बुद्धि की निर्मलता का पर्व गणेशोत्सव

Published at :03 Sep 2016 7:10 AM (IST)
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बुद्धि की निर्मलता का पर्व गणेशोत्सव

बल्देव भाई शर्मा दो दिन बाद देश भर में गणेशोत्सव की धूम होगी. अभी बाजारों में सड़कों के किनारे कलाकारों द्वारा निर्मित विभिन्न आकार-प्रकार और विविध रंगों से सजी गणेश प्रतिमाएं श्रद्धालुओं के लिए तैयार हैं. भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (इस बार पांच सितंबर) को गणेश भगवान की इन मूर्तियों की विधि-विधान के साथ पूजन-अर्चन कर […]

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बल्देव भाई शर्मा
दो दिन बाद देश भर में गणेशोत्सव की धूम होगी. अभी बाजारों में सड़कों के किनारे कलाकारों द्वारा निर्मित विभिन्न आकार-प्रकार और विविध रंगों से सजी गणेश प्रतिमाएं श्रद्धालुओं के लिए तैयार हैं. भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (इस बार पांच सितंबर) को गणेश भगवान की इन मूर्तियों की विधि-विधान के साथ पूजन-अर्चन कर घर-घर में प्रतिष्ठापन की जायेगी और पूरे दस दिनों तक चारों ओर ‘सुखकर्ता, दुखहर्ता, जय देव जय देव, जय मंगलमूर्ति दर्शनमात्रे मन: कामना पूर्ति, जय देव जय देव’ के स्वर बन जाते हैं.
सुबह-शाम आरती का नाद कई मुहल्लों और शहरों का पूरा वातावरण भक्तिमय बना देता है. अनंत चतुर्दशी को गणेश जी की विदाई के समय उनकी प्रतिमा का विसर्जन करते समय कितने ही भक्त भावविभोर होकर बिलखने लगते हैं. मानो घर के किसी परम आत्मीय से बिछुड़ रहे हों. भारतीय जीवन में गणेश आदिदेव के रूप में विराजमान हैं. गणेश विघ्नहर्ता हैं. बुद्धि के देवता हैं, कोई भी शुभकार्य उनके पूजन से ही शुरू होता है. विवाह हो या नये घर में प्रवेश अथवा बच्चे का विद्यारंभ, गणेश पूजन से उसकी शुरुआत होती है.
वेद में गणेश का महात्मय बताते हुए मंत्र है- ‘गणानां त्वां गणपति हवामहे कवि कविनाम्र पश्रवस्तमम/ज्येष्ठराजं ब्रह्मण ब्रह्मणसप्तं आन: श्रृण्वन्नतिभि: क्षोद सादनम्।’ हे गणेश तुम देवगणों के अधिपति होने से गणपति हो, ज्ञानियों में श्रेष्ठ हो, उत्कृष्ट ऋतबलों में श्रेष्ठ हो, तुम शिव के ज्येष्ठ पुत्र हो, इसलिए हम सम्मान के साथ आपका आह्वान करते हैं.
हे ब्रह्मसप्त गणेश तुम अपनी समस्त शक्तियों के साथ इस आसन पर आओ. ब्रह्म वैवर्त, पदम, शिव, स्कंद, गणेश आदि अनेक पुराणों में गणेश से जुड़े विभिन्न आख्यानों व महात्मय का विवरण है. महाभारत लिखे जाने को लेकर बड़ी रोचक कथा है कि महर्षि वेदव्यास महाभारत लिखना चाहते थे लेकिन इतना वृहद ग्रंथ लिखना कोई आसान काम नहीं था. उसके लेखन के लिए किसी क्षमतावान और सुयोग्य व्यक्ति की तलाश गणेश पर जाकर पूरी हुई.
व्यास ने गणेश जी से कहा कि महाभारत लिखना है. गणेश जी मान गये लेकिन व्यास ऋषि ने शर्त रख दी की बिना रुके लिखते जायेंगे. गणेश जी भी बड़े चतुर थे, आखिर बुद्धि के देवता जो ठहरे, उन्होंने हामी भरते हुए महर्षि व्यास के सामने अपनी एक शर्त रख दी कि आपकी शर्त तो मुझे मंजूर है, लेकिन मेरी भी एक शर्त आपको माननी होगी. व्यास बोले क्या, गणेश जी ने कहा कि आप मुझे लिखने के लिए जो कुछ भी बोलेंगे उसका अर्थ समझ कर सोच कर बोलेंगे. व्यास जी ने गणेश जी की शर्त मान ली तब महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना संभव हो पायी. इसका मूल नाम जय है, इसे पांचवां वेद भी कहा जाता है.
गणेश जी के जन्म, उनके हाथी जैसे स्वरूप को लेकर कई बड़े रोचक और रोमांचक कथाएं हैं. जिन्हें आज भी बच्चे बड़े चाव से सुनते हैं. ये कथाएं केवल मनोरंजक नहीं हैं, इनकी प्रेरणा भी बच्चों में जगाना जरूरी है ताकि उनके जीवन की नींव भक्ति और श्रद्धा पर खड़ी हो और वे एक अच्छे, योग्य व सदाचारी मनुष्य के संस्कारों से युक्त जीवन जीएं. आज जब माता-पिता और बुजुर्गों के प्रति अपनापन और सम्मान घट रहा है, वे घरों में बेगानों की तरह रहने को मजबूर हो जाते हैं, तब गणेश जी से जुड़ी ये कथा बड़ी उपयोगी हो सकती है. सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने देवताओं से परामर्श किया की प्रथम पूज्य किसे माना जाये, सभी तो श्रेष्ठ हैं.
एक को मानोगे तो दूसरे का मन मलिन हो सकता है, इसलिए कोई ऐसा फार्मूला बनाओ जो सर्वमान्य हो. तय हुआ कि जो पृथ्वी की तीन परिक्रमा सबसे पहले पूरी करके लौटेगा, वही प्रथम पूज्य माना जायेगा. सभी अपने-अपने वाहनों को लेकर दौड़ लिये लेकिन गणेश परेशान कि उनका वाहन तो मूषक यानी चूहा है और खुद का शरीर भी इतना भारी-भरकम तो दौड़ में कैसे प्रथम आयेंगे. चिंतित बैठे गणेश को माता पार्वती ने कहा कि माता-पिता से श्रेष्ठ कोई नहीं इसलिए तुम उन्हीं की परिक्रमा कर लो. झट गणेश जी चूहे की सवारी लेकर शिव-पार्वती की परिक्रमा करने लगे और तीन परिक्रमा पूरी करके अग्रगण्य व प्रथम पूज्य बन गये.
यह है माता-पिता और घर के बुजुर्गों को पूज्य मान कर उनके प्रति सेवा, प्रेम और आदर भाव रखते हुए व्यवहार करने का प्रतिफल. आज के दौर में जब साहित्य से लेकर कार्टून चैनलों तक बच्चों के मनोरंजन को ध्यान में रख कर ही तमाम उपक्रम हो रहे हैं, ऐसे में उन्हें ऐसी कथाओं के माध्यम से संस्कारवान बनाने के प्रयास और तेज होने चाहिए .
जीवन का सबसे बड़ा विघ्न तो मन में बैठा है बुराइयों के रूप में जो हमारे दुखों का मूल कारण है और प्रगति में बाधक है. गणेश पूजा से बुद्धि निर्मल होती है. यह धर्ममय बुद्धि जिसे जैन वाङ्मय में सम्यक बुद्धि कहा गया है, मन को सही दिशा में संचालित करती है, उसे विकारों से रहित बनाती है. स्वच्छ मन ही स्वस्थ जीवन बनाता है.
लक्ष्मी पूजन के साथ गणेश का विधान इसी कारण रखा गया कि धन जीवन में अहंकार, व्यसन जैसी बुराइयां लेकर न आये अर्थात गलत तरीकों से धन न कमाएं तभी वह हमारे लिए सुखकारी होगा, अन्यथा धन पाकर भी कितने लोग सुखी रह पाते हैं ? यह बड़ा सुखद संयोग है कि इस बार गणेश चतुर्थी के दिन ही शिक्षक दिवस है. शिक्षक केवल किताबी ज्ञान देकर परीक्षा पास करने का हुनर सिखाने वाला व्यक्ति नहीं होता बल्कि विद्यार्थी के जीवन की सही सोच और जीवन में मानवीय गुणों को रोपने वाला होता है.
ऐसा करने के लिए शिक्षक को स्वयं भी तो निर्मल बुद्धि और स्वच्छ मन का संस्कारवान और गुणवान होना जरूरी है. शिक्षक जहां विद्यार्थी से अपने प्रति श्रद्धा और आदर की अपेक्षा करे, वहां उसे स्वयं भी उसका सुपात्र होने की चिंता रहनी चाहिए. भारतीय संस्कृति ज्ञान और चेतना के अध्येता डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर मनाये जानेवाले शिक्षक दिवस की यहां सार्थकता है.
गणेशाेत्सव को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने देश के स्वाधीनता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण साधन बना दिया. उन्होंने लोक जागरण व जन-मन में देशभक्ति जगाने के लिए गणेशोत्सवों की शुरुआत करायी. इसलिए यह जरूरी है कि देश भर में आज भी उल्लास के साथ मनाया जानेवाला गणेशोत्सव केवल तड़क-भड़क और गीत-संगीत के खर्चीली आयोजनों के बीच मनुष्यता व सामाजिक दायित्व जगाने की अपनीमूल प्रेरणा को न खोयें.
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