किशोरों को लील लेगा नशा
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :16 May 2016 6:36 AM (IST)
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दुखद. सुलेशन, क्विक फिक्स व पेट्रोल बने नशे के सामान नशे के लिए घातक केमिकल इस्तेमाल का किशोरों में बढ़ा चलन रेलवे स्टेशन पर सफाई कर जुटाते हैं पैसे बक्सर : ट्रेन के कोच में लगाते झाडू लगाकर बच्चे व किशोर सफर करने वाले यात्रियों से करते पैसे की जुगाड़ कर लेते हैं और उतरते […]
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दुखद. सुलेशन, क्विक फिक्स व पेट्रोल बने नशे के सामान
नशे के लिए घातक केमिकल इस्तेमाल का किशोरों में बढ़ा चलन
रेलवे स्टेशन पर सफाई कर जुटाते हैं पैसे
बक्सर : ट्रेन के कोच में लगाते झाडू लगाकर बच्चे व किशोर सफर करने वाले यात्रियों से करते पैसे की जुगाड़ कर लेते हैं और उतरते ही प्लेटफॉर्म से दौड़ पड़ते हैं बाजार की ओर और लौटते हैं खरीद कर पंक्चर साटने वाला सुलेशन. प्लेटफाॅर्म के किसी एकांत स्थान पर जाकर रूमाल या पॉलीथिन के थैले में उड़ेल कर सुलेशन लगते हैं और मुंह से लंबा-तठलंबा कश खींचने और सुलेशन का वाष्प लेने के पांच मिनट बाद नशे का सुरूर चढ़ते ही लगता है.
यह हाल है ट्रेनों में झाडू लगाते यात्रियों के आगे पैसे के लिए हाथ फैलाते मासूम से दिखने वाले किशोरवय नशे के आदी लड़के-लड़कियों का. सस्ते नशे की चाहत में ये बाल अपचारी गिरोह के बच्चे नशे की दलदल में इस कदर डूब चुके हैं कि इससे अब बाहर निकलना उनके लिये मुश्किल है.प टना-मुगलसराय रेल खंड पर ट्रेन के कोच में झाडू लगा कर पैसा का जुगाड़ कर अपने नशे की लत को पूरा करने वाले 10 से 15 वर्ष के बच्चों की गिरोह सक्रिय है.
थिनर व पेट्रोल का भी करते हैं प्रयोग : नशे के आदी ये किशोर अपचारी सूलेशन नहीं मिलने पर विकल्प के रूप में आम तौर पर पेंटिंग के काम में लाया जाने वाला थीनर तथा पेट्रोल का वाष्प ले कर अपने नशे की लत को पूरा करने से भी बाज नहीं आते. इन घातक रसायनो का नशे के लिये दुरुपयोग से इनके सेहत को भारी नुकसान पहुंचता है.स्थानीय स्टेशन पर रूमाल में सूलेशन ले कर कश लगा रही किशोरी सेे इस संबंध में पूछे जाने पर पहले तो घबड़ाई पर विश्वास में ले कर पूछे जाने पर कम पैसा खर्च कर ज्यादा नशा के लिए सुलेशन का कश लेने की बात स्वीकार की.
क्या है जुबेनाइल एक्ट : बच्चों और किशोरों के लिए बनाये गये जुबेनाइल जस्टिस एवं प्रोटेक्शन एक्ट 2000 में कोई ठोस उपाय नहीं किये गये हैं जिससे ऐसे बच्चों को सही मार्गदर्शन दिया जा सके. अथवा उन्हें मुख्य धारा से जोड़ा जा सके. वर्ष 2000 में यह एक्ट बना था और सरकार ने आवश्यकतानुसार वर्ष 2006 में और 2015 में संशोधन भी किये मगर रिहैबिटेशन की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं हो पाया है. चाइल्ड लेबर को रोकने तक के लिए मुकम्मल व्यवस्था नहीं हो पायी है.
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