शिव ही हैं परम आनंद व कल्याण के मूल

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 29 Jul 2019 7:16 AM

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डॉ मौसम कुमार ठाकुर श्रावण मास का प्रत्येक दिन शिव उपासना के लिए विशिष्ट है, श्रेष्ठ है. सावन की सोमवारी का स्थान इस विशिष्टता और श्रेष्ठता में सर्वोच्च है. इस दिन शिवलिंग को कामनालिंग के रूप में पूजा जाता है और माना जाता है कि इस पूजन से मनुष्य की लौकिक कामनाएं तो पूर्ण होती […]

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डॉ मौसम कुमार ठाकुर
श्रावण मास का प्रत्येक दिन शिव उपासना के लिए विशिष्ट है, श्रेष्ठ है. सावन की सोमवारी का स्थान इस विशिष्टता और श्रेष्ठता में सर्वोच्च है. इस दिन शिवलिंग को कामनालिंग के रूप में पूजा जाता है और माना जाता है कि इस पूजन से मनुष्य की लौकिक कामनाएं तो पूर्ण होती ही हैं, पालौकिक कल्याण का भी मार्ग इसी से प्रशस्त होता है. वस्तुत: परम आनंद व कल्याण के मूल शिव ही हैं. ‘शिव’ शब्द की उत्पत्ति ‘वश-कांतौ’ धातु से हुई है, जिसका तात्पर्य है ‘जिसे सभी चाहते हैं’. सभी उसे चाहते हैं, जिससे आनंद की प्राप्ति हो और यह परम आनंद शिव से मिलता है.
जहां आनंद है, वहां शांति है. इस प्रकार शिव का अर्थ है- परम मंगल, परम कल्याण. शिव का एक नाम है-शंकर. ‘शंÒ’ का अर्थ आनंद और ‘कर’ का अर्थ है करने वाला अर्थात जो आनंददाता है, वही ‘शिव’ है. ये शिव सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अतिसूक्ष्म, अव्याकृत प्रकृति के मध्य में स्थित, सृष्टि उत्पन्न करने वाला, अनेक रूपों से युक्त, ब्रह्मांड को अकेले परिवेष्टि करने वाले हैं :
सूक्ष्मातिसूक्ष्म कलिलस्य मध्ये, विश्वस्य स्त्रष्टारमनेकरूपम्।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शांतिमस्यन्तमेति।।
शिव, अद्वैत, कल्याण और आनंद सभी का अर्थ एक दूसरे में निहित है, जो समस्त प्राणियों के अंतःकरणों को अपनी ओर खिंचे रखा है, क्योंकि
श्वः श्रेयसं शिवं भद्रं कल्याणं मंगलं शुभम्।
शिव एक ऐसे परम तत्व हैं, जो सर्वत्र अनुस्युत हैं, सब कारणों का कारण हैं, सभी के अधिपति, सभी के रचयिता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं. जिनसे सूर्य प्रतिदिन ससमय उदित और अस्त होता है. वायु अविरल बहता है. प्रकृति उनसे नियंत्रित रहती है :
नोदयति यत्र नश्यति निर्वाति न निर्वृतिं प्रयच्छति च।
ज्ञानक्रियास्वभावं ततेजः शाम्भवं जयति ।।
वेदों में श्रेय या कल्याण के अर्थ में ‘शिव’ शब्द का प्रयोग हुआ है. ईश्वर पद भी शिव का ही पर्याय है- ‘पार्वती-परमेश्वरौ भस्मांगरागा तनुरीश्वरस्य सापस्पृशं केवलमीश्वरेण’.
सत्य की व्यापक और तात्विक कल्पना में ‘शिवं’ ही मुख्य तत्व हैं. सत्य के साथ शिवं की एकात्मकता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वेदांत में ब्रह्म को ‘शातं शिवं अद्वैतम्’ कहा गया है अर्थात ब्रह्म अद्वैत हैं और अद्वैत ही शिव हैं.
सत्य की तरह ही शिव के अनेक रुप हैं. शरीर और इंद्रियों के सुख से लेकर आध्यात्मिक व सामाजिक आनंद तक जीवन के लक्ष्यों में ‘शिवं’ की ही कामना है. मोक्ष, जो सांसारिक प्राणियों की अंतिम इच्छा है, वह भी शिव ही देते हैं- ‘शिवं च मोक्षे च महादेवे सुखे’.
मंगल-कल्याण का मूल और सौंदर्य की पराकाष्ठा शिव ही है. व्यापक अर्थ में श्रेयम्, शिवम् और सुंदरम्, सभी का समाहार सत्य में ही निहित है.
सत्य जीवन का मौलिक तत्व है, जिसकी साधना हमारे जीवन का साफल्य है. दूसरी ओर, सत्य और ज्ञान की प्रधानता का कारण सत्यं और शिवं की एकात्मता है. मनीषियों ने भव्य को सुंदर और सत्य को शिव का पर्याय माना है. जगत और जीवन दोनों के सनातन तत्व का नाम सत्य है.
जगत के यथार्थ और जीवन के साध्य, दोनों सत्य में निहित हैं. शिव का पूर्ण रूप सुंदर है, क्योंकि शिवं और सुंदरं एक दूसरे के स्वरूप में अंतर्निहित हैं. सत्यं, शिवं और सुंदरम् सनातनी धर्म और दर्शन का मूलाधार है. त्रित्व रूपी यह सूत्र गायत्री मंत्र की तरह व्यवहृत है. इसी त्रिवेणी पर हमारा धर्म प्रतिष्ठित है.
अत: परम आनंद व कल्याण की प्राप्ति के लिए श्रावण मास की प्रत्येक सोमवारी को शिवलिंग पर शीतल जल का अर्पण और बेलपत्र से शिव का पूजन विशेष फलदायी है.
लेखक गोड्डा में शिक्षक हैं
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