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रफ्तार का शिकार होता भारत

Updated at : 17 Aug 2022 10:31 AM (IST)
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रफ्तार का शिकार होता भारत

देश में सड़कों का जाल बिछाने का काम तेजी से चल रहा है, सड़कों पर होने वाले हादसे के आंकड़ों ने चिंताएं भी बढ़ा दीं हैं. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में सड़क दुर्घटना की वजह से 1,31,714 लोगों की मौत हो गयी.

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देश में सड़कों का जाल बिछाने का काम तेजी से चल रहा है, सड़कों पर होने वाले हादसे के आंकड़ों ने चिंताएं भी बढ़ा दीं हैं. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में सड़क दुर्घटना की वजह से 1,31,714 लोगों की मौत हो गयी. इनमें से 69.3 प्रतिशत यानी 91,239 मौतें तेज रफ्तार, 30.1 प्रतिशत यानी 39,798 मौतें हेलमेट न पहनने और 11.5 प्रतिशत यानी 26,896 मौतें कार चलाते समय सीट बेल्ट न लगाने से हुईं. यह आंकड़ा तब और भयावह हो जाता है, जब यह तथ्य सामने आता है कि मृतकों का 62 प्रतिशत हिस्सा 18-35 वर्ष आयु वर्ग का है. विश्व बैंक की रिपोर्ट की मानें, तो भारत में दुनिया के एक फीसदी वाहन हैं, पर वाहन दुर्घटनाओं के चलते विश्व में होने वाली 11 प्रतिशत मौतें भारत में होती हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सालाना करीब साढ़े चार लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें डेढ़ लाख लोगों की मौत होती है. देश में हर घंटे 53 सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं और हर चार मिनट में एक मौत होती है. भारत में पिछले 10 सालों में सड़क हादसों में करीब 13 लाख लोगों की मौत हुई है और 50 लाख से अधिक लोग घायल हुए हैं. यह दुनिया में तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका माना जा सकता है.

ग्लोबल स्टेट्स रिपोर्ट ऑन रोड सेफ्टी ने सड़क सुरक्षा से संबंधित पांच कारकों की पहचान की है, जिनमें वाहन तेज चलाना, शराब पीकर गाड़ी चलाना, हेलमेट का प्रयोग नहीं करना, सीट बेल्ट का न बांधना और सुरक्षा उपायों के बिना बच्चों के साथ यात्रा करना आदि शामिल हैं. सड़क सुरक्षा की समस्याओं से लड़ने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बहुपक्षीय रवैया निर्धारित किया है, जिसमें ‘4ई’ पर मुख्य जोर है- एजुकेशन (शिक्षा), एनफोर्समेंट (प्रवर्तन), इंजीनियरिंग और इमरजेंसी. ये नियमों के बारे में जागरूकता बढ़ाने, बेहतर नियमन करने, और ट्रैफिक नियमों का पालन सुनिश्चित करने, सड़क बुनियादी ढांचे में सुधार और सड़क दुर्घटना के पीड़ित को तुरंत मदद सुनिश्चित करने से संबंधित हैं. सड़क दुर्घटनाओं के लिए सरकार और खराब सड़कों को दोष देना तो आसान है, मगर लोग अपनी जिम्मेदारी से साफ बच निकलते हैं. मालूम हो, सड़क हादसे दुनियाभर, विशेष रूप से भारत, में मृत्यु, विकलांगता और अस्पताल में भर्ती होने के प्रमुख कारणों में है. भारत के श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी बेहद कम (महज 27 प्रतिशत) है. इसका अर्थ यह है कि वे पुरुषों की तुलना में कम बाहर निकलती हैं, अपेक्षाकृत कम दूरी की यात्राएं करती हैं और सड़क सुरक्षा से जुड़े खतरों का जोखिम भी कम उठाती हैं. लेकिन हादसे का प्रभाव महिलाओं और पुरुषों पर अलग-अलग तरह से पड़ता है. अध्ययन बताते हैं कि समान गंभीरता वाले सड़क हादसों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के घायल होने और मारे जाने की संभावना कहीं ज्यादा होती है. चोटिल होने पर उनके उपचार और दुर्घटना संबंधी समुचित देखभाल मिलने की संभावना कम होती है क्योंकि उनके पास स्वास्थ्य बीमा की सुविधा नहीं होती. महिलाओं के पास आर्थिक मजबूती के अन्य साधन भी कम होते हैं.

सड़क हादसों में सिर्फ मौत ही नहीं होती है, बल्कि बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान भी होता है. विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सड़क दुर्घटनाओं के चलते 5.96 लाख करोड़ रुपये यानी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3.14 प्रतिशत के बराबर नुकसान होता है. आर्थिक विशेषज्ञों की मानें, तो अगर देश की सड़कें सुरक्षित हो जाएं और एक भी दुर्घटना न हो, तो जीडीपी दहाई के अंक को छू लेगी. विश्व बैंक के नेतृत्व में हुए एक हालिया अध्ययन में बताया गया है कि यदि आगामी 24 सालों में सड़क दुर्घटनाओं में मरने और घायल होने वालों की संख्या में 50 फीसदी की कमी आती है, तो इससे भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 14 प्रतिशत का इजाफा हो सकता है. हमें समझना होगा कि सड़क हादसे केवल लोगों को मारते या विकलांग नहीं बनाते, बल्कि वे देश की अर्थव्यवस्था को विकलांग बनाते हैं. केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने भारत में हर साल सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की संख्या को 2024 तक आधा करने का लक्ष्य रखा है.

जब तक प्रौद्योगिकी के उपयोग, जागरूकता को बढ़ावा देने, कानून के सख्त कार्यान्वयन और आपातकालीन सुरक्षा उपायों जैसे कदमों को मजबूत नहीं किया जाता है, तब तक इस संबंध में कोई सकारात्मक परिणाम हासिल नहीं होंगे. सुरक्षित यात्रा तभी संभव होगी, जब सरकारों, नागरिकों और नागरिक समाज के समन्वित प्रयासों से सड़क सुरक्षा एक सामाजिक जिम्मेदारी में बदल जाए. वास्तव में वाहनों की बढ़ती संख्या और सड़क सुरक्षा आज भारत के लिए एक बड़ी समस्या है. यह सच नहीं है कि दंड हल्के हैं और नियम लागू करने के मामले में ढिलाई है. फिर भी सड़क हादसों की संख्या घटी नहीं है. इसलिए केंद्र व राज्य सरकारों को कारगर कदम उठाने होंगे, अन्यथा महानगरों व शहरों से लेकर गांवों में हर रोज सड़कों पर लोग मरते रहेंगे. सरकार को इन हादसों से सबक लेना चाहिए और व्यवस्था की खामियों को दूर करना चाहिए. साथ ही, लोगों को अपने रवैये में आमूल-चूल परिवर्तन लाना होगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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रवि शंकर

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By रवि शंकर

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