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अमेरिका में ‘देसी’ का दबदबा

By मोहन गुरुस्वामी
Updated Date
प्रतीकात्मक तस्वीर

मोहन गुरुस्वामी, वरिष्ठ स्तंभकार

mohanguru@gmail.com

अमेरिका में हालिया ओपिनियन पोल से स्पष्ट है कि भारतीय मूल के 28 प्रतिशत मतदाताओं का रुझान डोनाल्ड ट्रंप की तरफ है और शेष का जो बाइडेन की तरफ. साल 2016 के बाद यह बड़ा परिवर्तन है. तब भारतीय मूल के केवल 16 फीसदी मतदाताओं ने हिलेरी क्लिंटन के बजाय ट्रंप को वरीयता दी थी. ह्यूस्टन में आयोजित ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में ट्रंप और मोदी के बीच जबरदस्त तालमेल दिखा था, वहां भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘अबकी बार ट्रंप सरकार’ का नारा लगवाया था. साथ ही ट्रंप द्वारा अफ्रीकी-अमेरिकी और हिस्पेनिक्स लोगों को निशाना बनाये जाने से भारतीय-अमेरिकियों की विशिष्ट मानसिकता पर अतिरिक्त असर हुआ है.

कुछ वर्ष पहले जोइल स्टीन ने टाइम पत्रिका में ‘मेरा अपना निजी भारत’ नाम से एक बेहतरीन कॉलम लिखा था. यह न्यू जर्सी के एक शहर एडिसन के बारे में था. अमेरिका में भारतीय समुदाय का प्रतिनिधिनित्व करनेवाले लोगों द्वारा स्टीन को नस्लवादी और भारत-विरोधी कहा गया था. टाइम ने इसके लिए खेद प्रकट किया, लेकिन लोगों के गुस्से के बारे में उसे सही अंदाजा नहीं था. उसने लिखा- जोइल स्टीन द्वारा लिखे गये व्यंग्य स्तंभ की वजह से अगर हमारे किसी पाठक को कष्ट हुआ है, तो उसके लिए खेद है. यह बहुत चतुराईपूर्ण था. टाइम की कुछ ऐसी ही खूबी है. अन्य कारणों से भी एडिसन विख्यात है. यह जातीय समूह की एकमात्र ऐसी जगह थी, जिसने 2016 में डोनाल्ड ट्रंप की मेजबानी की थी. रिपब्लिकन हिंदू संघ द्वारा आयोजित पांच घंटे के कार्यक्रम में 5000 से अधिक बड़े, बूढ़े और बच्चे शामिल हुए थे.

कार्यक्रम का आयोजन एवीजी ग्रुप ऑफ कंपनीज के चेयरमैन और सीइओ भारतीय-अमेरिकी उद्योगपति शलभ कुमार द्वारा किया गया था. बड़ा जनसमूह ट्रंप के समर्थन में उमड़ा था, वे हाथों में तख्तियां लिये थे, जिस पर लिखा था- ट्रंप मेक अमेरिका ग्रेट अगेन. ट्रंप फॉर हिंदू अमेरिकन, ट्रंप ग्रेट फॉर इंडिया और ट्रंप फॉर फास्टर ग्रीन कार्ड. पारंपरिक भारतीय वेशभूषा में समर्थन नारों के साथ एकत्रित भीड़ ट्रंप का समर्थन कर रही थी और अमेरिकी ध्वज की ओट से होते हुए ट्रंप मंच पर आये. स्पष्ट रूप से ट्रंप की एक बात जो लोगों को आकर्षित कर रही थी कि वे खुलकर मुसलमानों का विरोध कर रहे थे. काले और हिस्पेनिक्स लोगों के प्रति उनकी नफरत जाहिर थी.

एडिसन नेवार्क अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास में स्थित है, इसीलिए भारतीय विमानों के ठहराव के लिए पहला गंतव्य स्थल है. यही कारण है कि दशकों से एडिसन भारतीय प्रवासियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है, खासकर उन लोगों के लिए जो गुजरात से आते हैं. आज 20 फीसदी आबादी यानी लगभग 99,000 लोग भारतीय-अमेरिकी है, उनमें से ज्यादातर गुजराती हैं. कुछ मौकों पर मैं एडिसन एनजे गया, लेकिन यह वैसा शहर नहीं है, जैसा कि रहने के लिए मैं चाहता हूं. यह मैला-कुचैला और शोर-शराबे वाला शहर है. यहां भारतीय सस्ते खाने-पीने के सामानों के लिए मोलभाव करते हैं. एडिसन के बारे में मेरे एक मित्र का कहना है कि यह अमेरिका का दूसरा हाथ है. पहला होबोकेन है, वह भी न्यू जर्सी में ही है.

देसी का मतलब है, जो घरेलू हो. सभी एनआरआइ द्वारा जब भारतीयों का जिक्र किया जाता है, तो उसे स्व-निंदा के तौर पर किया जाता है. पिछली गणना में अमेरिका में कम से कम 28 लाख लोग देसी थे. अमेरिकी जनगणना -2000 मानचित्र से स्पष्ट है कि भारतीय-अमेरिकी (आधिकारिक तौर पर एशियाई भारतीय) लोग खुद को स्थान विशेष पर संकेंद्रित करते हैं. मैं जब भी अमेरिका जाता हूं, तो मुझे आश्चर्य होता है कि हमारे भारतीय-अमेरिकी परिवार और मित्र केवल अन्य देसी के साथ समाजीकृत होते हैं. वे एक साथ झुंड में जाते हैं. अमेरिका में भारतीय-अमेरिकी समूहों की एक ठीक-ठाक संख्या है.

लेकिन, एडिसन में यह जमावड़ा सबसे अधिक है. अमेरिका में भारतीय-अमेरिकी उच्चतम आय समूह का हिस्सा हैं. आमतौर पर वे ज्यादातर हिस्सों में वेतनभोगी कर्मचारी हैं. हालांकि, एडिसन में इस समुदाय की पेशेवर आमदनी की स्थिति अन्य भारतीय-अमेरिकियों की आय की तुलना में कम है. यह स्पष्ट तौर पर दिखता है. पांच में एक देसी गुजराती मूल का है. वे अन्य क्षेत्र के भारतीयों की तरह अपने लोगों में जीना और सामाजिक जुड़ाव रखना चाहते हैं.

गुजराती स्वभाव से अधिक उद्यमी होते हैं. अमेरिका में छह लाख वाले गुजराती समुदाय में पेशेवर लोगों की संख्या बहुत कम है. यहां कम खर्च वाले आश्रयगृहों में आधे से अधिक के वे मालिक हैं. चूंकि, अमेरिका में रहनेवाले गुजरातियों में बड़ी संख्या में पटेल उपनाम वाले लोग हैं, इन होटलों को लोग ‘पोटेल्स’ कहते हैं. अक्सर इन जगहों पर घंटे के हिसाब से कमरे किराये पर दिये जाते हैं. एडिसन आरएसएस और रामभक्तों के लिए आदर्श केंद्र है, जो राजकोट या सूरत के बजाय इसे ज्यादा पसंद करते हैं. यह मोदी का देश है.

सामान्य तौर पर भारतीय बहुत अधिक नस्लवादी, सांप्रदायिक और रंग भेदी होते हैं. हमारी राजनीतिक शुद्धता के स्पष्ट मानक नहीं हैं. हम रोजमर्रा के जीवन में नस्लवादी और दूसरों के लिए अपमानजनक आचरण करते हैं. अमेरिका में देसी समुदाय उससे ज्यादा अलग नहीं है. मीरा नायर की 1991 में आयी फिल्म ‘मिसीसिप्पी मसाला’ भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बीच की कहानी है. हिंदू समाज में प्रचलित पूर्वाग्रहों को रेखांकित करती है. यह कहानी यूगांडा-भारतीय-गुजराती मूल की लड़की और खूबसूरत अफ्रीकी-अमेरिकी लड़के की प्रेम कहानी है, यह किरदार डेंजेल वाशिंगटन ने निभाया था. लेकिन, पोटेल बिजनेस वाला परिवार ‘कालू’ के साथ प्रेम की सख्त मुखालफत करता है.

‘कालू’ शब्द का इस्तेमाल देसी द्वारा अफ्रीकी मूल के व्यक्ति के लिए किया जाता है. अमेरिका के समृद्ध आय वाले समुदाय के तौर पर देसी अब अमेरिकी राजनीति में प्रभावशाली भूमिका में हैं. भारतीय हितों के लिए वे अपनी भूमिका निभा रहे हैं, चाहे वह असैन्य परमाणु समझौता हो या वर्क वीजा की संख्या बढ़ाने की बात हो. भारतीय-अमेरिकियों की आर्थिक ताकत को भी महसूस किया जाता है. यह अच्छा है कि वे अपनी मांसपेशियों को लचीला करना शुरू कर चुके हैं. लेकिन, यह अच्छा नहीं है कि कुछ इससे खुद की मूर्खता को भी प्रदर्शित कर रहे हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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