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बिहार : परिवार की गाड़ी पटरी पर चले, इसलिए महिलाओं ने थामा ऑटो का हैंडल

Updated at : 08 Mar 2018 7:41 AM (IST)
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बिहार : परिवार की गाड़ी पटरी पर चले, इसलिए महिलाओं ने थामा ऑटो का हैंडल

शहर में ऑटो चलानेवाली महिलाओं की कहानी पटना : पटना में गाड़ी चलाने का काम तो वैसे ही कठिन है. लेकिन परिवार की गाड़ी पटरी पर चलती रहे, महिलाओं ने ऑटो का हैंडल थाम लिया है. ये कहानी उन दस महिला ऑटो चालकों की है, जो राजधानी में ऑटो चलाने का काम करती है. शहर […]

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शहर में ऑटो चलानेवाली महिलाओं की कहानी
पटना : पटना में गाड़ी चलाने का काम तो वैसे ही कठिन है. लेकिन परिवार की गाड़ी पटरी पर चलती रहे, महिलाओं ने ऑटो का हैंडल थाम लिया है. ये कहानी उन दस महिला ऑटो चालकों की है, जो राजधानी में ऑटो चलाने का काम करती है. शहर में कुल दस महिलाएं ऑटो चलाने का काम करती है. इनमें से पांच पटना जंक्शन से और पांच एयर पोर्ट स्टैंड से यात्रियों को छोड़ती हैं.
पांच ने मिल कर शुरू किया था काम
अॉटो चलानेवाली गुड़िया सिन्हा बताती हैं कि मैं बीते कई काम से काम की तलाश में थी. घर को चलाने के लिए पैसे की जरूरत थी. पति मनोज कुमार प्रोपर्टी डिलिंग का काम करते है, मगरआमदनी का अभाव था.
तभी मैंने अखबार में फ्री ऑटो प्रशिक्षण का विज्ञापन पढ़ा, जो सीटू की ओर से दिया जा रहा था. पति को जानकारी देकर मैंने प्रशिक्षण का काम शुरू किया. 15 दिनों के प्रशिक्षण के बाद मैंने गाड़ी चलाना शुरू कर दिया था. इसके बाद वर्ष 2013 के अगस्त माह में रेलवे जंक्शन से हम पांच महिलाओं ने ऑटो चलाने का काम शुरू किया, लेकिन तीन माह बाद में पुरुष ऑटोचालकों के मनमानी के कारण जंक्शन छोड़ना पड़ा, फिर मैं एयरपोर्ट पर आ गयी और प्रीपेड ऑटो चलाने का काम करने लगी.
प्रतिदिन पांच से छह सौ होती है कमाई
वहीं एयरपोर्ट से ऑटो चलाने वाली अनीता देवी बताती हैं कि पति बीते कई वर्षों से कुछ नहीं करते. तीन बच्चे हैं एक चार व दूसरा कक्षा पांच में बढ़ता है. तीसरा बच्चा अभी छोटा है. हम लोग प्रतिदिन पांच से छह सौ रुपये की कमाई कर लेते हैं.
इसलिए मेहनत करना सार्थक हो जाता है. अपने ऑटो चलाने की कमाई से ही घर परिवार चला लेती हूं. हम लोग रोज सुबह दस बजे से लेकर शाम छह बजे तक ऑटो चलाने का काम करती है. हालांकि यहां का सिस्टम ठीक नहीं है, इसलिए यात्रियों को चढ़ाने से लेकर सड़क पर ऑटो चलाने में पुरुषों से अधिक परेशानी होती है. फिर भी धंधा है तो करना ही पड़ेगा.
परिवार का मिला था साथ
वहीं ऑटोचालक सरिता पांडेय बताती हैं कि जब मैंने ऑटो चलाने का फैसला लिया था तो आस पड़ोस के लोगों ने गलत मतलब निकालना शुरू कर दिया था, लेकिन परिवारवालों ने सपोर्ट किया. शुरू में खुद को भी अटपटा लगा था, लेकिन धीरे-धीरे ऑटो चलाने की आदत हो गयी.
अब हम लोग अपने काम को ही इंज्वाॅय करते हैं. हालांकि यहां का सिस्टम ठीक नहीं है, पुरुष् ऑटोचालकों से परेशानी का सामना करना पड़ता है. फिर भी हम लोग ये काम करते हैं. वहीं, शाम को घर जाने के बाद खाना पकाना और अन्य घरेलू काम भी किया जाता है. इसके अलावा शोभा कुमारी, रिंकी देवी, सुलेखा देवी और सुष्मिता कुमारी सभी की कमोबेश यही कहानी है.
कभी यात्री तो कभी सहकर्मियों से परेशानी
पटना जंक्शन से आॅटो चलानेवाली संगीता देवी बताती हैं कि ऑटो चलाने में कुछ परेशानियां ऐसी होती हैं कि जिसको साझा नहीं किया जा सकता है.
हम लोग अनुभव करते है और कभी जब सर से पानी ऊपर जाता है तब उनका विरोध करना पड़ता है. कई बार तो यात्री हम लोगों से गलत समझ बैठते हैं. इसलिए उनको समझाना पड़ता है. कई बार ऐसी स्थिति आ जाती है तो पुलिस तक मामला ले जाना पड़ता है. इन सब परिस्थितियों के बाद भी हमलोग अपने काम को इंज्वॉय करते हैं. शाम में अपना समय परिवार के संग बिताते हैं. काफी सुकून मिलता है.
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