भूमि के अभाव में प्रखंड कार्यालय का नहीं बना भवन

उदाकिशुनगंज : अनुमंडल के बिहारीगंज प्रखंड कार्यालय के लिए जमीन के अभाव में 21 वर्ष बाद भी निजी भवन नहीं मिलने से कोसी परियोजना के भवन में दफ्तर चलाया जाना प्रशासन की मजबूरी बन गयी है. इसके लिए शासन व प्रशासन ही जिम्मेदार नहीं बल्कि क्षेत्री नेता भी जिम्मेदार रहे हैं. प्रखंड की स्थापना 22 […]
उदाकिशुनगंज : अनुमंडल के बिहारीगंज प्रखंड कार्यालय के लिए जमीन के अभाव में 21 वर्ष बाद भी निजी भवन नहीं मिलने से कोसी परियोजना के भवन में दफ्तर चलाया जाना प्रशासन की मजबूरी बन गयी है. इसके लिए शासन व प्रशासन ही जिम्मेदार नहीं बल्कि क्षेत्री नेता भी जिम्मेदार रहे हैं. प्रखंड की स्थापना 22 जून 1994 ई को अनुमंडल के बिहारीगंज को प्रखंड का दर्जा दिया गया था. इसका उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने किया था.
प्रखंड कार्यालय कोसी परियोजना के भवन में चलाया जाने लगा, जो अब तक अभिशाप बन कर रह गया है. अगर स्थानीय जनप्रतिनिधि दिलचस्पी दिखाये होते तो उक्त प्रखंड को भवन के लिए जमीन उपलब्ध हो गयी होती. बिहारीगंज प्रखंड 17.75 किमी के घेरे में फैला हुआ है. इस प्रखंड के अधीन नौ ग्राम पंचायत व 23 गांव है.
उस समय बिहारीगंज प्रखंड की जनसंख्या 81 हजार तीन सौ 31 थी. हालांकि बिहारीगंज को पूर्व मुरबल्ला नाम से जाना जाता था. लेकिन बाद के दिनों में जब बंगाल बिहारी लाल मिश्रा के हाथ में जमींदारी चली आयी तो मुरबल्ला का नाम बद कर बिहारीगंज रखा गया. लेकिन अभी भी इसे निशंखपुर कुरहा परगना कहा जता है. क्यों नहीं बन सका भवन उक्त प्रखंड भवन का निर्माण इसलिए नहीं हो सका कि जमीन ही उपलब्ध नहीं है. बिहारीगंज में सरकार की कई एकड़ जमीन बेकार पड़ी है. 1968 ई में बिहार सरकार ने बिहारीगंज मे लगभग 22 एकड़ जमीन खरीद कर कृषि उत्पादन बाजार समिति की स्थापना की थी. लेकिन सरकारी उदासीनता के कारण 1995 के बाद दिनों से बाजार समिति मृत हो गया.
अगर उक्त जमीन के कुछ हिस्से को प्रखंड कार्यालय भवन निर्माण के लिए स्थानांतरित कर लिया जाता तो भवन निर्माण कराया जा सकता है. लेकिन इसके प्रति सरकार कभी गंभीर नहीं. परियोजना विभाग सृजित ही नहीं प्रखंड व अंचल विभाग सृजित कर दिया गया. लेकिन लोगों के सुविधा के लिए परियोजना विभाग का सृजन ही नहीं किया गया.
उक्त विभाग की जिम्मेदारी बीडीओ निर्वहन करना पड़ता है. अगर उक्त विभाग का सृजन कर लिया जाता तो परियोजना कार्यपालक पदाधिकारी का पद सृजित किया जाता. जिससे किसानों को काफी सुविधा होती. इस तरह प्रखंड का दर्जा देकर मानो सरकार भूल है. क्या रहा है कि इक्कीस वर्षों बाद भी प्रखंड को अपना भवन नसीब नहीं हो पाया है.
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