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यूरोप से व्यापार

By संपादकीय
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यूरोप से व्यापार
यूरोप से व्यापार
सांकेतिक तस्वीर

बीते कुछ दशकों में विश्व के विभिन्न हिस्सों के साथ भारत के वाणिज्य-व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसके परिणामस्वरूप हमारी अर्थव्यवस्था का आकार भी बढ़ता गया है. लेकिन अनेक क्षेत्रों के साथ आर्थिक संबंधों के विस्तार की संभावनाओं को पूरी तरह से अभी भी साकार नहीं किया जा सका है. ऐसा ही एक क्षेत्र यूरोपीय संघ है.

यूरोप के 27 देशों के इस परिसंघ के साथ आठ साल बाद ठोस व्यापारिक सहयोग स्थापित करने के लिए बातचीत का सिलसिला फिर शुरू हो गया है. यह दोनों पक्षों के बीच पिछले कुछ महीनों से हो रही सघन वार्ताओं का परिणाम है. उम्मीद है कि जल्दी ही इसका प्रारंभिक स्वरूप सामने आ जायेगा. दोनों पक्ष अड़चनों से परिचित हैं और वे अब 2013 में बातचीत रुक जाने की परिघटना का दोहराव नहीं चाहते.

तब छह साल की कोशिशों के बाद भी मुक्त व्यापार समझौते के प्रारूप पर सहमति नहीं बन सकी थी. लेकिन अब स्थितियां बदल चुकी हैं. भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़नेवाली अर्थव्यवस्था बन चुका है तथा उसका बाजार भी बढ़ता जा रहा है. अमेरिका, यूरोप और एशिया से होनेवाले निवेश में भी निरंतर वृद्धि हो रही है. बीते एक साल से भारत और यूरोप समेत समूची दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था की गति बहुत धीमी हो गयी है.

यूरोपीय संघ के लिए ब्रिटेन का अलग होना भी एक बड़ा झटका है. महामारी और विभिन्न भू-राजनीतिक संकटों ने इस तथ्य से भी सभी को आगाह कर दिया है कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला की पुनर्संरचना बहुत आवश्यक है तथा उसमें चीन की प्रधानता अंतरराष्ट्रीय बाजार और आर्थिकी के लिए ठीक नहीं है. हालांकि यूरोपीय संघ के अनेक देशों के साथ भारत के व्यापारिक संबंध हैं तथा यूरोपीय संघ से भी कारोबार होता है, लेकिन उसे एक विशेष व्यापारिक व्यवस्था के द्वारा विस्तार देने की आवश्यकता है.

इससे न केवल वस्तुओं, सेवाओं और वित्त की आवाजाही बढ़ेगी, बल्कि अफ्रीका, मध्य एशिया और भारत-प्रशांत क्षेत्र में सहभागिता की संभावनाओं को भी साकार किया जा सकेगा. लोकतंत्र, वैश्विक सहयोग और बुनियादी स्वतंत्रता के साझा मूल्य मुक्त व्यापार समझौते को ठोस आधार दे सकते हैं. उल्लेखनीय है कि 2019-20 में ही यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार था तथा चीन और अमेरिका का स्थान उसके बाद था.

तब दोनों तरफ से 90 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था. साल 2018 में यह आंकड़ा 115 अरब डॉलर से अधिक था. ऐसा तब संभव हुआ था, जब दोनों पक्षों के बीच कोई विशेष व्यापारिक समझौता नहीं है. वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गयी है. वाणिज्य के अलावा आपसी सहयोग महामारी और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में भी सहायक हो सकता है. डिजिटल और अन्य तकनीकों के क्षेत्र में भी सहभागिता बढ़ने की गुंजाइश है. उम्मीद है कि इस संबंध में जल्दी सहमति बन जायेगी.

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