दो कमरे के स्कूल में नामांकित हैं 335 बच्चे

Published at :02 Dec 2015 6:44 PM (IST)
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दो कमरे के स्कूल में नामांकित हैं 335 बच्चे

दो कमरे के स्कूल में नामांकित हैं 335 बच्चे सालों भर बाहर मैदान में बैठ पढ़ने की है विवशतानहीं है शौचालय, चापाकल गड़ा है कमरे में, बोरा युग में चल रहा है स्कूलबरसात में पठन-पाठन अक्सर रहता है बंद हाल मध्य विद्यालय, डुमरैल काविनय कुमार मिश्र/सहरसा शहरदलित, महादलित व अल्पसंख्यक वर्ग के तकरीबन 335 बच्चे […]

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दो कमरे के स्कूल में नामांकित हैं 335 बच्चे सालों भर बाहर मैदान में बैठ पढ़ने की है विवशतानहीं है शौचालय, चापाकल गड़ा है कमरे में, बोरा युग में चल रहा है स्कूलबरसात में पठन-पाठन अक्सर रहता है बंद हाल मध्य विद्यालय, डुमरैल काविनय कुमार मिश्र/सहरसा शहरदलित, महादलित व अल्पसंख्यक वर्ग के तकरीबन 335 बच्चे नामांकित हैं. उन्हें पढ़ाने के लिए चार शिक्षिकाएं भी पदस्थापित हैं. लेकिन कमरों का पूरा अभाव है. दो कमरों के इस विद्यालय भवन के एक कमरे में चापाकल गड़ा है तो दूसरे में एमडीएम का अनाज व कुछ कुरसियां रखी है. लिहाजा बच्चों की कक्षाएं बाहर मैदान में यत्र-तत्र चलती है. यह हाल है नगर परिषद क्षेत्र के वार्ड नंबर 33 व 34 के बीच स्थित मध्य विद्यालय डुमरैल का. जहां शिक्षा व्यवस्था के नाम पर सिर्फ मजाक ही नजर आता है. बरसात के दिनों में स्कूल में पठन-पाठन लगभग बंद ही रहता है तो साल के बाकी महीनों में चिलचिलाती धूप हो या कड़ाके की ठंड बाहर ही बैठना होता है. 20 वर्ष पूर्व हुई थी स्थापनातकरीबन 20 वर्ष पूर्व राज्य के तत्कालीन वित्त मंत्री शंकर प्रसाद टेकरीवाल ने इस सरकारी मध्य विद्यालय का उद्घाटन किया था. उसी समय बने दो कमरों के अलावे इस स्कूल को आज तक अन्य कोई सुविधा नहीं मिल पायी. संप्रति इस विद्यालय में दलित, महादलित व अल्पसंख्यक समुदाय के 335 बच्चे नमांकित हैं व 80 फीसदी की दैनिक उपस्थिति भी बनती है. पहली से पांचवीं कक्षा तक के इस मध्य विद्यालय में चार शिक्षिकाएं पदस्थापित हैं. अध्यापन के लिए वे भी नियमित रूप से आती ही हैं. कमरों के अभाव में बच्चों को बाहर खुले आसमान के नीचे या पेड़ के नीचे बैठा पढ़ाया जाता है. शिक्षकों ने बताया कि किसी भी परिस्थिति में इतने सारे बच्चों के एक या दो कमरों व बरामदे पर नहीं बिठाया जा सकता है. लिहाजा बाहर बैठाने की मजबूरी है. शिक्षिकाओं ने यह भी बताया कि यहां बच्चों के बैठने के लिए बेंच-डेस्क भी नहीं है. लिहाजा यह स्कूल अभी भी बोरा युग में ही चल रहा है. शौचालय नहीं, कमरे में है चापाकलइस मध्य विद्यालय में शौचालय नहीं है. जिसका खामियाजा स्कूली बच्चों के साथ-साथ शिक्षिकाओं को भी उठाना पड़ता है. नौबत आने पर उन्हें उसी चापाकल वाले कमरे का उपयोग प्रसाधन के रूप में करना होता है या फिर पड़ोसियों के आंगन का रुख करना होता है. शिक्षिकाओं ने बताया कि पहले चापाकल बाहर ही लगा हुआ था. कई बार हेड की चोरी हो जाने के बाद उसे एक कमरे में गड़वाया गया. ताकि पानी पीने की समस्या न बने. उसी कमरे में एमडीएम की रसोई भी चलती है और जलावन भी रखे जाते हैं. प्रधानाध्यापिका वीणा कुमारी ने बताया कि भवन की कमी के कारण हो रही असुविधा की जानकारी विभागीय अधिकारियों को दी गई है. जहां से जमीन संबंधित कागजातों की जांच के बाद भवन निर्माण के लिए राशि आवंटित कराने का आश्वासन दिया गया है. फोटो- स्कूल 1- मैदान में ही बैठ पठन-पाठन की है मजबूरी

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