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वे किताबें, जिन पर इस साल रही नजर

Updated at : 30 Dec 2018 5:08 AM (IST)
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वे किताबें, जिन पर इस साल रही नजर

डॉ कामेश्वर प्रसाद सिंह संपादक, चौपाल साल 2018 की जिन किताबों को लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा, उनमें सबसे पहले केदारनाथ सिंह के कविता संग्रह ‘मतदान केंद्र पर झपकी’ का नाम है. यह किताब केदारनाथ सिंह ने स्वयं तैयार कर दी थी लेकिन आकस्मिक निधन के कारण वे इसे प्रकाशित न देख सके. […]

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डॉ कामेश्वर प्रसाद सिंह
संपादक, चौपाल
साल 2018 की जिन किताबों को लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा, उनमें सबसे पहले केदारनाथ सिंह के कविता संग्रह ‘मतदान केंद्र पर झपकी’ का नाम है. यह किताब केदारनाथ सिंह ने स्वयं तैयार कर दी थी लेकिन आकस्मिक निधन के कारण वे इसे प्रकाशित न देख सके.
यह संग्रह उनके काव्य का शिखर है जिसमें आधुनिक भावबोध की महत्वपूर्ण कविताएं आ गयी हैं. कुंवर नारायण का कविता संग्रह ‘सब इतना असमाप्त’ भी इस साल आया और यह संग्रह भी कवि के निधन के बाद ही आया. सुमन केशरी का संग्रह ‘पिरामिडों की तह में’, सौमित्र मोहन का ‘आधा दिखता वह आदमी’ और वीरेन डंगवाल का ‘कविता वीरेन’ भी इस साल के प्रमुख कविता संग्रह रहे हैं.
लगभग एक शताब्दी की प्रतिनिधि हिंदी कविता का संचयन ‘आधी सदी’ इस साल आया जिसका संपादन सुरेश सलित ने किया है. कविता में युवाओं की सक्रियता उतनी अधिक नहीं दिखाई दी और वरिष्ठ कवियों के संग्रह ही साल भर चर्चा के केंद्र में रहे. केदारनाथ सिंह का आकस्मिक निधन स्तब्धकारी घटना थी जिसका सन्नाटा सालभर पसरा रहा.
उपन्यास को आधुनिक जीवन का महाकाव्य कहा गया है. हिंदी में इस साल आये उपन्यासों में गीतांजलि श्री का ‘रेत समाधि’, ज्ञान चतुर्वेदी का ‘पागलखाना’, प्रभु जोशी का ‘नान्या’ और अलका सरावगी का ‘एक सच्ची झूठी गाथा’ प्रमुख रहे.
उषा किरण खान का उपन्यास ‘गयी झूलनी टूट’ भी पाठकों में लोकप्रिय हुआ. असगर वजाहत का ‘भीड़तंत्र’, स्वयं प्रकाश का ‘नन्हा कासिद’ और क्षमा शर्मा का ‘बात अभी खत्म नहीं हुई’ वरिष्ठ पीढ़ी के कहानी संग्रह रहे जो इस साल आये. इधर युवा पीढ़ी के लेखकों में शशिभूषण द्विवेदी का ‘कहीं कुछ नहीं’, गौरव सोलंकी का ‘ग्यारहवीं ए के लड़के’ और ममता सिंह का ‘राग मारवा’ चर्चित हुए.
गद्य की अन्य विधाओं में अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’, रामशरण जोशी की आत्मकथा ‘मैं बोनसाई अपने समय में’, असगर वजाहत का यात्रा वृत्तांत ‘अतीत का दरवाजा’, ऋतुराज की पुस्तक ‘चीन डायरी’, पत्रकार त्रिलोकदीप की ‘वे दिन वे लोग’ साल की प्रमुख किताबों में से है.
कश्मीरनामा के एक साल के भीतर दो संस्करण हुए, जो स्वयं में एक उपलब्धि के समान है. नयी पीढ़ी के लोगों में अजय सोडानी की ‘दरकते हिमालय में दरबदर’, और श्रीकांत दुबे के ‘मेक्सिको : एक घर परदेश में’ को भी उल्लेखनीय माना जा सकता है. शिवरतन थानवी की डायरी ‘जगदर्शन का मेला’ और नरेंद्र मोहन की ‘साहस और डर के बीच’ भी इसी साल प्रकाशित हुई. हिंदी के पुराने प्रकाशक संभावना प्रकाशन ने नेत्रसिंह रावत का प्रसिद्ध यात्रा वृत्तांत ‘पत्थर और पानी’ इस साल फिर से प्रकाशित किया.
आलोचना का क्षेत्र इस साल सक्रियता से भरा रहा. प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह की अनेक किताबें इस साल आईं जिनमें ‘द्वाभा’, ‘आलोचना और संवाद’, ‘पूर्वरंग’, ‘छायावाद : प्रसाद, निराला, महादेवी और पंत’ और ‘रामविलास शर्मा’ जैसी किताबें हैं. ये किताबें युवा आलोचक आशीष त्रिपाठी के परिश्रम का सुफल हैं जिन्होंने नामवर जी की बिखरी सामग्री को एकत्रित कर उसे पुस्तकाकार तैयार किया. नामवर सिंह पर आलोचक जगदीश्वर चतुर्वेदी की किताब ‘नामवर सिंह और समीक्षा के सीमांत’ भी आयी. उल्लेखनीय किताबों में कर्मेंदु शिशिर की ‘कहानी के आसपास’, शशांक की ‘कहानी के पास’ और ज्योतिष जोशी की ‘दृश्यांतर’ प्रमुख हैं.
कहानी आलोचना पर मृत्युंजय पांडेय की दो किताबें एक साथ आयीं, जिनमें पाठ की प्रविधि का उपयोग कर कहानियों का विश्लेषण किया गया है. विश्व प्रसिद्ध कथाकार बोर्खेस की कहानियों की किताब ‘फिक्सिओनेस’ का हिंदी में पहली बार अनुवाद आया. गार्गी प्रकाशन ने अफ्रीकी कहानियों के संचयन आनंद स्वरूप वर्मा के संपादन में प्रकाशित किये.
इसी प्रकाशन गृह से मरियम बा की प्रसिद्ध कृति ‘एक बहुत लंबा खत’ व न्गूगी वा थ्योंगो का उपन्यास ‘खून की पंखुड़ियां’ भी प्रकाशित हुए. बाल साहित्य के क्षेत्र में इस साल इकतारा संस्था अनूठा काम किया और अनेक पुस्तकों के साथ एक नयी बाल पत्रिका ‘साईकिल’ का प्रकाशन प्रारंभ किया.
विश्व साहित्य में विख्यात पैट्रिक मोदियानो की अनेक किताबों का हिंदी अनुवाद आया, वहीं अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की किताबें भी हिंदी में आयीं. रचना संचयनों में इस साल नयी किताब प्रकाशन से असगर वजाहत का रचना संचयन तीन खंडों में आया जिसका संपादन युवा आलोचक पल्लव ने किया है. पल्लव ने हिंदी कहानियों का एक विशिष्ट संचयन ‘एक, दो तीन’ भी तैयार किया जिसमें हिंदी के प्रतिनिधि ग्यारह कथाकारों की कहानियां हैं. नंदकिशोर आचार्य के संपादन में विनोबा भावे का रचना संचयन भी आया.
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