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गुमनाम शहीद तिलका मांझी

Updated at : 13 Jan 2022 8:12 AM (IST)
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गुमनाम शहीद तिलका मांझी

आदिवासी समुदाय में आज भी उन पर कहानियां कही जाती हैं, संताल उन पर गीत गाते हैं. साल 1831 का सिंहभूम विद्रोह, 1855 का संताल विद्रोह तिलका की जलाई मशाल से रौशन हुए.

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बिहार के सुल्तानगंज के तिलकपुर गांव में 11 फरवरी, 1750 को जन्मे जनजातीय समुदाय के तिलका मांझी को प्रथम स्वतंत्रता सेनानी माना जाता है. बचपन में ‘जबरा पहाड़िया’ थे, संथाल थे या पहाड़िया, इस पर इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं. लेकिन, अंग्रेजी सरकार के अभिलेखों में उनका नाम ‘जबरा पहाड़िया’ ही है. महाश्वेता देवी ने ‘शालगिरार डाके’ और राकेश कुमार सिंह ने ‘हुल पहाड़िया’ पुस्तकों में भी विवरण दिया है.

पहाड़िया में ‘तिलका’ का अर्थ लाल आंखों वाला गुस्सैल होता है. बालक जबरा को उत्साह और तेज के कारण तिलका पुकारा जाने लगा. लाइव हिस्ट्री इंडिया के अनुसार, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भी उन्हें इसी प्रसिद्ध नाम से जानती-बुलाती थी. उत्साही, अग्रणी युवा ‘जबरा पहाड़िया’ गांव के प्रधान बनाये गये, जिन्हें वहां ‘मांझी’ कहा जाता है. यही वजह है कि ‘जबरा पहाड़िया’ तिलका मांझी के रूप में प्रसिद्ध हुए.

तिलका ने अंग्रेज और उनके पिट्ठू शोषकों को प्रकृति, भूमि, जंगल और उनके जनजातीय समुदाय के साथ क्रूरता से पेश आते देखा था. अंग्रेजों ने वर्ष 1765 तक जंगल महल क्षेत्र हथिया लिया था. संताल परगना, छोटानागपुर पर भी कब्जा कर लिया और आदिवासियों से भारी कर वसूलने लगे. अंग्रेजों की इस ज्यादती के कारण आदिवासी महाजनों से सहायता मांगने पर मजबूर हुए. पहले से ही आपस में मिले हुए अंग्रेज और महाजन उधार चुकाने में असमर्थ आदिवासियों की धोखे से जमीनें हड़प लेते थे.

अंग्रेजों और महाजनों के शोषण से त्रस्त लोगों को तिलका ने संगठित कर प्रेरित करना शुरू कर दिया. वर्ष 1770 आते-आते अंग्रेजों से लोहा लेने की पूरी तैयारी कर ली गयी. वे समाज के लोगों को अंग्रेजों के आगे सिर नहीं झुकाने के लिए प्रेरित करते. उन्होंने जात-पात से ऊपर उठ कर अंग्रेजों के खिलाफ लोगों से खड़ा होने का आह्वान किया. उन्हें सुनने के लिए भीड़ उमड़ने लगी. साल 1770 में बंगाल के भीषण सूखे का संताल परगना पर भी गहरा प्रभाव पड़ा. इन समस्याओं के चलते आदिवासियों ने कर में राहत देने की मांग की, लेकिन इसके उलट कंपनी सरकार ने टैक्स दोगुना कर दिया और जबरन वसूली भी शुरू कर दी, जिससे लाखों लोग भूख से मर गये.

चरम आक्रोश के बीच तिलका मांझी के नेतृत्व में भागलपुर का खजाना लूट कर टैक्स और सूखे की मार झेल रहे गरीबों और आदिवासियों के बीच बांट दिया गया. बंगाल के तत्कालीन गवर्नर वॉरेन हेस्टिंग्स ने विद्रोह को कुचलने के लिए 800 सैनिकों की फौज भेजी, पर 28 वर्षीय तिलका मांझी के नेतृत्व में आदिवासियों ने 1778 में रामगढ़ कैंट में तैनात पंजाब रेजिमेंट पर ही हमला कर दिया. आक्रोशित उग्र आदिवासियों के सामने प्रशिक्षित सैनिक भी नहीं टिक पाये और अंग्रेजों को कैंट छोड़ कर भागना पड़ा.

आक्रोश से निबटने के लिए अंग्रेजों ने धूर्तता की चाल चली. अगस्टस क्लीवलैंड को मुंगेर, भागलपुर और राजमहल जिलों का कलेक्टर ऑफ रेवेन्यू बना कर भेजा गया. उसने संताली सीखी और भोले-भाले आदिवासियों को बरगलाने लगा. उसने 40 आदिवासी समुदायों को टैक्स में छूट, नौकरी जैसे लुभावने प्रस्ताव से फूट डाल कर समर्थन ले लिया. क्लीवलैंड ने आदिवासियों की एकता तोड़ने के लिए उन्हें सिपाही की नौकरी दी. तिलका मांझी को भी नौकरी का प्रस्ताव दिया गया. तिलका अंग्रेजों की फूट डालो राज करो की असली चाल समझ गये और उन्होंने कोई भी प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया.

अंग्रेजों के भेदियों से बचने के लिए विभिन्न आदिवासी समुदायों को साल के पत्तों पर संदेश लिख कर भेजे गये. इसका जनजातीय समुदाय सम्मान करता था और इस प्रकार कई प्रमुख लोगों का समर्थन मिला. तिलका मांझी ने एक बड़ा निर्णायक कदम उठाने की तैयारी कर ली. उन्होंने साल 1784 में अंग्रेजों के भागलपुर मुख्यालय पर हमला कर दिया. घमासान युद्ध हुआ और तिलका मांझी ने एक जहरीले तीर से क्लीवलैंड को घायल कर दिया, जिससे कुछ दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गयी.

एक आदिवासी के हाथों कलेक्टर क्लीवलैंड की मौत कंपनी सरकार के लिए बड़ी चुनौती थी. इसके जवाब में कुटिल युद्धनीति में निपुण लेफ्टिनेंट जनरल आइरे कुटे को तिलका को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए भेजा गया. किसी घर के भेदी ने ही लालचवश तिलका मांझी का पता अंग्रेजों को बता दिया. आधी रात को तिलका और अन्य आदिवासियों पर हमला किया गया. तिलका जैसे-तैसे बच गये लेकिन उनके अनेक साथी शहीद हो गये.

अपने गृह जिले सुलतानगंज के जंगलों से उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ छापामार युद्ध छेड़ दिया. अंग्रेजों ने तिलका तक पहुंचने वाले हर सप्लाई रूट को बंद कर दिया. तिलका और उनके सैनिकों की आमने-सामने लड़ाई हुई. तिलका मांझी को अंग्रेजों ने 12 जनवरी, 1785 को पकड़ लिया और घोड़ों से बांधकर भागलपुर तक घसीटा, पर वे जीवित बच गये. 13 जनवरी, 1785 को 35 वर्षीय इस पहले स्वतंत्रता सेनानी को फांसी दे दी गयी.

इस वीर योद्धा को इतिहास में समुचित तरीके से दर्ज नहीं किया गया. आदिवासी समुदाय में आज भी उन पर कहानियां कही जाती हैं, संथाल उन पर गीत गाते हैं. साल 1831 का सिंहभूम विद्रोह, 1855 का संताल विद्रोह तिलका की जलाई मशाल से रौशन हुए. साल 1991 में बिहार सरकार ने भागलपुर यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर तिलका मांझी यूनिवर्सिटी रखा और उन्हें सम्मान दिया. जहां उन्हें फांसी हुई थी उस स्थान पर एक स्मारक बनाया गया. दूरदर्शन ने अपने राष्ट्रीय चैनल पर गुमनाम कुर्बानियां धारावाहिक में इसे विस्तार से दिखाया था.

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सुनील बादल

लेखक के बारे में

By सुनील बादल

सुनील बादल is a contributor at Prabhat Khabar.

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