य अराधना करने एवं पुत्र कर्ण के जन्म लेने के बाद छठ पर्व मनाये जाने का इतिहास मिलता है.
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