शराब नहीं, सामाजिक बुराई पर पाबंदी

बिहारशरीफ : गांव-गांव व शहर के हर मोहल्ले में खुली शराब की दुकानों से सामाजिक सदभाव दिन प्रतिदिन बिगड़ता जा रहा है. काम कर परिवार का भरन पोषण करने के बजाय लोग शराब के नशे में चूर रहते हैं. जो लोग कमाते भी है तो अपनी कमाई का दो-तिहाई हिस्सा शराब पर खर्च कर देते […]
बिहारशरीफ : गांव-गांव व शहर के हर मोहल्ले में खुली शराब की दुकानों से सामाजिक सदभाव दिन प्रतिदिन बिगड़ता जा रहा है. काम कर परिवार का भरन पोषण करने के बजाय लोग शराब के नशे में चूर रहते हैं. जो लोग कमाते भी है तो अपनी कमाई का दो-तिहाई हिस्सा शराब पर खर्च कर देते हैं.
स्कूल जाने वाले बच्चे भी पढ़ाई लिखाई छोड़ शराब के शौकीन होते जा रहे हैं. सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं को झेलनी पड़ रही हैं. छींटाकशी, छेड़खानी, दुराचार, अपहरण और यहां तक की घर भी महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं रह गया है. शराब अब पूरी तरह सामाजिक बुराई का रूप से चुका है.
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