शोक नहीं, शोकहरिणी है कोसी नदी

Published at :19 Oct 2015 9:03 PM (IST)
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शोक नहीं, शोकहरिणी है कोसी नदी

शोक नहीं, शोकहरिणी है कोसी नदी मार्केण्डेय पुराण के अनुसार कलियुग के अंत तक अविरल बहती रहेगी कोसीपौराणिक कथा के अनुसार शुम्भ-निशुम्भ दैत्यों के वध के बाद मां भगवती ने धोये थे अपने बाल बाल धोने से निकले जल में देवताओं ने किया था स्नानमां भगवती ने कलियुग के अंत तक गंगा व कोसी को […]

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शोक नहीं, शोकहरिणी है कोसी नदी मार्केण्डेय पुराण के अनुसार कलियुग के अंत तक अविरल बहती रहेगी कोसीपौराणिक कथा के अनुसार शुम्भ-निशुम्भ दैत्यों के वध के बाद मां भगवती ने धोये थे अपने बाल बाल धोने से निकले जल में देवताओं ने किया था स्नानमां भगवती ने कलियुग के अंत तक गंगा व कोसी को अविरल रहने का दिया था वरदान वैदिक मंत्रोचार के साथ बनारस अस्सी घाट से आये बटुक ब्राह्मणों ने की महाआरती कोसी नदी के तट पर हुए महाआरती में बड़ी संख्या में शामिल हुए लोग इलाके के इतिहास में पहली बार हुए महाआरती के आयोजन से इलाका भक्तिमय बनारस के अस्सी घाट की तरह कोसी नदी के तट पर हुए महाआरती की छंटा अलौलिक नजर आ रही थी. कलियुग में पापनाशिनी व शोकहरिणी कोसी नदी की पूजा समस्त दुखों का नाश करने वाला होता है. कई पुराणों में इसकी चर्चा है. आचार्य रामबिहारी, पंडित, अस्सी घाट, बनारस प्रतिनिधि, खगड़िया मार्केण्डेय पुराण के अनुसार कोसी नदी शोक नहीं शोकहरिणी है. पुराण के एक श्लोक ‘ कोशिकीति समस्तेषु ततोलोकेषु गीयते ‘ अर्थात कालांतर मंे दैत्यों का वध करने के बाद जब मां भगवती जब प्रसन्न हुई तो उन्होंने अपने बाल धोये. बाल धोने से जो जल निकला उसमें देवताओं ने स्नान किया. तब देवताओं ने देवी मां से कलियुग के अंत तक अविरल व निर्मल कोसी के बहते रहने का वरदान मांगा था. जिसे मां ने पूरा किया था. तब से लेकर अब तक कोसी कष्टों को हरने वाली नदी मानी जाती है. बनारस अस्सी घाट से मां कात्यायनी मंदिर में पूजा अर्चना के लिये आये पंडित आचार्य रामबिहारी ने बताया कि मां कोसी की पूजा की परंपरा कालांतर से चली आ रही है. आधुनिक जमाने में बांध से लेकर बिजली उत्पादन सहित अन्य छेड़छाड़ का नतीजा है कि कोसी अपना रौद्र रुप दिखाती है. कोसी नदी के तट पर विराज रही मां कात्यायनी ‘ कात्यायनी महानामे महायोगिन धीश्वरी’ अर्थात चौसठ योगिनी में श्रेष्ठ अधिष्ठात्री मां कात्यायनी कोसी नदी के तट पर विराजती हैं. यह पवित्र स्थान धमारा घाट के निकट हैं. जहां मां कात्यायनी साक्षात विराजमान हैं. यहां मंदिर में मां की दाहिनी भुजा विद्यमान हैं. जिसकी आराधना से हर मुराद पूरी होती हैं. कोसी के तट पर पहली बार महाआरती इलाके के इतिहास में पहली बार कोसी नदी के तट पर महा आरती के आयोजन से फरकिया का माहौल भक्तिमय हो गया है. बनारस अस्सी घाट से आये पंडितों ने वैदिक मंत्रोचार के बीच सोमवार की शाम महाआरती कर मां कोसी की आराधना की. आचार्य रासबिहारी मिश्र, पंडित अनिल शर्मा, पंडित रवि कुमार मिश्र, पंडित हिमांशु अग्निहोत्री, पंडित मनीष पाठक की अगुवायी में हुए महा आरती में बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लेकर एक नई परंपरा की शुरुआत की घड़ी के साक्षी बने. महाआरती के वक्त चारों और अलौलिक छंटा नजर आ रही थी. मां के मंदिर से लेकर कोसी नदी के तट तक सजाया संवारा गया था. मां कात्यायनी मंदिर न्यास समिति के उपाध्यक्ष युवराज शंभू ने बताया कि कोसी महाआरती के आयोजन के पीछे धार्मिक के अलावा पर्यावरण के दृष्टि से भी महत्व है. उन्हांेने बताया कि अविरल कोसी को बहने देने के लिये यह एक संदेश भी है. युवराज के अनुसार कोसी नदी के साथ छेड़छाड़ के कारण ही नदी का रौद्र रुप नजर आता है. महाआरती के आयोजन के पीछे यह उद्देश्य है कि लोगों में जागृति आये और सरकार के नुमाइंदे भी जाग जाये और कोसी को अविरल बहने दें. इस दौरान सुरक्षा के खास इंतजाम किये गये थे. सोमवार की दोपहर डीएम साकेत कुमार व एसपी अनिल कुमार सिंह ने भी मंदिर में पहुंच कर तैयारियों का जायजा लिया. कोसी महाआरती में इनका रहा खास योगदान मां कात्यायनी मंदिर न्यास समिति युवराज शंभु : उपाध्यक्ष रामानंद सादा : सचिव चंदेश्वरी राम : कोषाध्यक्ष कैलाश प्रसाद वर्मा : सदस्यसंजय प्रसाद साहू : सदस्य विद्यानंद यादव : सदस्य राजेंद्र भगत : सदस्य निरंजन यादव : सदस्य चंद्रदेव यादव : व्यवस्थापक

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