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पर्यावरण संकट और हाथी

स्थानीय-आदिवासी लोक-ज्ञान परंपरा का अध्ययन करके भी ‘सह-अस्तित्व’ को बढ़ावा दिया जा सकता है. हाथियों के संरक्षण के लिए संवैधानिक निर्देशों का भी सही पालन किया जाना चाहिए.

By डॉ अनुज लुगुन
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पर्यावरण संकट और हाथी
पर्यावरण संकट और हाथी
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अपने गांव लौटता हूं, तो भय बना रहता है कि कहीं रास्ते में जंगली हाथियों का झुंड न मिल जाए. झारखंड के दक्षिण में ओडिशा के सीमावर्ती क्षेत्र में जंगलों से गुजरनेवालों के लिए यह आम बात है. हाथियों के झुंड के गांव में घुस जाने, खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने की घटना बढ़ रही है. दो दशक पहले ऐसी एकाध घटनाएं होती थीं. पर्यावरण संकट बढ़ने से वन्यजीवों के अस्तित्व पर खतरा बढ़ गया है. जलवायु परिवर्तन से कई वनस्पतियां विलुप्त हो रही हैं. इससे वन्य जीव भी प्रभावित होते हैं.

उनके भोजन की उपलब्धता कम हो रही है. जल के स्रोत, दलदल आदि के सूखने से वनस्पतियां और विविधता खत्म हो रही है. भोजन, पानी और विश्रामगाह की तलाश में वन्यजीव भटक कर मानव आबादी तक पहुंच रहे हैं. दूसरी ओर, मानव आबादी का आक्रामक विस्तार हो रहा है. कथित विकास की परियोजनाओं ने वन्यजीवों के पारंपरिक आवास और उनके गलियारों को ध्वस्त कर दिया है.

संभवतः अस्तित्व के इतिहास में वन्यजीव सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं. मनुष्य और वन्यजीवों के बीच बढ़ता टकराव, उनके मनोविज्ञान में हो रहा तेजी से बदलाव यह संकेत दे रहा है कि वे भयानक यातनाओं से गुजर रहे हैं. हाथी सबसे बड़ा स्थलीय जीव है. उसके भोजन की खपत भी ज्यादा है और उनके आवास के लिए जंगलों का बड़ा और समृद्ध क्षेत्र चाहिए. दुखद है कि जंगलों का घनत्व, उसकी विविधता खत्म हो रही है, जिससे वे भटकने के लिए मजबूर हैं.

वर्ष 2017 की हाथी जनगणना के अनुसार, भारत में हाथियों की कुल संख्या 27312 है, जो 2012 की गणना 30000 से कम है. विशेषज्ञों का मानना है कि हाथियों की संख्या दस फीसदी तक कम हुई है. भारत सरकार ने वर्ष 1992 में हाथी परियोजना की शुरुआत की थी. हाथियों, उनके आवास और गलियारों की रक्षा करना, मानव-पशु विरोध को हल करना, पालतू हाथियों का कल्याण आदि प्रारंभिक उद्देश्यों के साथ इसकी शुरुआत की गयी थी.

तब से हाथी संरक्षण को लेकर कई परियोजनाएं चलायी जा रही हैं. एक आंकड़े के अनुसार, 2014 से 2019 तक मानव और हाथी संघर्ष में लगभग दो हजार लोगों और पांच सौ से अधिक हाथियों की मौत हुई है. अकेले छत्तीसगढ़ में वर्ष 2018-19 दो वर्षों में हाथी-मानव संघर्ष में 42 लोगों की मौत हुई. रेल मंत्रालय के एक आंकड़े के अनुसार, 2019 के अक्तूबर तक सात हाथियों की रेल से कट कर मौत हुई है. पिछले दस वर्षों में एक सौ अस्सी हाथियों की मौत रेल से कट कर हुई है. हाथी के दांत की तस्करी भी हाथी और मानव के संघर्ष का बड़ा कारण है.

हाथी और मानव के संघर्ष का मुख्य कारण अत्याधुनिक मशीनी जीवनशैली है. यह जीवनशैली मुख्यत: मनुष्य केंद्रित जीवनशैली है. हाथी रिजर्व जैसी परियोजनाओं के बावजूद मशीनी जीवन का विस्तार हाथियों के क्षेत्र में बढ़ता जा रहा है. खनन की बड़ी-बड़ी परियोजनाओं, वृहद रेल-सड़क परियोजनाओं ने उनके सहज जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है. स्वाभाविक है कि इन क्षेत्रों में भी विकास की परियोजनाएं लगेंगी, लेकिन उनका स्वरूप भिन्न होना चाहिए.

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘सह-अस्तित्व’ के द्वारा ही संरक्षण को बढ़ावा दिया जा सकता है, लेकिन ‘सह-अस्तित्व’ का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि इस प्रक्रिया में स्थानीय-आदिवासी समुदायों को बाहर कर दिया जाये. हाथी संरक्षण की एक जटिलता यह भी है कि उनके संरक्षण एवं गलियारों के निर्माण के लिए स्थानीय-आदिवासी समुदायों को विस्थापित करने की बात भी उठती रहती है.

स्थानीय-आदिवासी समुदाय और हाथियों का संबंध हमेशा टकराव का नहीं रहा है. इन समुदायों की स्मृतियों, मौखिक परंपराओं में उनके बीच का सहज संबंध है. हाथियों से संबंधित उनका ज्ञान आधुनिक वन्यजीव विज्ञानियों से भिन्न एवं पारंपरिक है. दार्जिलिंग में लेपचा आदिवासी समुदाय के पुरखा, आदिवासी दार्शनिक परंपरा के ज्ञानी पद्मश्री सोनाम त्सिरिंग लेपचा (दिवंगत) ने अपने संग्राहलय में कई ऐसे संगीत के वाद्य यंत्रों को संरक्षित करके रखा था, जिनकी आवाज सुन कर ही हाथी, बाघ और अन्य जंगली जानवर मानव आबादी से दूर चले जाते थे.

इस यंत्र से न तो मनुष्यों को खतरा था, न ही जानवरों को नुकसान होता था. स्थानीय-आदिवासी लोक-ज्ञान परंपरा का अध्ययन करके भी ‘सह-अस्तित्व’ को बढ़ावा दिया जा सकता है. हाथियों के संरक्षण के लिए संवैधानिक निर्देशों का भी सही पालन किया जाना चाहिए. अमूमन कई हाथी निवास क्षेत्र संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची क्षेत्र में आते हैं. इन अनुसूचित क्षेत्रों में पहले से ही विकास संबंधी परियोजनाओं के लिए जरूरी निर्देश दिये गये हैं, इनके सही क्रियान्वयन का अभाव है.

ये अनुसूचित क्षेत्र आदिवासी बहुल हैं और इन क्षेत्रों में विकास की परियोजनाओं को लेकर आदिवासी समाज के साथ भी टकराव की स्थितियां उत्पन्न होती रहती हैं. इन क्षेत्रों में आदिवासियों और हाथियों का जीवन सदियों से सह-अस्तित्व के साथ चलता आया है. अब कथित विकास की अंधी दौड़ ने पर्यावरण को तहस-नहस कर दिया है, ऐसे में इन दोनों का अस्तित्व संकटग्रस्त हैं.

सह-अस्तित्व और सहजीविता के दर्शन से ही हाथी और अन्य वन्य जीवों का संरक्षण संभव है. जैसे-जैसे विकास की अंधाधुंध परियोजना अनुसूचित क्षेत्रों में घुसती जा रही हैं वैसे ही हाथी अपने आवास से भटक कर आबादी क्षेत्रों में प्रवेश करने को मजबूर होते जा रहे हैं.

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