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पेटा-अमूल विवाद में झलकती लॉबिंग

By हरवीर सिंह
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पेटा-अमूल विवाद में झलकती लॉबिंग
पेटा-अमूल विवाद में झलकती लॉबिंग
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कुछ दिनों से पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) और गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ), जिसे पॉपुलर ब्रांड अमूल के रूप में जाना जाता है, के बीच एक विवाद छिड़ा हुआ है. पेटा ने अमूल को पत्र लिख कर सलाह दी कि उसे अपने डेयरी कारोबार को पेड़-पौधों पर आधारित डेयरी में बदलना चाहिए. जाहिर है कि भारत जैसे देश में, जहां करीब दस करोड़ दुग्ध उत्पादक किसान हैं, वहां ऐसी सलाह पर केवल हंसा जा सकता है.

अमूल ने प्रतिक्रिया दी है कि विदेशों से वित्तपोषित एक गैर-सरकारी संगठन का ऐसा सुझाव हमारे देश के करोड़ों दूध किसानों की रोजी-रोटी पर हमला है. असल में इस विवाद को पेड़-पौधों पर आधारित दूध उत्पादन करनेवाली कंपनियों की कारोबारी रणनीति और पेटा के भारतीय दूध किसानों पर सीधे हमले के रूप में देखा जाना चाहिए.

भले ही पेटा स्वयं को पशुओं के संरक्षण और उनके साथ बेहतर व्यवहार के पैरोकार संस्था के रूप में दुनियाभर में पेश करता है, लेकिन इस मामले में उसका दुनिया की बड़ी कंपनियों और अमेरिकी सोयाबीन लॉबी के साथ गठजोड़ का संदेह होता है. अमेरिका के वर्जीनिया में 1980 में स्थापित पेटा ने भारत में 2000 में अपना काम शुरू किया.

इसका नारा है कि पशु हमारे लिए खाने, पहनने, मनोरंजन और उपयोग करने या किसी अन्य तरीके से दुर्व्यवहार करने के लिए नहीं हैं. यह संगठन लोगों को एक शाकाहारी जीवन शैली के लिए प्रोत्साहित करता है. आजकल विशुद्ध शाकाहारी लोगों में वीगन के नाम से एक चलन आया है और ये लोग दूध को भी शाकाहारी नहीं मानते. उनका दावा है कि पशुओं से दूध हासिल करना उनके साथ अत्याचार की तरह है.

पहले यूरोप में सोयाबीन और अन्य पौधों व बादाम जैसे सूखे मेवों से दूध बनाना शुरू किया गया था. यह चलन अमेरिका में भी तेजी से बढ़ा. ये उत्पाद भारतीय बाजार में भी उपलब्ध होने लगे. इन कंपनियों की प्रतिस्पर्धा सामान्य डेयरी उत्पादों से है. प्लांट बेस्ड डेयरी उत्पादों को सामान्य डेयरी उत्पादों का विकल्प बताया गया, जिसका कोई आधार नहीं है.

असल में इन कंपनियों ने अपने उत्पादों को डेयरी उत्पादों की तरह दूध और उससे बनने वाले उत्पादों जैसे नाम दिये, क्योंकि जनमानस में दूध एक पूर्ण खाद्य उत्पाद के रूप में तो मान्य है ही, इसकी पोषकता के कारण भी इसे बेहतर माना जाता है. पौधों से तैयार उत्पादों को डेयरी उत्पादों के बराबर बताने से बड़ी तादाद में ग्राहक भ्रमित हुए. इस पर दुनियाभर में परंपरागत डेयरी कंपनियों ने इन प्लांट बेस्ड डेयरी उत्पादों की भ्रामक ब्राडिंग के खिलाफ मुकदमे दर्ज कराये.

व्यावसायिक हित ताजा विवाद की जड़ है. अमूल ने पिछले दिनों मिथ वर्सेज फैक्ट्स के तहत एक अभियान चलाया था, जिसमें बताया गया था कि प्लांट बेस्ड डेयरी उत्पाद और दूध सही मायने में दूध नहीं हैं. फूड सेफ्टी एंड स्टेंडर्ड अथाॅरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआइ) ने दूध को साफ-साफ परिभाषित किया है. साथ ही, यह भी कहा है कि पशुओं से मिलनेवाले उत्पादों में दूध अकेला ऐसा उत्पाद है, जो शाकाहार की श्रेणी में आता है. ऐसे में वीगन को प्रोत्साहित करनेवाले पेटा को समझना चाहिए कि भारत में दूध के क्या मायने हैं.

अमूल के उक्त विज्ञापन के विरुद्ध पेटा ने एडवर्टाइजिंग स्टेंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआइ) में याचिका दाखिल की, जो अमूल के तर्क के चलते खारिज कर दी गयी. उसके बाद पेटा ने अमूल को प्लांड बेस्ड डेयरी का सुझाव भेजा. अमूल के प्रबंध निदेशक आरएस सोढ़ी के अनुसार, पहले यह पत्र मीडिया में गया और उसके बाद उन्हें मिला. देश में किसानों ने अपने संसाधनों और मेहनत से 75 साल में डेयरी उद्योग खड़ा किया है.

अमूल ब्रांड का पिछले वित्त वर्ष का टर्नओवर 53 हजार करोड़ रुपये पर पहुंच गया है. पेटा का यह कदम जेनेटिकली मोडिफाइड (जीएम) सोयाबीन से तैयार होने वाले दूध को बढ़ावा देने और अमेरिकी सोयाबीन किसानों के फायदे के लिए उठाया गया है. वैसे भी सोयाबीन से तैयार इन उत्पादों की कीमत इतनी अधिक है कि वे आम भारतीय उपभोक्ता की पहुंच से बाहर हैं. भारत में जीएम फूड प्रतिबंधित भी है.

भारत के दस करोड़ डेयरी किसानों में अधिकतर एक या दो पशुओं वाले छोटे किसान हैं. इसके बावजूद देश में आठ लाख करोड़ रुपये मूल्य के दूध का सालाना उत्पादन होता है और यह किसानों द्वारा उत्पादित किसी भी कृषि उत्पाद की वैल्यू से अधिक तो है ही, देश के सकल घरेलू उत्पादन का करीब पांच फीसदी भी है. अमूल हर रोज 250 लाख लीटर दूध खरीदती है. इस लेखक के साथ एक बातचीत में अमूल के प्रबंध निदेशक आरएस सोढ़ी कहते हैं कि हर रोज गुजरात के 36 लाख दुग्ध उत्पादक किसानों को दूध की बिक्री से 150 करोड़ रुपये मिलते हैं. देशभर में अमूल को दूध देनेवाले किसानों की तादाद 43 लाख है.

पेटा को यह भी जानना चाहिए कि भारत में पशुपालन एक ठेठ व्यवसाय नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति का हिस्सा भी है. हर किसान पशुपालन को अपने कामकाज का अभिन्न हिस्सा मानता है और भूमिहीन किसान भी पशुपालन से जीवनयापन करते है. भारत में पशुपालन का मूल उद्देश्य दूध उत्पादन है और यहां मांस के लिए पशुपालन नहीं होता, जैसा यूरोप और अमेरिका समेत तमाम देशों में होता है.

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